हर दीपावली के बाद दिल्ली शहर का घुटता दम
संदीप जोशी
हर दीपावली के बाद दिल्ली शहर का दम तो घुटता ही है। लेकिन गए सोमवार को भय, खौफ व डर से भी दिल्ली सहम गयी। लाल किले के सामने जो लाल रंग बिखरा उसमें हिंदू-मुस्लिम में अंतर करने के लिए न कोई डीएनए हो सकता है न ही कोई जांच एजेंसी दावा कर सकती है। दिल दहला देने वाली आतंकी घटना के सत्य को सामने आने में तो समय लगेगा । और सरकारी जांच संस्थाएं अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाएंगी ऐसी आशा अपन रख सकते हैं।
इसलिए दिल्ली में दम घोट रहे, गंभीर हो रहे वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) पर ही अपन नज़र गढ़ाएं। अपने द्वारा ही जहरीली कर दी गयी अपनी हवा पर आते हैं। दिल्ली में सरकार बदल लेने के अलावा अपन ने और क्या किया? अपना शहर क्या सरकार के बनाने से बनता है या अपने बनने-बनाने से भी बनता है?
आजकल अपन प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाने से नहीं, बल्कि सत्ता के सरोकारों से जीवन यापन करने के आदि बना दिए गए हैं। सत्ता के भरोसे ही अपना जीवन चलाने पर मजबूर हैं। और सत्ता हमारे जीवन की रफ्तार को लगातार तेज करने, जनता को नए-नए यंत्रों से हतप्रभ छोड़ने, और विकास के नए-नए मॉडल से भरमाने में लगती है।
सत्ता के इस भ्रम जाल में हम भूल जाते हैं की प्रकृति भी कुछ कह रही है। कुछ सुनाना चाहती है। कुछ समझाना चाहती है। हमारी ही अति को हमें जताना चाहती है। मगर हम अपने स्वार्थ, अपनी सत्ता और अपने स्वविकास में ही व्यस्त हैं। या व्यस्तता में झोंक दिए गए हैं। और हम भूल गए हैं की सर्वोदय से ही व्यक्ति विशेष का भी विकास हो सकता है।
आज समाज में सवाल-जवाब का अकाल तो है ही, मगर जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व का भी सूखा पड़ गया है। नहीं … नहीं, ऐसा आवहान नहीं है कि इसका हल केवल किसी क्रांति में है। बस, अपने को सत्ता के प्रति कमजोर न बनने देने में है। और समाज का समय की समझ के प्रति कर्मठ बनने में है।
दिल्ली में हर साल, इस मौसम में प्रदूषण के कारण एक जैसे ही रहे हैं। मौसम के पर्यावरण बदलाव के अलावा, आसपास खेतों में पराली का जलना। गाड़ियों का धुआं उड़ ना पाना। विकास के नाम पर निर्माण कार्यों का लगातार चलना। और बड़े पैमाने पर जरूरतों का वस्तुकरण किया जाना। सरकार भी ऐसी परिस्थिति में बने-बनाए, चले-चलाए क्रमबद्ध असर क्रिया योजना (जीआरएपी 3-4-5) को लागू करने का फरमान जारी कर देती है।
बताया जाता है कि दिल्ली में 39 जगह एक्यूआई मापने के लिए यंत्र लगे हैं। इनमें से 32 जगहों पर वायु गुणवत्ता गंभीर या अति-गंभीर है। सांस लेने में दूभरता व घुटन है। अब दिल्ली के लिए इन सरकारी एक्यूआई आंकड़ों को देखें तो वजीरपुर (464) में सबसे ज्यादा, तो सबसे कम नेताजी सुभाष तकनीकी विश्वविद्यालय, द्वारका (217) में दर्ज किया गया। दोनों इलाके दिल्ली में ही हैं। मगर जो अंतर है उसे सत्ता, दिल्लीवासियों को न बताना चाहती है न समझाना।
वजीरपुर शहर की औद्योगिक व्यस्तता का गढ़ है। उन्हीं यंत्रखानों में काम करने वाले गरीब लोगों का वहीं बदहाल बसेरा भी है। वाहन आवाजाही का अति व्यस्त इलाका है। दूसरी तरफ द्वारका के तकनीकी विश्वविद्यालय का इलाका पेड़-पौधों की उचित दूरी से हरा-भरा है। व्यवस्थित, मंजिला मकानों का डेरा है।
आबादी दोनों जगह घनी ही है। समाज में उद्योग और शिक्षा के साथ-साथ पेड़-पौधों की हरियाली की भी गुंजाइश और जरूरत रही है। इनके समंवय की सेवा के लिए ही जनता सरकारें चुनती हैं। और सरकार फिर, और अधिक सत्ता पाने में ही लगती हैं। जनता ने आम आदमी पार्टी के लिए अड़चन बनी भाजपा को ही सत्ता सौंप दी। आज भी दिल्ली में सार्वजनिक व्यवस्था का खस्ता हाल है। भाजपा यंत्र व रसायन के सहारे आकाश से बारिश कराने में तो लगी लेकिन आप द्वारा चलाए ऑड-ईवन योजना पर गाड़ियों के चलने पर कोई भरोसा नहीं जताया।
सड़कों पर गाड़ी से पानी का छिड़काव तो कराया लेकिन समाज में गाड़ियां कम चलाने की समझ नहीं बनने दी। पंजाब की पराली पर तो आरोप लगाए मगर दिवाली पर पटाखे न चलाने के लिए सख्ती नहीं दिखाई। जनता को समझना होगा कि कैसे पटाखे भी खूब बेचे गए, और अब हर कमरे के लिए खूब एयर-प्यूरीफायर भी बेचे जाएंगे।
इंडिया गेट पर सांस लेने के अधिकार के लिए प्रदर्शन हुआ। विरोध कर रही जनता को पकड़कर दूर छोड़ दिया गया। इसलिए आतंक से, या दम घुटने के डर को सहते रहने से अच्छा है एकजुटता में सत्ता से सवाल करना।