Author: indiaclimatechange

बगैर बछड़े के नहीं बचेगा देहात

1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि गोबर को चूल्हे में जलाया जाना एक अपराध है उर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि हमारे देश में गोबर के जरिए 2000 मेगावाट उर्जा उपजाई जा सकती है । यह तथ्य सरकार
में बैठे लेग जानते हैं कि भारत में मवेशियों की संख्या कोई तीस करोड़ है। इनसे लगभग 30 लाख टन गोबर हर रोज मिलता है। 

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पहाड़ बर्फ से सूने, असर हम सब पर

बर्फ न गिरने और मौसम के बदलाव की चिंता अकेले कश्मीर की ही नहीं है , देश के सभी ऐसे इलाके जो हिमाचल की गोद में हैं, इस तरह के संकट का सामना कर  रहे हैं । हिमाचल प्रदेश के  कांगड़ा घाटी में 17 साल बाद सूखा पड़ रहा है.

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गाद से गहराता नदियों का संकट

गाद हर एक नदी का स्वाभाविक उत्पाद है  लेकिन  उसका भली भांति प्रबंधन अनिवार्य है । गाद जैसे ही नदी के बीच जमती है तो नदी का प्रवाह बदल जाता है ।

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गंगा सागर द्वीप के गुम होने का खतरा

जैसे जैसे धरती का तापमान  बढ़ रहा है और ग्लेशियर पिघलने से  समुद्र का जल स्तर ऊँचा हो रहा है,
गंगा सागर की जमीन खिसकती जा रही है ।

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ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ निर्णायक जंग अभी बाकी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था-आप किसी शोर का सुनना चाहते हैं या नहीं, यह तय करने का आपको पूरा अधिकार लेकिन सड़क पर जोर जोर से बात करते लोग या साझा तिपहिया में  बजते कानफोडू स्टीरियो आदि  को इस आदेश की कतई  परवाह नहीं ।

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दिल्ली को बीमारी बाँट रही है हिंडन

हिंडन नदी भले ही उत्तर प्रदेश में बहती हो और उसके जहरीले जल ने तट परबसे  गांव-गांव में तबाही तो मचा ही रखी है, लेकिन अब दिल्ली भी इसके प्रकोप से अछूती नहीं है।

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भूजल – हालत सुधरे, लेकिन खतरा बड़ा

देश का बड़ा हिस्सा  पेय जल और खेती के लिए भू जल पर निर्भर है । जिस देश  में भूजल ने हरित क्रांति को संवारा और जिसके चलते भारत एक खाद्य-सुरक्षित राष्ट्र बन गया, वहीं बहुमूल्य संसाधन अतिदोहन के चलते अब खतरे में हैं ।

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अपनी जल निधियाँ डुबाने से डूब रहा है चैन्नई

कूवम शब्द ‘कूपम ’ से बना है- जिसका अर्थ होता हैं कुआँ। कूवम नदी 75 से ज्यादा तालाबों के अतिरिक्त जल  को अपने में सहजे कर तिरूवल्लूर जिले में कूपम नामक स्थल से उदगमित होती है। दो सदी पहले तक इसका उद्गम धरमपुरा जिले था, भौगोलिक बदलाव के कारण इसका उदगम स्थल बदल गया।

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