पंकज चतुर्वेदी ओडिशा में 22 सितंबर 2026, मंगलवार को विधानसभा में जब राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश राम सिंहखुंटिया ने एक लिखित सवाल […]
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निकोबार में खनन की अनुमति के साथ पारिस्थितिकी और जनजातियों पर मंडराता संकट
पंकज चतुर्वेदी अंडमान और निकोबार द्वीप समूह अपनी प्राचीन जैव-विविधता, अद्वितीय उष्णकटिबंधीय वर्षावनों और अति-संवेदनशील आदिम जनजातियों के लिए विश्वभर में जाने जाते हैं। हाल […]
Read moreधरती के स्वर्ग पर गहराता जलवायु परिवर्तन का साया
पंकज चतुर्वेदी धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर पर इन दिनों जलवायु परिवर्तन का साया लगातार गहराता जा रहा है। जिस घाटी की पहचान उसकी […]
Read moreसबको घर चाहिए, पर हर जगह एक-सा घर नहीं
पंकज चतुर्वेदी भारत में करोड़ों लोगों को घर की ज़रूरत है और इसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन घर बनाते समय यह भी देखना होगा […]
Read moreप्रकृति का बढ़ता क्रंदन: आत्ममंथन की घड़ी
पंकज चतुर्वेदी 3 अक्टूबर का दिन आज के दौर में एक विशेष चेतावनी लेकर आता है—यह हमें ठहरकर यह सोचने पर विवश करता है कि हमने […]
Read moreकरोड़ों रुपये खर्च, फिर भी कराह रही यमुना
रोहित कौशिक देश की महत्वपूर्ण नदी यमुना का प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन गया है। यमुना के प्रदूषण को लेकर समय-समय पर कई अध्ययन […]
Read moreभारत में बढ़ती उम्र, वृद्धावस्था की चुनौतियाँ और जलवायु परिवर्तन का बुज़ुर्गों पर असर
धीरेंद्र त्रिपाठी भारत में बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ रही है। बेहतर चिकित्सा, टीकाकरण और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के कारण अधिक लोग लंबा जीवन जी […]
Read more2026 की गंगा बाढ़ के बाद एक बुनियादी प्रश्न उठता है—क्या गंगा में पानी असामान्य रूप से अधिक आया, या हमने पिछले 30–50 वर्षों में नदी के फैलने की प्राकृतिक जगह को भी लगातार कम किया है? इसका उत्तर केवल आंखों से देखकर या वर्तमान राजस्व नक्शे से नहीं मिल सकता। इसके लिए 1970–80 के दशक से 2026 तक गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान में हुए भूमि-उपयोग परिवर्तन का उपग्रह आधारित वैज्ञानिक ऑडिट आवश्यक है।
अजय सहाय सबसे पहले एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। पूरी गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान में पिछले 30–50 वर्षों में ठीक कितनी कॉलोनियां, कितने किलोमीटर […]
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