सांप बचेगा को धरती बचेगी
सांप बचेगा को धरती बचेगी

सांप बचेगा को धरती बचेगी

हर जीव, जंतु प्रकृति के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं

पंकज चतुर्वेदी

आदिकाल में मनुष्य  जिससे डरा, जिससे  उपकारित हुआ , उन सभी को पूजने लगा । हमारे पूर्वज जानते थे कि हर जीव, जंतु प्रकृति के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं सो हर जीव को किसी भगवान् या पर्व से जोड़ दिया ।  सावन माह की शुक्ल पंचमी को नाग पंचमी त्योहार मनाया जाता है, इस दिन नाग देवताओं की पूजा होती है ।

ध्यान दें, गर्मी में सर्प धरती के भीतर रहते हैं, गहरे में बाम्बी बना कर । आषाढ़ की हलकी बरसात में उन्हें मौसम बदलने का पूर्वानुमान हो जाता  है , जैसे ही सावन में बरसात की झड़ी लगती है और बाम्बियों में पानी भरने लगता है, सर्प सुरक्षित ठिकाने की तलाश में निकल आता है, यह समय उसके जीवन के लिए अमूल्य होता है ।  तभी पीढ़ियों पहले समाज ने इस ऋतु में नाग पंचमी का आख्यान स्थापित किया, ताकि लोग इससे डरे नहीं, इसकी पूजा करें और इसके नैसर्गिक जीवन में दखल न दें ।  

नागपंचमी का यह पर्व यह संदेश देता है कि नाग जाति की उत्पत्ति मानव को हानि पहुंचाने के लिए नहीं हुई है । नाग पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखते हैं । चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान देश है एवं नाग खेती को नुकसान करने वाले चूहे एवं अन्य कीट आदि का भक्षण कर फसल की रक्षा ही करते । मूलत: नागपंचमी नाग जाति के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करने का पर्व है। यह पर्व नाग के साथ प्राणी जगत की सुरक्षा, प्रेम, अहिंसा, करुणा, सहनशीलता के भाव जगाता है । साथ ही प्राणियों के प्रति संवेदना का संदेश देता है ।

भविष्य पुराण के पंचमी कल्प में नागपूजा और नागों को दूध अर्पित करने का जिक्र किया गया है । मान्‍यता है कि सावन के महीने में नाग देवता की पूजा करने और नाग पंचमी के दिन दूध अर्पित करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और नाग दंश का भय नहीं रहता है। इसका कारण यह है कि महाराज जनमेजय से नाग यज्ञ से नागों का शरीर जल गया था । नागों की रक्षा आस्तिक मुनि ने की और इनके जलते हुए शरीर पर दूध डालकर शीतलता प्रदान की ।

धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार नाग को दूध पिलाने से पाचन नहीं हो पाने या प्रत्यूर्जता से उनकी मृत्यु हो जाती है । इसलिए शास्त्रों में नागों को दूध पिलाने को नहीं बल्कि दूध से स्नान कराने को कहा गया है । लेकिन लोगों ने सांप को दूध पिलाने की परंपरा ही शुरू कर दी। जबकि इससे सांपों की जिंदगी पर बन आती है। जान लें न तो सांप को दूध पीना पसंद है और न ही वह उसका भोजन है ।  यह भी समझ लें कि सांप के  कान नहीं होते और वह किसी भी तरह से बीन की धुन पर नहीं नाचता ।  वह केवल बीन के हिलते हुए मुख के को देखते हुए हिलता है ।

 नाग पंचमी पर जबरदस्ती दूध के बर्तन में मुह देने से उसके फैंफडों में दूध चला जाता है जो उसकी मृत्यु का कारण बनता है । वहीं कई बार सांप को लगाए गए सिंदूर या कुमुकमु से उनकी आंख फूट जाती है । असल में हमारे पूर्वजों ने सांप को प्रति सम्मान या जागरूकता के लिए नाग पंचमी का पर्व प्रारंभ किया था।

