ग्रामीण कचरा प्रबंधन के मिथक कचरा प्रबंधन से जुड़ी रणनीतियां
ग्रामीण कचरा प्रबंधन के मिथक कचरा प्रबंधन से जुड़ी रणनीतियां

ग्रामीण कचरा प्रबंधन के मिथक

कचरा प्रबंधन से जुड़ी रणनीतियां

आरती सचदेवा

भारत की 64% आबादी गांवों में रहती है। फिर भी सरकारों और नीति-निर्माताओं द्वारा कचरे की समस्या को एक शहरी चुनौती की तरह देखा जाता है। इसलिए आमतौर पर कचरा प्रबंधन से जुड़ी रणनीतियां शहरों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक, भारत ने साल 2021-22 में प्रतिदिन 1,70,338 टन कचरे का उत्पादन किया । लेकिन इन आंकड़ों में गांवों का कचरा शामिल नहीं है।

इसलिए राज्यों में कुल और प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन के आंकड़े सटीक नहीं माने जा सकते, क्योंकि इनमें ग्रामीण आबादी की प्रमुख भूमिका को नजरअंदाज कर दिया जाता है। पेयजल और स्वच्छता विभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए अंतिम सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिदिन 0.3 से 0.4 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है। इस अहम जानकारी का अभाव भारत की कचरा प्रबंधन की वास्तविक स्थिति को समझने में एक बड़ी बाधा है।

हालांकि सरकार ने इस समस्या को स्वीकारते हुए ग्रामीण स्वच्छता की बेहतरी के लिए ‘स्वच्छ भारत मिशन–ग्रामीण‘ जैसी पहलों की शुरुआत की है, लेकिन यह धारणा कि भारतीय गांव प्रदूषण या कचरे की समस्या से अछूते हैं, पूरी तरह से गलत है।

दरअसल, ग्रामीण भारत में कचरा उत्पादन और उसके प्रबंधन की प्रक्रिया उससे कहीं अधिक जटिल है, जितनी सतह पर दिखती है। इसे और भी गहराई से तब समझा जा सकता है जब हम ग्रामीण कचरा प्रबंधन से जुड़े प्रचलित मिथकों का विश्लेषण करते हैं।

मिथक 1: गांवों में लोग साफ हवा में सांस लेते हैं

दिल्ली और लखनऊ जैसे बड़े शहरों की तरह, भारत के गांवों को भी हवा की गिरती गुणवत्ता (बढ़ता एक्यूआई) की चुनौती से जूझ रहे हैं। गैर-शहरी इलाकों में होने वाले वायु प्रदूषण की मुख्य वजह खेती से निकले कचरे को जलाया जाना और लकड़ी-कोयला जैसे ईंधनों से खाना बनाना है। साहस में काम करते हुए, हमने यह भी देखा कि सर्दियों में निकलने वाला सूखा कचरा, गर्मियों की तुलना में बहुत कम होता है, क्योंकि सर्दियों में लोग आग तापने या खाना बनाने के लिए इसे जलाते हैं।

ग्रामीण इलाकों में वायु प्रदूषण की मुख्य वजह खेती से निकले कचरे को जलाना और लकड़ी-कोयला जैसे ईंधनों से खाना बनाना है।

मिथक 2: गांव के लोग पैकेज्ड चीजें नहीं खाते हैं

फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स (एफएमसीजी) सेक्टर ने भारतीय ग्रामीण परिवेश में पैकेज्ड खाद्य सामग्री और सुविधाजनक उत्पादों की बढ़ती मांग को भांपते हुए वहां अपने कदम तेज किए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती आय ने उपभोग के इस नए चलन को और बल दिया है। परंतु पैक खाद्य पदार्थों की अधिक खपत का सीधा संबंध नॉन-रिसायक्लेबल कचरे की मात्रा से भी है। ऐसे कचरे में कम गुणवत्ता वाली प्लास्टिक से बनी मल्टी-लेयर्ड पैकेजिंग शामिल होती है, जिसे न तो आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है और न ही रीसायकल किया जा सकता है।

मिथक 3: कचरे के ढेर एक शहरी समस्या हैं

आर्थिक विकास और उपभोक्ता वस्तुओं की बढ़ती उपलब्धता के कारण, जीवनशैली में आए बदलावों ने ग्रामीण भारत में उपभोग के तौर-तरीकों को काफी बदल दिया है। गांवों में भी पैकेज्ड सामान का इस्तेमाल बढ़ गया है। एफएमसीजी कंपनियों द्वारा छोटे-छोटे पैकेट में बेचे जाने वाले उत्पाद इस कचरा संकट को और भी जटिल बना रहे हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक देश ने साल 2021-22 में 1,70,338 टन/दिन कचरा उत्पादन किया है।

