जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियर पिघलन और मानवीय अतिक्रमण का वैज्ञानिक विश्लेषण
अजय सहाय
वर्ष 2025 के मानसून काल में गंगा नदी में उत्पन्न हुए उफान और बाढ़ की स्थितियाँ एक गहन वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और मानवीय संकट का प्रतीक हैं, जिसका मूल कारण जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान वृद्धि के चलते ग्लेशियरों का तीव्र पिघलना, रिकॉर्ड स्तर की भारी वर्षा, और मानवीय अतिक्रमण से उत्पन्न बाधाएँ हैं, जो गंगा की प्राकृतिक धारा में व्यवधान डाल रही हैं, जिससे नदी के जल ग्रहण क्षेत्र (Catchment Area) में असामान्य दबाव उत्पन्न हुआ है ।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा जारी मानसून 2025 की रिपोर्ट के अनुसार जून से जुलाई के मध्य बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल के गंगा बेसिन क्षेत्र में औसतन 40–65% अधिक वर्षा दर्ज की गई, उदाहरणस्वरूप उत्तराखंड के टिहरी, उत्तरकाशी, और कुमाऊँ क्षेत्र में सामान्य से 170 मिमी अधिक बारिश हुई, जिससे भूस्खलन और जलधाराओं में अत्यधिक बहाव देखा गया ।
वहीं गंगोत्री, यमुनोत्री और भागीरथी के ग्लेशियर स्रोतों में तापमान वृद्धि के चलते लगभग 5.4 गीगाटन बर्फ का पिघलाव रिकॉर्ड किया गया, जो National Snow and Ice Data Center (NSIDC), अमेरिका और Wadia Institute of Himalayan Geology की रिपोर्ट (2025) के अनुसार गंगा में औसत दैनिक जल प्रवाह से 18% अधिक जलराशि का आपात बहाव उत्पन्न करता है ।
इसके साथ ही गंगा की सहायक नदियों जैसे कोसी, गंडक, घाघरा, और महानंदा में वर्षा के कारण अत्यधिक जल भराव हुआ, जिससे बिहार और उत्तर प्रदेश में 54 जिलों में बाढ़ जैसे हालात बन गए, केवल जुलाई 2025 में गंगा के पटना, बक्सर, वाराणसी, और प्रयागराज के घाटों पर जल स्तर खतरनाक चिह्न 71.26 मीटर से ऊपर पहुँच गया, जबकि वाराणसी में यह 73 मीटर पार कर गया जो वर्ष 1978 के बाद पहली बार रिकॉर्ड किया गया है।
ISRO के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्थान (NRSC) के अनुसार गंगा बेसिन में वर्षा जल की कुल संचयी मात्रा जून-जुलाई 2025 के दौरान 1275 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) तक पहुँच गई, जो कि गंगा की औसत धारण क्षमता (1000 BCM) से लगभग 27.5% अधिक है, इस कारण अतिरिक्त जल प्रवाह तटबंधों को तोड़ते हुए शहरों और गांवों में घुस गया, जिससे 2.4 करोड़ लोग प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए ।
गंगा के प्रवाह में वृद्धि का एक और महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारण गंगोत्री और चोराबाड़ी ग्लेशियर के बीच स्थित अस्थायी झीलों का टूटना रहा, जिसमें वैज्ञानिकों ने जल निकासी मार्गों के संकीर्ण होने और बर्फ के अचानक खिसकने को प्रमुख कारण बताया, इस कारण “Glacial Lake Outburst Flood” (GLOF) जैसी स्थिति उत्पन्न हुई जो गंगा में तीव्र जल वृद्धि का तात्कालिक कारण बनी ।
विशेषज्ञों के अनुसार, 2023–2025 के बीच उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर पिघलने की औसत दर 0.32 मीटर प्रति वर्ष थी, जो 1990 के दशक में 0.12 मीटर थी — अर्थात यह लगभग तीन गुना तेज हुई है, जिससे गंगा की जल आपूर्ति अचानक अनियंत्रित हो गई; वहीं दूसरी ओर मानवीय गतिविधियों जैसे शहरीकरण, गंगा के किनारे निर्माण कार्य, घाट विस्तार, बांधों और बैराजों के गलत संचालन, और नदी के प्राकृतिक मार्ग में अतिक्रमण (जैसे वाराणसी में NH-2 पुल के पास और पटना में गंगा पथ निर्माण) से जल बहाव की दिशा बाधित हुई ।
