जलवायु परिवर्तन की तीव्र होती आंधी और क्लाइमेट-आधारित बजट की अनिवार्यता
अजय सहाय
2025 का मॉनसून भारत के लिए फिर से एक चेतावनी लेकर आया जब “रिटर्निंग मॉनसून” यानी लौटता हुआ मानसून सितंबर के अंत और अक्टूबर के पहले सप्ताह में कई राज्यों में अत्यधिक वर्षा और फ्लैश फ्लड लेकर आया जिसने पूरे देश को हिला दिया और यह साबित कर दिया कि अब जलवायु परिवर्तन (Climate Change) केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों का विषय नहीं बल्कि एक जीवित, तीव्र और भयावह सच्चाई बन चुका है।
इस बार हुई भारी वर्षा के पीछे अनेक वैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारण रहे—वायुमंडल का अत्यधिक गरम होना, समुद्र की सतह के तापमान में लगातार वृद्धि, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में नमी वाले निम्न दाब क्षेत्रों का असामान्य निर्माण, पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) की अनियमित गतिविधियाँ और पर्वतीय क्षेत्रों में ऑरोग्राफिक प्रभाव (Orographic Effect) का तीव्र होना—इन सभी ने मिलकर ऐसा परिदृश्य बनाया जिसमें वातावरण एक जल-वाष्प भंडार में बदल गया और जब यह नमी ठंडी हवाओं से टकराई तो कुछ ही घंटों में कई इलाकों में एक महीने के बराबर वर्षा हो गई।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) और IIT रुड़की के अध्ययन बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष औसतन वर्षा 195% अधिक और उत्तराखंड में 96% अधिक दर्ज की गई, जबकि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कई जिलों में 70% से अधिक अधिकता रही।
“वेस्टर्न डिस्टर्बेंस” के साथ-साथ बंगाल की खाड़ी से आने वाले लो-प्रेशर सिस्टम की देरी से वापसी ने मॉनसून की अवधि को बढ़ा दिया जिससे अक्टूबर के पहले सप्ताह तक मानसून सक्रिय रहा और “रिटर्निंग मॉनसून” ने अपने साथ भयंकर फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और नदियों के उफान की स्थितियाँ पैदा कर दीं। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो पृथ्वी के तापमान में केवल 1.1°C की वृद्धि ने भी वायुमंडल की नमी धारण करने की क्षमता को लगभग 7% बढ़ा दिया है, जिसका सीधा अर्थ है कि अब बारिश की हर घटना पहले की तुलना में कहीं अधिक नमी के साथ होती है, और जब यह नमी संघनित होती है तो भारी वर्षा में परिवर्तित हो जाती है।
जलवायु परिवर्तन ने न केवल मॉनसून की अवधि को अस्थिर कर दिया है बल्कि उसकी तीव्रता को भी अप्रत्याशित बना दिया है; पहले जहाँ सामान्य वर्षा महीनों में होती थी, अब वही मात्रा कुछ ही घंटों में गिर रही है जिससे भूमि पर जल अवशोषण (infiltration) का समय ही नहीं मिल रहा और परिणामस्वरूप बाढ़ और फ्लैश फ्लड जैसी स्थितियाँ सामान्य होती जा रही हैं।
भूगोल और पर्यावरण की दृष्टि से भारत के विविध भू-आकृतिक क्षेत्र—हिमालयी पर्वत श्रृंखलाएँ, मध्य भारत के पठारी भाग, तटीय क्षेत्र और गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान—सभी अब जलवायु परिवर्तन की अलग-अलग मार झेल रहे हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र (जैसे हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर) में क्लाउडबर्स्ट और ग्लेशियर पिघलने की घटनाएँ बढ़ी हैं क्योंकि यहाँ तापमान वृद्धि ने बर्फ के पिघलने और वर्षा दोनों प्रक्रियाओं को तेज किया है।
पूर्वी भारत, विशेषकर बिहार, बंगाल और असम, अब ‘रिटर्निंग मॉनसून’ की सबसे बड़ी मार झेल रहे हैं क्योंकि बंगाल की खाड़ी का तापमान लगातार बढ़ रहा है और वहाँ बनने वाले लो-प्रेशर सिस्टम नदियों में अचानक जलस्तर वृद्धि का कारण बनते हैं। राजस्थान, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सूखा और बाढ़ एक ही मौसम में देखने को मिला—यह विरोधाभास ही जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रमाण है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भारत का औसत वर्षा वितरण अब “कम आवृत्ति, उच्च तीव्रता” (low frequency, high intensity) के पैटर्न में बदल गया है, जिसका अर्थ है कि वर्षा के दिन घट रहे हैं लेकिन जब भी बारिश होती है तो वह अत्यधिक होती है।
