नदी-नालों के किनारे बसी बस्तियों की आपदा संवेदनशीलता, क्लाउडबर्स्ट और वैज्ञानिक पुनर्विकास की आवश्यकता
अजय सहाय
भारत के हिमालयी क्षेत्र (उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम), अरावली (राजस्थान), नीलगिरी (तमिलनाडु), पश्चिमी और पूर्वी घाट जैसे पर्वतीय क्षेत्र जहां प्राकृतिक सौंदर्य, तीर्थ और पर्यटन का समन्वय मिलता है, वहां तेजी से हो रहा अनियोजित शहरीकरण, होटल निर्माण, कॉलोनी बसाना, और नदी-नालों के किनारे संरचना निर्माण अब भारी प्राकृतिक आपदाओं का केंद्र बनते जा रहे हैं।
उत्तराखंड का केदारनाथ, बद्रीनाथ, जोशीमठ, ऋषिकेश; हिमाचल का शिमला, मनाली, कसौली, किन्नौर; कश्मीर का पहलगाम, सोनमर्ग; और पूर्वोत्तर भारत का दार्जिलिंग, गंगटोक जैसे स्थान अब जलवायु परिवर्तन और क्लाउडबर्स्ट की तीव्रता की चपेट में हैं, जो संकेत करता है कि इन क्षेत्रों में नदी-नालों के किनारे की निर्माण संस्कृति वैज्ञानिक और नीति-आधारित पुनर्विचार की मांग करती है।
क्लाउडबर्स्ट, जिसे भारतीय मौसम विभाग (IMD) द्वारा “1 घंटे में 100 मिमी से अधिक वर्षा” की घटना कहा गया है, अब हिमालयी क्षेत्रों में बार-बार घटित हो रही है, और यह पर्वतीय ढलानों से तेजी से नीचे उतरकर उन सभी संरचनाओं को बहा देती है जो नदियों और नालों के पारंपरिक मार्ग में बनाई गई हैं।
वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार, क्लाउडबर्स्ट के दौरान ढलान से बहता जल 15 से 50 मीटर/सेकंड (54 से 180 किमी/घंटा) की रफ्तार से बहता है, जो किसी भी निर्माण को कुछ ही मिनटों में ध्वस्त कर सकता है।
उदाहरणस्वरूप, 2023 में केदारनाथ क्षेत्र में आए क्लाउडबर्स्ट में 5 लाख घन मीटर पानी केवल 2 घंटों में नीचे बहा था, जिससे मंदिर क्षेत्र के आसपास बने होटल, दुकानें और कॉलोनियाँ मलबे में बदल गईं। इसी तरह कसौली में 2024 की बाढ़ ने मुख्य सड़कों को बहा दिया और कसौली झील का जलस्तर सामान्य से 6 मीटर ऊपर पहुंच गया।
हिमालयन नदियों जैसे मंदाकिनी, पार्वती, ऋषिगंगा, भागीरथी, किशनगंगा, झेलम की जल वहन क्षमता सामान्यतः 30–100 क्यूसेक (1 क्यूसेक = 28.3 लीटर/सेकंड) होती है, लेकिन क्लाउडबर्स्ट के दौरान यह बढ़कर 3000 क्यूसेक (85,000 लीटर/सेकंड) तक पहुंच जाती है। ऐसे में यदि नदी के किनारे होटल, रिसॉर्ट, हाउसिंग कॉलोनी, सीवरेज लाइन, पक्की सड़कें मौजूद हों, तो वे इस दाब को सह नहीं पाते और आपदा घटित होती है।
परंतु सबसे बड़ी विडंबना यह है कि राज्य और जिला स्तर पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्राधिकरणों के दिशा-निर्देश होने के बावजूद स्थानीय निकाय, नगर निगम, पर्यटन विभाग, भूमि पट्टा विभाग इनकी उपेक्षा करते हैं और नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण की स्वीकृति दे देते हैं। NDMA की 2020 की हिल एरिया डेवलपमेंट गाइडलाइन स्पष्ट कहती है कि नदी और नाले के दोनों ओर 30 से 100 मीटर तक का क्षेत्र निर्माण मुक्त होना चाहिए, परंतु यह कहीं लागू नहीं किया गया।