आज हम सांप के प्राकृतिक पर्यावास में अपना घर बना चुके हैं, सो वह बस्तियों में आ जाता है। असल में हमने उनके घर पर अपनी बस्ती बनाई है । वास्तव में सांप उन चूहों व कीटों को चट कर जाता है जो कि किसान की मेहनत की बीस फीसदी तक फसल को नुकसान पहुचाते हैं। सांप को किसान का मित्र कहा जाता है। सांप संकेतक प्रजाति हैं, इसका मतलब यह है कि आबोहवा बदलने पर सबसे पहले वही प्रभावित होते हैं।

इस लिहाज से उनकी मौजूदगी हमारी मौजूदगी को सुनिश्चित करती है। हम सांपों के महत्व को कम महसूस करते हैं और उसे डरावना प्राणी मानते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि उनके बगैर हम कीटों और चूहों से परेशान हो जाएंगे। यह भी जान लें कि ‘सांप तभी आक्रामक होते हैं, जब उनके साथ छेड़छाड़ किया जाए या हमला किया जाए। वे हमेशा आक्रमण करने की जगह भागने की कोशिश करते हैं।’

खेत में अधिक कीटनाशक के कारण मेंढक सहित कई जीव तेजी से घटे . मेंढकों का इतनी तेजी से सफाया करने के बहुत भयंकर परिणाम सामने आए हैं। मेंढक पानी व दलदल में रहने वाला जीव है। इसकी खुराक हैं वे कीड़े-मकोड़े, मच्छर तथा पतंगे, जो हमारी फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं। अब हुआ यह कि मेंढकों की संख्या बेहद घट जाने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया। पहले मेंढक बहुत से कीड़ों को खा जाया करते थे, किंतु अब कीट-पतंगों की संख्या बढ़ गई और वे फसलों को भारी नुकसान पहुँचाने लगे ।

दूसरी ओर साँपों के लिए भी कठिनाई उत्पन्न हो गई । साँपों का मुख्य भोजन हैं मेंढक और चूहे, मेंढक समाप्त होने से साँपों का भोजन कम हो गया तो साँप भी कम हो गए । साँप कम होने का परिणाम यह निकला कि चूहों की संख्या में वृद्धि हो गई । वे चूहे अनाज की फसलों को चट करने लगे । इस तरह मेंढकों को मारने से फसलों को कीड़ों और चूहों से पहुँचने वाली हानि बहुत बढ़ गई । मेंढक कम होने पर वे मक्खी-मच्छर भी बढ़ गए, जो पानी वाली जगहों में पैदा होते हैं और मनुष्यों को काटते हैं या बीमारियाँ फैलाते हैं ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग के अंतिम राजा परीक्षित को तमाम यज्ञ, अनुष्ठान के बावजूद तक्षक नामक सर्प ने मार डाला था । परीक्षित अभिमन्यु के पुत्र थे, जिन्हें अश्र्वत्थामा ने उत्तरा के गर्भ में ही मार डाला था, लेकिन मृत रूप में जन्मे परीक्षित को योग-शक्ति से कृष्ण ने बचा लिया था, परीक्षित का आशय ही परीक्षण से है ।

संसार, आत्मा, परमात्मा के परीक्षण में अविवेक रूपी सर्प के डसने की आशंका निरंतर बनी रहती है । विकार रूपी कलियुग जब विवेक रूपी परीक्षित के राज्य में घुसने की कोशिश करने लगा तो दयाभाव में आकर परीक्षित ने सोना, जुआ, मद्य, स्त्री और हिंसा में कलियुग को स्थान दे दिया । इन्हीं पंचस्थलों से निकलने वाले सर्प मनुष्य के सुखद जीवन को डसते हैं ।

साँप को गुस्सा, क्रोध अहंकार से जोड़ा गया है क्योंकि उनके अंदर का विष किसी को भी खत्म करने के लिए काफी होता है तो उनमें अहंकार होना स्वाभाविक है लेकिन इतने शक्तिशाली होने के बाद भी अपने आपको स्थिर शांत और दयालु बनाए रखना महानता होती है नागपंचमी का पर्व अपने अंदर का क्रोध और अहंकार इसी व्रत पर्व के साथ खत्म करने की बहुत बड़ी सीख लिए होता है ।