प्राकृतिक कार्बन सिंक की पुनर्बहाली से 39% उत्सर्जन कटौती की ओर
अजय सहाय
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जलवायु परिवर्तन और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने समस्त मानवता को एक ऐसे संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है जहाँ पारिस्थितिक संतुलन, कृषि उत्पादन, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर बहुआयामी संकट उत्पन्न हो चुका है, ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कार्बन न्यूट्रल या नेट ज़ीरो लक्ष्य को पाने की दिशा में प्रयास तेज हो रहे हैं ।
एक नई वैज्ञानिक शोध रिपोर्ट में यह उल्लेखित हुआ है कि यदि बाढ़ के मैदानों की दलदली भूमि को पुनः बहाल किया जाए, तो वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में लगभग 39% तक की कमी संभव है, जोकि जलवायु संकट से निपटने की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राकृतिक समाधान के रूप में उभरता है क्योंकि दलदली भूमि, विशेषकर बाढ़ मैदानों की मिट्टी और वनस्पति में प्राकृतिक रूप से भारी मात्रा में जैविक कार्बन संग्रहित होता है, जिसे वैज्ञानिक “ब्लू और ग्रीन कार्बन सिंक” कहते हैं ।
जो वायुमंडल से CO₂ को खींचकर मिट्टी में स्थिर रूप से संग्रहित करता है; परंतु जैसे ही इन आर्द्रभूमियों को सुखाकर शहरीकरण, औद्योगिक उपयोग, बांध निर्माण या कृषि विस्तार के लिए उपयोग में लाया जाता है, वहाँ की मिट्टी में उपस्थित जैविक पदार्थ ऑक्सीजन के संपर्क में आकर विघटित होते हैं, और परिणामस्वरूप अत्यधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) जैसी ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में पहुँचती हैं, जिससे तापमान में वृद्धि, वर्षा चक्र की अनियमितता और आपदा जोखिम बढ़ता है।
यह प्रक्रिया “पिटलैंड ऑक्सीडेशन” कहलाती है और वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया की कुल दलदली भूमि में से लगभग 85% इंसानी गतिविधियों के कारण प्रभावित हो चुकी हैं और केवल 15% ही प्राकृतिक अवस्था में शेष हैं, जबकि प्रति वर्ष इन शुष्क किए गए पिटलैंड्स से लगभग 1.91 गीगाटन CO₂ वातावरण में उत्सर्जित हो रहा है, जोकि वैश्विक विमानन उद्योग से भी अधिक है; इसके विपरीत, यदि बाढ़ मैदानों को पुनर्स्थापित करते हुए दोबारा जल से भर दिया जाए ।
उस स्थिति में मिट्टी के अंदर एनेरोबिक वातावरण (Anaerobic Conditions) बनता है जिसमें ऑक्सीजन की अनुपस्थिति के कारण अपघटन की गति धीमी हो जाती है और कार्बनिक पदार्थों का विघटन सीमित होता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन रुकता है और कार्बन का पुनः संग्रहण शुरू होता है, वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को “Rewetting Restoration Model” कहते हैं जो जलवायु शमन (Climate Mitigation) का एक प्रभावशाली उपकरण है ।
उपग्रह विश्लेषण, ड्रोन आधारित मापन, स्थलीय सैंपलिंग और कम्प्यूटेशनल मॉडल्स के आधार पर यह पाया गया कि यदि पुनर्स्थापित बाढ़ मैदानों में प्राकृतिक जल प्रवाह को बहाल किया जाए और देशज वनस्पति जैसे टाइफा, हाइड्रिला, फर्गोनिया, साइड्रस, आदि का रोपण किया जाए, तो एक हेक्टेयर भूमि 5 से 7 टन CO₂ प्रतिवर्ष वातावरण से सोख सकती है ।
इसके साथ-साथ यह क्षेत्र स्थानिक तापमान को औसतन 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक घटाने में सक्षम है, जल संरक्षण की दृष्टि से देखें तो दलदली बाढ़ मैदान प्रति हेक्टेयर 25 से 40 लाख लीटर वर्षा जल संग्रहित कर सकते हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) होता है और आसपास के जल स्रोतों का स्तर सुधरता है ।
