बाढ़, भूस्खलन या भूकंप की तरह प्रदूषण भी कोई प्राकृतिक घटना नहीं
कृष्ण नैन
बाढ़, भूस्खलन या भूकंप की तरह प्रदूषण भी कोई प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक वर्गीय और पूंजीगत संकट है। इसका मूल कारण वही अमीर वर्ग और कॉरपोरेट पूँजी है, जिसने प्रकृति को मुनाफे के लिए उपनिवेश बना डाला है। बड़े शहरों का फैलाव, विशाल कारखानों का धुआँ, निजी वाहनों की अंधाधुंध वृद्धि और बाजार की असीमित खपत—यही आज (19/10/25 ) के विषैले वातावरण के असली कारक हैं।
आज दिल्ली व गुरूग्राम में AQI 400 पार गोदी मीडिया की ही खबर है, तो सरकार और मीडिया मजदूर -किसानों पर दोष मढ़कर असल अपराधियों को बचाते रहे हैं। उसकी असलियत देखिये
आज के प्रदूषण में परिवहन 40-45%, सड़क व निर्माण- धूल 25-30%, उद्योग व थर्मल प्लांट 20-25%, घरेलू ईंधन व कूड़ा जलाना 5-7%, सजावटी गतिविधियां 2-3% एवं फसल अवशेष जलानें से आज वर्तमान में<1% प्रदूषण हैं।
🎯सारा जोर इस 1% से भी कम प्रदूषण पर हैं, किसानों के उपर सीधे मुकदमे बनाने के आदेश हैं, एवं ADC,SDM, तहसीलदार, कानूनगो, पटवारी सहित सभी की टीमें गठित हैं। भारी बरसात – सेम – बाढ़ में ठप्प पड़ें सेटेलाइट भी अब तुरंत लोकेशन बताते हैं ✍️
मजदूर -किसान, ग्रामीण – गरीब वर्ग जो प्रदूषण झेलता है, उसे ही उल्टा प्रदूषक घोषित कर दिया जाता है। यह वही वर्ग है जो बिना मास्क या एयर प्यूरीफायर के धूल-धुएँ में जीने को मजबूर है, जबकि अमीर वर्ग व उसका मीडिया स्वयं प्रदूषण पैदा कर एयर-कंडीशन कमरों /गाड़ियों में शरण लेकर इन्हें ही बदनाम करता है।
पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर बनाए गए करोड़ों के “ग्रीन फंड” कॉरपोरेट टैक्स रिबेट और ठेकेदारी के गड्ढों में समा जाते हैं। न तो सार्वजनिक परिवहन प्रयाप्त – सस्ता – सुलभ किया जाता हैं,न ही फैक्ट्रियों की निगरानी होती है, न कचरा प्रबंधन ईमानदारी से लागू। सरकार की मिलीभगत इतनी गहरी है कि वह हर साल वही औपचारिक मीटिंग और बेमतलब के प्रतिबंधों की पुनरावृत्ति में करोड़ों डकार जाता है।
दरअसल, अडानी अंबानी के भाजपाई पूंजीवाद का मूल सिद्धांत—अधिकतम लाभ—ही प्रदूषण का एकमात्र कारण है। उत्पादन बढ़ाओ, प्रकृति के संसाधनों की लूट बढ़ाओ, उपभोग बढ़ाओ—यह चक्र प्रकृति के शोषण पर आधारित है। शहरों के विज्ञापन, सजावट, “ग्रीन दीवाली” की बातें केवल एक नया बाजार खोलकर जनता को लूटने व बरगलाते की रणनीति हैं।
वास्तविकता यह है कि दीवाली के पटाखे या सजावट से होने वाला प्रदूषण कुल का 3–5% अगले दो दिनों में बढ़ेगा, परंतु उस पर मौन रहेगा, क्योंकि वह पूंजीपतियों के लाभ से जुड़ा हैं। खलता तो सिर्फ जीवन यापन करता मजदूर -किसान ही हैं।पराली जलानें को उछाला जाता है कि जनता असली मुद्दे—कॉरपोरेट जिम्मेदारी, औद्योगिक उत्सर्जन, और सरकारी मौन—से भटक जाए।
सच्चा मानवतावादी दृष्टिकोण यह कहता है कि पर्यावरण संरक्षण कोई अलग विषय नहीं, बल्कि वर्ग-संघर्ष का हिस्सा है। जो वर्ग उत्पादन के साधनों पर कब्जा रखता है, वही प्रकृति पर नियंत्रण रखता है। इसलिए प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई का अर्थ है—पूंजी के वर्चस्व को चुनौती देना। इसका समाधान तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक समानता ही है।
जब तक नीति निर्माण में मजदूर, किसान और जनसंगठन निर्णायक नहीं होंगे, तब तक प्रदूषण “नियंत्रित” नहीं, केवल “प्रबंधित” किया जाएगा—जैसे बीमारी की जड़ छिपाकर केवल लक्षणों पर मरहम लगाया जाए।
आज जरूरत है कि हर जागरूक नागरिक यह सवाल पूछे—
🎯 सार्वजनिक परिवहन क्यों सिकोड़ा जा रहा हैं?
प्रदूषण नियंत्रण के फंड कहाँ जाते हैं?
कारखानों के उत्सर्जन की जाँच कौन करता है?
सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती?
यह सवाल उठाना ही असली पर्यावरणीय जिम्मेदारी है। क्योंकि जब तक लाभ का गणित चलता रहेगा, तब तक पूंजीपतियों द्वारा हवा में जहर, पानी में रसायन और धरती पर धुआँ ही रहेगा।जंगल साफ होते रहेंगे, एक पेड़ मां के नाम का झूनझना पकड़ा दिया जाएंगा।
प्रकृति की रक्षा का अर्थ है – मजदूर -किसान, बेरोजगार और समाज की रक्षा। यही स्वच्छ पर्यावरण का रास्ता है। 🌱
लेख में शामिल प्रदूषण के आंकड़े
IIT kanpur, TERI,CPCB or SAFAR जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट पर आधारित औसत आंकड़े हैं।