इसके पीछे की मूल वैज्ञानिक व्याख्या जलवायु प्रणाली के असंतुलन से जुड़ी है। बढ़ते तापमान ने समुद्रों से वाष्पीकरण (evaporation) की दर को बढ़ाया है, जिससे वायुमंडल में अधिक जलवाष्प जमा हो रही है। जब यह नमी ठंडी वायु से मिलती है या पर्वतीय क्षेत्रों से टकराती है तो तत्काल घनीभूत होकर भारी वर्षा कर देती है।
इसके अतिरिक्त, वायुमंडलीय परिसंचरण (atmospheric circulation) में बदलाव के कारण भारत में मॉनसून ट्रफ (Monsoon Trough) की स्थिति अस्थिर हो गई है, जो कभी उत्तर की ओर खिसक जाती है और कभी दक्षिण में रुक जाती है। इस परिवर्तन से कहीं अधिक वर्षा तो कहीं बिल्कुल सूखा जैसी स्थिति बनती है।
IMD के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में मॉनसून के दौरान देशभर में “अत्यधिक भारी वर्षा” (Extreme Heavy Rainfall) के 765 घटनाएँ दर्ज की गईं जो पिछले पाँच वर्षों में सर्वाधिक हैं। इन घटनाओं के दौरान कुछ क्षेत्रों में 24 घंटे में 250 मिमी से अधिक वर्षा दर्ज की गई, जिससे स्थानीय नदी तंत्र और शहरी जल निकासी प्रणाली पूरी तरह चरमरा गई।
केवल देहरादून, शिमला और धर्मशाला जैसे पर्वतीय शहरों में ही नहीं बल्कि जयपुर, भोपाल, पटना, हैदराबाद, चेन्नई और गुरुग्राम जैसे शहरी क्षेत्रों में भी जल-जमाव, सीवर बैकफ्लो और सड़क जलभराव की स्थितियाँ बनीं। इन शहरी बाढ़ों (Urban Floods) के पीछे मुख्य कारण है—कंक्रीटाइजेशन, प्राकृतिक जल निकासी तंत्र का अवरुद्ध होना, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और सोख्ता (Soak Pit) संरचनाओं की अनुपस्थिति, तथा वर्षा जल को भूजल में रिसने का अवसर न मिलना ।
अगर वैज्ञानिक डेटा की दृष्टि से देखें तो भारत की वार्षिक औसत वर्षा लगभग 1170 मिमी है, जो 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) के बराबर जल प्रदान करती है, लेकिन इसका केवल 1120 BCM ही उपयोग में लाया जा रहा है जबकि बाकी 2880 BCM या तो बहकर समुद्र में चला जाता है या बाढ़ का कारण बनता है। इसका अर्थ है कि भारत अपने वर्षा जल का केवल 28% ही प्रभावी रूप से उपयोग कर पाता है। यह आँकड़ा इस बात की पुष्टि करता है कि यदि हम वैज्ञानिक रूप से रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, वेटलैंड संरक्षण, नदी-झील पुनरुद्धार, और चेक डैम जैसी योजनाओं को व्यापक रूप से लागू करें तो बाढ़ और सूखा दोनों से लड़ सकते हैं।
अब यह स्पष्ट हो चुका है कि जलवायु परिवर्तन ने भारत के मानसून को अस्थिर और तीव्र बना दिया है। और इसी कारण अब भारत के सभी राज्यों को “Climate-Responsive Budget” बनाना आवश्यक है, ताकि आर्थिक नियोजन और प्राकृतिक जोखिम प्रबंधन एक-दूसरे के पूरक बन सकें। इसका पहला तर्क यह है कि अब किसी भी राज्य के लिए जोखिम पूर्वानुमान (Risk Forecast) स्थिर नहीं रह गया है।
वर्ष 2025 की अतिवृष्टि ने यह दिखा दिया कि एक ही वर्ष में एक राज्य बाढ़ की मार झेलता है और दूसरा राज्य सूखे से जूझता है, तथा अगले ही वर्ष परिदृश्य उलट सकता है। इस परिस्थिति में राज्य सरकारों को अपना वार्षिक बजट “जलवायु जोखिम” के अनुरूप तैयार करना होगा।
दूसरा तर्क है कि पूर्व तैयारी से राहत कार्यों पर होने वाला खर्च कम किया जा सकता है। जब राज्य पहले से ही अपने बजट में “आपदा-उत्तरदायी फंड” (Disaster Responsive Fund) रखेंगे, तो फ्लैश फ्लड, सूखा, चक्रवात या भूस्खलन जैसी घटनाओं के बाद राहत एवं पुनर्वास पर करोड़ों रुपये खर्च करने की नौबत नहीं आएगी।
