“ऊई हुंका” अर्थात दीमक की बाँबियाँ लुप्त होने का अर्थ है कि धरती संकट में हैं । पंकज चतुर्वेदी उड़ीसा का कश्मीर कहलाने वाले कंधमाल […]
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भविष्य के संघर्षों का कारण: पानी की कमी और पलायन
1997 में पानी की उपलब्धता 575 घन किलोमीटर थी, लेकिन अब यह घटकर लगभग 500 घन किलोमीटर रह गई है विकास परसराम मेश्राम नेशनल इंस्टीट्यूट […]
Read moreधराली त्रासदी का नया सच: ग्लेशियर से टूटा हिमखंड बना विनाशकारी सैलाब
भू-वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वतमालाओं में से एक अजय सहाय 5 अगस्त 2025 को धराली (हर्षिल घाटी) में आई अचानक और […]
Read moreघटते तालाब, बढ़ता जल संकट: गाँव की जल-जीवन रेखा
तालाबों का भू-वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और कानूनी महत्व अजय सहाय भारत की पारंपरिक जल-संस्कृति में तालाब (पोंड/टैंक) हजारों वर्षों से ग्रामीण जल प्रबंधन का आधार […]
Read moreगंगा से गोदावरी तक: ‘डूबते’ डेल्टा और संकट में भारत का भविष्य
भारत के प्रमुख नदी डेल्टा और उनके किनारे तेजी से डूब रहे हैं पंकज चतुर्वेदी भारत की नदियां वास्तव में करोड़ों लोगों के लिए जीवनदायिनी […]
Read moreभारत में 45 करोड़ लीटर ईंधन की रोज़ाना खपत
प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और हरित ऊर्जा की वैज्ञानिक आवश्यकता अजय सहाय भारत में प्रतिदिन लगभग 10 करोड़ लीटर पेट्रोल और 35 करोड़ लीटर डीज़ल का […]
Read moreहर सांस में प्लास्टिक
माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ते हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा अजय सहाय हर दिन इंसान जिस हवा में सांस ले रहा है, उसमें अब […]
Read moreपंचायती राज संस्थान जल सुरक्षा को तेजी से सुनिश्चित कर सकते हैं
जल प्रबंधन के स्थायी समाधानों की योजना बनाने और उन्हें सबसे उपयुक्त तरीके से ज़मीन पर लागू करने में स्थानीय सरकारें सबसे कारगर हो सकती […]
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