जब अवैध खनन रुक ही नहीं रहा तो स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही ‘अरावली’ माना जाए ।
पंकज चतुर्वेदी
जिस सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले टिप्पणी की थी कि अरावली पहाड़ को लोगों ने आपस में बाँट लिया है और पचास हजार रुपये महीने की घूस दे कर यहाँ की जगह खनन चल रहे हैं , उसी अदालत ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर अरावली पर्वत श्रृंखला की जो ‘नई परिभाषा’ दी है , उससे दिल्ली ही नहीं पंजाब तक रेगिस्तान का विस्तार होना तय है ।
अदालत का मानना था कि जब अवैध खनन रुक ही नहीं रहा तो स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही ‘अरावली’ माना जाए । यानि इससे कम ऊंचाई के पहाड़ों पर खनन के रास्ते खुल गए हैं ।
भूवैज्ञानक डॉ उमर सैफ की माने तो कभी अरावली का विस्तार शिवालिक तक हुआ करता था और यमुना के कटाव से लाखों साल पहले यह श्रंखला दिल्ली के रायसीना पहाड़ पर आ कर बंट गई । लगातार इसके नैसर्गिक स्वरूप से छेड़छाड़ ने इसके मूल स्वभाव – पाकिस्तान की तरफ से आने वाली गरम हवा और बालू को रोकने की दीवार, में रास्ता बना दिया और इससे रेगिस्तान के हौले-हौले कदम बढ़ने की संभावना है ।
अरावली दो तरह से देश के बड़े हिस्से को गर्मी और अंधड़ से बचाता रहा है । इसके ऊंचे शिखर हवा के साथ बह कर आने वाले पी एम 2.5 कणों को रोकते हैं तो 30 मीटर तक की नीची पहाड़ियाँ भारी रेत और धूल के कणों को रोकती हैं। जबकि एफएसआइ की रिपोर्ट के मुताबिक, 10 से 30 मीटर ऊंची छोटी पहाड़ियां भी तेज हवाओं को उसके साथ आने वाली रेत को थामने में सक्षम होती हैं।
चूंकि अरावली का 90 प्रतिशत हिस्सा 100 मीटर से कम ऊंचाई का है और अब वहाँ खनन होगा ही , सो रेगिस्तान से उड़ने वाली धूल सीधे दिल्ली और इंडो-गैंगेटिक मैदानों (एनसीआर) तक पहुंचेगी।
यह किसी से छिपा नहीं हैं कि अभी तक अरावली ने मरू भूमि के विस्तार को थामने में निर्णायक भूमिका निभाई है । यही नहीं मानसून के पानी भरे बादलों को दिशा देने में इस पर्वत श्रंखला के मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ों की भूमिका रही है और अब इन पहाड़ियों के गायब होने की दशा में उत्तर-पश्चिम भारत में बरसात के स्वभाव में बदलाव आ सकता है । पहले से ही बढ़ते तापमान से तंग इन इलाकों में “ गरम-द्वीप “ का विस्तार छोटे कस्बों तक हो सकता है। रेत की आंधियां कृषि भूमि को बंजर बना देंगी, जिससे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।
अंतर्राष्ट्रीय जर्नल ‘अर्थ साइंस इंफोरमैटिक्स’ में प्रकाशित एक शोध में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि अरावली पर्वतमाला में पहाड़ियों के गायब होने से राजस्थान में रेत के तूफान में वृद्धि हुई है। भरतपुर, धोलपुर, जयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे स्थान , जहां अरावली पर्वतमाला पर अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और हरियाली उजाड़ने की अधिक मार पड़ी है , को सामान्य से अधिक रेतीले तूफानों का सामना करना पड़ रहा है।
केंद्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान के पर्यावरण विज्ञानं के प्रोफेसर एल के शर्मा और पीएचडी स्कॉलर आलोक राज द्वारा किए गए इस अध्ययन का शीर्षक है “ एसेसमेंट ऑफ़ लेंड यूज़ डायनामिक्स ऑफ़ द अरावली यूजिंग इंटीग्रेटेड”।
यह गांठ बांध लें कि दिल्ली, राजस्थान के गैर मरुस्थलीय जिलों और हरियाणा का अस्तित्व भी अरावली पर टिका है और अरावली को नुकसान का अर्थ है कि देश एक अन्न के कटोरे पंजाब तक बालू के धोरों का विस्तार । रेत के बवंडर खेती और हरियाली वाले इलाकों तक ना पहुंचे इसके लिए सुरक्षा-परत या शील्ड का काम हरियाली और जल-धाराओं से सम्पन्न अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है।
इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ें जमा रहा है । सनद रहे भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीषण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है । खासकर गर्मी में यह धूल पूरे परिवेश में छा जाती है । मानवीय जीवन पर इसका दुष्परिणाम ठण्ड में दिखने वाले स्मोग से अधिक होता है ।
विडंबना है कि बीते चार दशकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की श्रंखला की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है।
गुजरात के खेड ब्रह्म से शुरू होकर कोई 692 किलोमीटर तक फैली अरावली पर्वतमाला का विसर्जन देश के सबसे ताकतवर स्थान रायसीना हिल्स पर होता है जहां राष्ट्रपति भवन स्थित है।
अरावली पर्वतमाला को कोई 65 करोड़ साल पुराना माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीन पहाड़ों में एक गिना गया है। ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक संरचना का बड़ा हिस्सा बीते चार दशक में पूरी तरह ना केवल नदारद हुआ, बल्कि कई जगह उतूंग शिखर की जगह डेढ सौ फुट गहरी खाई हो गई। असल में अरावली पहाड़ रेगिस्तान से चलने वाली आंधियों को रोकने का काम करते रहे हैं जिससे एक तो मरूभूमि का विस्तार नहीं हुआ दूसरा इसकी हरियाली, साफ हवा और बरसात का कारण बनती रही।
अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो दशकों में कई अन्य पहाड़ियों के अलावा, ऊपरी अरावली पर्वतमाला की हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में कम और मध्य उंचाई की कम से कम 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो गई हैं । ऊपरी स्तर पर पहाड़ियों का गायब होना नरैना, कलवाड़, कोटपुतली, झालाना और सरिस्का में समुद्र तल से 200 मीटर से 600 मीटर की ऊँचाई पर दर्ज किया गया था।
याद करें कोई तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से पूछा था कि आखिर कौन हनुमानजी ये पहाड़ियां उठा कर ले गए ? सन 1975 से 2019 के दौरान किए गए अध्ययन में, यह पता चला कि वन क्षेत्र में सघन बस्तियां बस जाना ,पहाड़ियों के गायब होने के प्रमुख कारणों में से एक थे।
अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि 1975 से 2019 के बीच अरावली की 3676 वर्ग किमी भूमि बंजर हो गई । इस अवधी में अरावली के वन क्षेत्र में 5772। 7 वर्ग किमी (7। 63 प्रतिशत) की कमी आई है । यदि यही हाल रहे तो 2059 तक कुल 16360। 8 वर्ग किमी (21। 64 प्रतिशत) वन भूमि पर कंक्रीट के जंग उगे दिखेंगे ।
ऐसे हालात में अंधड़ की मार का दायरा बढ़ेगा । अरावली पहाड़ का उजड़ना अर्थात वहां के जंगल और जल निधियों का उजड़ना, दुर्लभ वनस्पतियों का लुप्त होना । इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं । तेंदुए, हिरण और चिंकारा भोजन के लिए मानव बस्तियों में प्रवेश कर रहे हैं और मानव- जानवर टकराव के वाकये बढ़ रहे हैं । अंधड़ बढ़ने से भी जानवरों के बस्ती में घुसने की घटनाएँ बढ़ती हैं ।
यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिशत हिस्से पर हरियाली थी जो आज बमुश्किल सात फीसदी रह गई। जाहिर है कि हरियाली खतम हुई तो वन्य प्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गए। सनद रहे अरावली रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है।
कितना दुखद है कि जिस अदालत के बदौलत अरावली अपने अस्तित्व को बचाने का भरोसा सँजोये थी , उसी अदालत ने इसको उजाड़ने की इबारत लिख दी। यही नहीं इससे दिल्ली से उत्तराखंड तक और पंजाब तक बंजर, जल संकट और रेगिस्तान के विस्तार के भी शुरुआत होगी ।