आज जरूरत है कि हम हिमालयी क्षेत्र में नदी-नालों के दोनों ओर कम से कम 500 मीटर तक का “Prohibited Ecological Zone” घोषित करें, जहां कोई भी होटल, कॉलोनी, सड़क या संरचना न बने। बद्रीनाथ, अमरनाथ, केदारनाथ, कसौली जैसे तीर्थ और पर्यटन क्षेत्रों को “High Fragility Ecological Zones” के रूप में चिह्नित करके वहां विस्थापन आधारित पुनर्विकास नीति लागू की जानी चाहिए, ताकि तीर्थ और पर्यटन भी बचे और जीवन की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
उदाहरणस्वरूप, जोशीमठ आपदा 2023 में देखा गया कि भूधंसाव, रिसाव, और ढलान कटाव ने 800 से अधिक मकानों को असुरक्षित कर दिया — जबकि यह क्षेत्र अलकनंदा नदी के फ्लड जोन में था और वहां कॉलोनी, होटल, सेना के भवन तक बना दिए गए थे।
अब आवश्यक है कि GIS Mapping, Remote Sensing, LiDAR, Drone Survey, Hydrological Modeling जैसे वैज्ञानिक उपकरणों से नदी-नालों के पारंपरिक मार्ग, उनके फ्लड प्लेन, भूजल स्तर, भूधंसाव क्षेत्र, और रिसाव मार्गों को चिह्नित कर “Red Zone,” “Yellow Zone,” और “Green Zone” में बांटा जाए। इसी आधार पर सभी मौजूदा और प्रस्तावित निर्माण की समीक्षा हो, और जहां जरूरत हो, वहां Compensated Relocation (पुनर्वास) की नीति लागू की जाए। प्रति वर्ष प्री-मानसून ऑडिट द्वारा सभी ढलानों, पुलों, चेक डैम, रिटेनिंग वॉल्स, और ड्रेनेज सिस्टम की जांच की जानी चाहिए, ताकि जोखिम का आकलन हो सके।
वर्तमान स्थिति यह कहती है कि पर्यटकीय लाभ के नाम पर हम नदियों की राह में आ गए हैं — जैसे कि खीरगंगा नदी ने 2025 में अपने बंगाड़ और थला क्षेत्रों को पुनः निगल लिया, जिसे “धाराली गाँव” के नाम से नई कॉलोनी के रूप में बसाया गया था। 2024–25 की मॉनसून अवधि में हिमाचल प्रदेश में 80+ क्लाउडबर्स्ट और 1100 करोड़ से अधिक संपत्ति नुकसान, 400 से अधिक मौतें इसका प्रमाण हैं कि यदि अब भी हमने सबक नहीं लिया तो केदारनाथ जैसी त्रासदी हर घाटी में दोहराई जाएगी।
इसके समाधान के लिए नीति निर्माताओं को निम्नलिखित ठोस उपाय तत्काल अपनाने चाहिए:
1. नदी-नाले के किनारे 500 मीटर तक निर्माण निषेध क्षेत्र घोषित किया जाए।
2. सभी मौजूदा संरचनाओं का डिजास्टर इम्पैक्ट असेसमेंट (DIA) अनिवार्य किया जाए।
3. क्लाउडबर्स्ट संभावित क्षेत्रों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (AWS) और कम्युनिटी अलर्ट नेटवर्क स्थापित किए जाएं।
4. सभी तीर्थ और पर्यटन हिल स्टेशनों के लिए पृथक पुनर्विकास योजना और पुनर्वास नीति तैयार की जाए।
5. स्थानीय निकायों को पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन पर दंडित करने हेतु पर्यावरण ट्रिब्यूनल की स्थायी शाखाएं बनाई जाएं।
अंततः, “प्रकृति के साथ समन्वय” ही एकमात्र उपाय है, क्योंकि हिमालय हमें स्पष्ट संकेत दे रहा है — “दूरी बनाओ, जीवन बचाओ।” यदि हमने हिमालयी नदियों को उनकी राह नहीं लौटाई, तो वे स्वयं अपना रास्ता बनाकर हमें हटाने को विवश होंगी। अतः यह समय है नीति, विज्ञान, समाज और प्रशासन के समेकन का — ताकि आने वाले वर्षों में हम प्रकृति के साथ जी सकें, उसके विरुद्ध नहीं।