वहीं, जैव विविधता की दृष्टि से यह क्षेत्र लगभग 2200 से अधिक प्रजातियों की जीवन रेखा है, जिनमें पक्षी, उभयचर, मछलियाँ, कीट, और माइक्रोऑर्गेनिज़्म्स शामिल हैं, जिनकी संख्या मानव अतिक्रमण और जल निकासी के कारण तेजी से घट रही थी, उदाहरण के लिए भारत में गंगा, ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी और घाघरा जैसी नदियों के बाढ़ मैदानों में पहले व्यापक दलदली क्षेत्र हुआ करते थे । जिन्हें पिछले कुछ दशकों में कृषि विस्तार, बांध, और शहरीकरण के लिए समाप्त कर दिया गया जिससे न केवल जलवायु संतुलन बिगड़ा बल्कि बाढ़ की तीव्रता, सूखा, और प्रदूषण की समस्या भी बढ़ गई ।
बिहार की कांवर झील (अंतरराष्ट्रीय रामसर स्थल) जो लगभग 67 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, पहले एक प्राकृतिक दलदली बाढ़ मैदान थी परंतु अब उसका 40% क्षेत्र कृषि में बदल दिया गया है, जिससे वहां की 10 लाख पक्षियों की प्रजातियों में 60% की कमी आई और कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ा, इसी तरह उत्तर प्रदेश का सूर सरोवर, पश्चिम बंगाल की ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स और असम की दीपोर बील जैसी आर्द्रभूमियों में पुनर्स्थापन का कार्य करके कार्बन कटौती की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं ।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दलदली पुनर्स्थापन की प्रक्रिया में जल की सतही धारा को नियंत्रित करके, स्थानीय जलधारणीय वनस्पतियों का रोपण कर, सीपेज ब्लॉकिंग, और जैविक कार्बन प्रोफाइलिंग करते हुए स्थायी प्रणाली बनाई जाती है, जिसमें हाइड्रोलॉजिकल कनेक्टिविटी, वेटलैंड हाइड्रोडायनामिक्स, और सॉयल ऑर्गेनिक मैटर मैपिंग जैसी तकनीकें इस्तेमाल होती हैं, भारत सरकार यदि नीति आयोग, पर्यावरण मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय, और राज्य सरकारों के साथ मिलकर राष्ट्रीय बाढ़ मैदान पुनर्स्थापन मिशन (National Floodplain Restoration Mission) चलाए ।
देश के लगभग 8 लाख हेक्टेयर संभावित दलदली भूमि को पुनः सक्रिय किया जा सकता है जिससे हर वर्ष लगभग 6 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल से हटाई जा सकती है जो लगभग 1.2 करोड़ पेट्रोल वाहनों के सालाना उत्सर्जन के बराबर है, साथ ही इससे लगभग 2000 करोड़ लीटर वर्षा जल का संचयन होगा, जो कई जिलों की जल आपूर्ति पूरी कर सकता है, इसके साथ यह परियोजना जलवायु अनुकूलन, ग्रामीण आजीविका (जैसे मछली पालन, जलीय कृषि), इको-टूरिज्म और हरित रोजगार (Green Jobs) सृजन में सहायक बन सकती है।
माइक्रो स्तर पर अगर पंचायत, जल उपयोगकर्ता समूह, स्वयं सहायता समूह और ग्रामीण समुदाय मिलकर अपने बाढ़ मैदानों की जलधारा और वनस्पति को पुनः जीवित करें, तो प्रत्येक पंचायत प्रतिवर्ष 10,000 टन CO₂ अवशोषण कर सकती है, जिससे भारत के NDC लक्ष्य (Nationally Determined Contributions) को पूरा करने में मदद मिलेगी, ISRO, ICAR, IIT, और NIOT जैसे संस्थानों के साथ मिलकर वेटलैंड्स का डिजिटल इन्वेंटरी, सैटेलाइट आधारित निगरानी और AI- आधारित Restoration Suitability Mapping करके अधिक वैज्ञानिक रणनीति बनाई जा सकती है ।
भारत के जलवायु दायित्वों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र के SDG-13 (Climate Action), SDG-6 (Clean Water), और SDG-15 (Life on Land) लक्ष्यों की भी पूर्ति हो सकेगी; आज जब 2070 तक भारत को कार्बन न्यूट्रल बनने की दिशा में नीतिगत और तकनीकी रणनीति की आवश्यकता है, उस समय दलदली बाढ़ मैदानों की पुनर्बहाली एक सशक्त, सस्ता, और प्रकृति आधारित समाधान है जो जलवायु परिवर्तन से लड़ने के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक स्थिरता को एकजुट करता है ।
अतः यह अनिवार्य हो गया है कि बाढ़ के मैदानों की दलदली जमीनों को पुनः जलयुक्त और जैव विविधता से परिपूर्ण करके हम भारत को कार्बन कटौती के पथ पर अग्रसर करें, जिससे जल, जीवन और जलवायु – तीनों के संतुलन की रक्षा हो सके और 2047 के जल आत्मनिर्भर भारत एवं कार्बन तटस्थ भारत के सपनों को साकार किया जा सके ।