मिथक 4: गांव के सामुदायिक आयोजनों में कचरा नहीं होता है

गांवों में होने वाले सामुदायिक आयोजनों में अब सिंगल-यूज़ डिस्पोज़ेबल, यानी एक बार उपयोग होने वाले बर्तनों का चलन आम हो गया है। इनकी कम कीमत और आसान उपलब्धता इन्हें पारंपरिक बर्तनों का सस्ता और सुविधाजनक विकल्प बना देती है। नतीजतन, अब अधिकांश सामुदायिक कार्यक्रमों में ऐसे डिस्पोज़ेबल बर्तन इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जो अंततः ठोस कचरे के ढेर को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं।

डिस्पोजेबल प्लास्टिक के बने बर्तन अब गांवों में भी लोकप्रिय हो चुके हैं।

मिथक 5: सैनिटरी कचरा वेस्ट एक शहरी समस्या है

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत मासिक धर्म स्वच्छता योजना जैसी सरकारी पहल और जन-जागरूकता अभियानों की बदौलत ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों के लिए सस्ते दरों पर सैनिटरी नैपकिन्स की उपलब्धता में सुधार आया है। हालांकि, रिसोर्स रिकवरी (कचरे से मूल्यवान सामग्री निकालना) या रीसाइक्लिंग की व्यापक व्यवस्था के अभाव तथा जैव-चिकित्सीय कचरे को नष्ट करने की ऊंची लागत के चलते, सैनिटरी कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। इसके चलते कई गांवों में कचरा उठाने वाले अब प्लास्टिक की परतों से बने ‘सैनिटरी पिट’ तैयार कर इस कचरे को जमीन में गाड़ने लगे हैं।

कचरा इकट्ठा करने वाले स्थानीय लोग प्लास्टिक कवर लगे हुए गड्ढे बना रहे हैं।

मिथक 6: गांवों में कचरा न अलग होता है, न प्रबंधन की व्यवस्था होती है

वैसे तो यह सच है कि ज्यादातर गांवों में कचरा इकट्ठा करने या उसका प्रबंधन करने का कोई बुनियादी ढांचा नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे इस तरह की व्यवस्थाएं आकार लेने लगी हैं। घरों से ही कचरे को अलग-अलग किया जाना ग्रामीण कचरा प्रबंधन की, सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके लिए व्यवहार में बदलाव की जरूरत होती है।

हालांकि, ‘साहस’ संस्था की टीमों को ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी इलाकों की तुलना में व्यवहार परिवर्तन की दिशा में कहीं अधिक सफलता मिली है। कई गांवों में अब संसाधन पुनर्प्राप्ति केंद्र (रिसोर्स रिकवरी सेंटर) या सामग्री पुनर्प्राप्ति इकाइयां (मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी) भी स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि हर प्रकार के कचरे को वैज्ञानिक तरीके से संसाधित किया जा सके।

घरों से ही कचरे को अलग-अलग किया जाना, सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि इसके लिए व्यवहार परिवर्तन की जरूरत होती है।

हमारे शहर पहले ही ठोस कचरा निपटान की विकराल समस्या से जूझ रहे हैं। वह अक्सर इस बड़े संकट के आनन-फानन समाधान सुझाने के लिए आलोचनाओं का शिकार भी होते हैं। जैसे-जैसे हमारे गांवों की जीवनशैली में बदलाव आ रहे हैं, यह जरूरी है कि ग्रामीण क्षेत्र प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को ध्यान में रखते हुए स्थायी कचरा प्रबंधन की प्रणालियां विकसित करें।

‘साहस’ के प्रयासों के माध्यम से, हम स्थायी ठोस कचरा प्रबंधन को बढ़ावा देने के साथ-साथ इस क्षेत्र में हरित रोजगार (ग्रीन जॉब्स) सृजन के जरिए न्यायसंगत परिवर्तन (जस्ट ट्रांज़ीशन) को सक्षम बनाना चाहते हैं। इस प्रकार हम एक वास्तविक ‘सर्कुलर इकॉनमी‘ का उदाहरण भी प्रस्तुत कर पायेंगे।

साहस की फील्ड टीमों ने इस आलेख में सहयोग दिया है।

“यह लेख मूलतः इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू में प्रकाशित हुआ था और इसे यहां देखा जा सकता है।”