जिससे जल प्रवाह पीछे की ओर लौटकर रिहायशी इलाकों में प्रवेश कर गया, उदाहरण के लिए पटना के दानापुर और गंगा तटवर्ती फुलवारीशरीफ क्षेत्र में जुलाई 2025 में जलस्तर अचानक 3.8 मीटर बढ़ गया; “Central Water Commission” की रिपोर्ट के अनुसार गंगा में अचानक जलस्तर वृद्धि के 38% मामलों में “Back Water Effect” दर्ज किया गया जो मानवीय बाधाओं से उत्पन्न होता है ।
इस तरह यह स्पष्ट है कि केवल वर्षा और ग्लेशियर पिघलाव ही नहीं बल्कि मानवजनित गतिविधियाँ भी इस आपदा को विकराल बनाने में सह-कारक हैं; इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव के अंतर्गत मानसून की अनिश्चितता भी सामने आई है — मानसून का आगमन पश्चिम भारत में सामान्य से 6 दिन पहले और पूर्वी भारत में 10 दिन देर से हुआ, जिससे जल बहाव असमान रूप से घटा और बढ़ा, जिससे फ्लैश फ्लड की स्थिति उत्पन्न हुई।
Nature Climate Change जर्नल के अनुसार भारत के हिमालयी क्षेत्रों में मानसून की बौछारों की तीव्रता 2020 के बाद से 17% अधिक हो चुकी है, और एकल दिन में भारी वर्षा की घटनाएं 31% तक बढ़ गई हैं, जिससे नदियों का अचानक उफान एक नियमित खतरा बन चुका है; 2025 में केवल जुलाई महीने में गंगा बेसिन क्षेत्र (उत्तराखंड से लेकर बंगाल तक) में 18 बार अत्यधिक वर्षा (>200 मिमी/24 घंटे) की घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें सुदूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा में तो नदी ने बाढ़ के चलते कई तटबंधों को तोड़ दिया ।
इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट है कि प्रकृति अब स्पष्ट रूप से “Angry Hydrology” की चेतावनी दे रही है — जिसमें प्राकृतिक जल तंत्र मानवजनित हस्तक्षेपों से असंतुलित हो जाता है और वर्षा या ग्लेशियर जल प्रवाह को अवशोषित नहीं कर पाता, परिणामस्वरूप विनाशक उफान उत्पन्न होता है ।
इसी क्रम में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि “River Buffer Zone” की अवधारणा को कड़ाई से लागू नहीं किया गया, गंगा तटीय भूमि उपयोग पर नियंत्रण नहीं किया गया, और तटीय बायो-फिल्टर वनस्पति (जैसे खस, बांस, जाजर) नहीं लगाई गईं तो वर्ष 2030 तक गंगा का औसत जल प्रवाह वर्षा ऋतु में 22% अधिक होगा और सूखा काल में 35% कम होगा, जिससे ‘Hydro Extremes’ की स्थिति बनेगी; वर्तमान में जल संसाधन मंत्रालय की ‘Namami Gange 2.0’ योजना के अंतर्गत जल प्रवाह सुधार हेतु 42 रिवरफ्रंट प्रोजेक्ट, 160 नालों की बायो-रेमेडिएशन और 117 नए STP निर्माण प्रस्तावित हैं ।
परन्तु जब तक ऊपरी हिमालयी और गंगा तट के संवेदनशील क्षेत्रों में जल निकासी प्रणाली, बाढ़ चेतावनी नेटवर्क, और सामुदायिक नदी निरीक्षण समितियों की स्थापना नहीं होती तब तक ऐसे उफान की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी नहीं जा सकती, और यह संकेत देता है कि प्रकृति अब स्पष्ट चेतावनी स्वरूप उफान, बाढ़ और भू-स्खलन के रूप में हमें सचेत कर रही है कि यदि गंगा जैसी नदियों को अविरल और निर्मल बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक, पारिस्थितिकीय और जनसहभागी नीति नहीं बनी तो भविष्य में यह उफान विनाश के नए अध्याय लिखेगा, जिसमें न केवल मानव जीवन का संकट बढ़ेगा बल्कि भारत की खाद्य, जल और पारिस्थितिक सुरक्षा भी गहरे खतरे में पड़ जाएगी।