तीसरा तर्क है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों की पारिस्थितिक विविधता अलग है—उत्तर में बर्फ़ीले ग्लेशियर, मध्य में पठार, दक्षिण में समुद्र तट, और पूर्व में नदी डेल्टा। इसलिए प्रत्येक राज्य का जलवायु बजट उसके भूगोल और पारिस्थितिकी के अनुरूप होना चाहिए। उदाहरण के लिए, बिहार को वर्षा आधारित जल संचयन और बाढ़ प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए, राजस्थान को भूमिगत जल पुनर्भरण और रेत संरक्षण पर, जबकि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश को सूखा और हीट वेव प्रबंधन पर।
इसके अलावा, “क्लाइमेट-बेस्ड बजट” बनाने का चौथा तर्क है कि यह सतत विकास (Sustainable Development) को सुनिश्चित करेगा। जब बजट का एक निश्चित हिस्सा हर वर्ष जल, हरियाली, वायु गुणवत्ता, ऊर्जा दक्षता और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के उपायों पर खर्च किया जाएगा, तो दीर्घकालिक रूप से पर्यावरणीय और आर्थिक स्थिरता दोनों प्राप्त होंगी। भारत जैसे देश के लिए यह केवल पर्यावरणीय निर्णय नहीं बल्कि आर्थिक अनिवार्यता बन चुका है, क्योंकि जलवायु आपदाओं के कारण भारत को हर वर्ष GDP का लगभग 2% से अधिक नुकसान उठाना पड़ता है।
इस दिशा में कुछ प्रमुख कदम उठाए जा सकते हैं—जैसे
(1) हर राज्य में जिला-स्तर पर Climate Risk Mapping की जाए ताकि यह पता चल सके कि कौन से ब्लॉक बाढ़, सूखा, भूस्खलन या तूफान के उच्च जोखिम क्षेत्र में आते हैं;
(2) “ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर” यानी पारिस्थितिक ढाँचों में निवेश किया जाए जैसे शहरी वेटलैंड, पार्क, तालाब, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग टैंक, नालों की सफाई और सोख्ता पिट निर्माण;
(3) कृषि क्षेत्र में क्लाइमेट-स्मार्ट तकनीकों का प्रयोग किया जाए—जैसे सूखा-रोधी बीज, ड्रिप इरिगेशन, माइक्रो-इरिगेशन और फसल विविधीकरण;
(4) हर ब्लॉक स्तर पर मौसम चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) को लागू किया जाए ताकि जनता समय रहते सतर्क हो सके;
(5) राज्य बजट में “Climate Adaptation and Mitigation Fund” नामक कोष रखा जाए, जिसमें राज्य अपने कुल बजट का कम से कम 5–7% हर वर्ष इस कार्य हेतु सुरक्षित रखे; (6) नगर निकायों और पंचायतों के वार्षिक योजनाओं में जलवायु परिवर्तन से जुड़े मापदंड जैसे ग्रीन कवर प्रतिशत, वर्षा जल संचयन लक्ष्य, और कार्बन सिंक वृद्धि को अनिवार्य किया जाए;
(7) हर वर्ष बजट के बाद “Climate Audit” कराया जाए ताकि यह मूल्यांकन किया जा सके कि पिछले वर्ष किए गए निवेश से पर्यावरणीय जोखिम कितना घटा।
2025 की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य नहीं बल्कि वर्तमान की सच्चाई है। चाहे हिमाचल के मंडी-किन्नौर में पहाड़ी ढहना हो, उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग और पौड़ी में फ्लैश फ्लड हो, बिहार के पश्चिम चंपारण और सीतामढ़ी में लौटते मानसून से नदी किनारे के गाँव डूबना हो, या मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे महानगरों में सीवर उफान—हर जगह यह एक साझा संकेत दे रहा है कि हमने अपने जल निकासी तंत्र, नदियों, तालाबों और वेटलैंड्स की उपेक्षा की है।
यदि अब भी हम “डिज़ास्टर के बाद बजट” की बजाय “डिज़ास्टर से पहले बजट” नहीं अपनाएँगे, तो आने वाले वर्षों में सामाजिक और आर्थिक क्षति कई गुना बढ़ जाएगी।
भारत के पास जलवायु-संवेदनशील बजटिंग के लिए अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी हैं। ब्रिटेन ने 2008 में “Climate Change Act” के बाद अपने हर विभाग को कार्बन उत्सर्जन और आपदा तैयारी के लिए वार्षिक रिपोर्ट देने का दायित्व दिया, जापान ने “Green Infrastructure Budget” लागू किया जिससे हर वर्ष पेड़ों की संख्या, शहरी हरियाली और रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की क्षमता पर फंडिंग होती है, और फ्रांस ने अपने बजट में “Climate Labeling” की व्यवस्था की जिससे हर योजना के पर्यावरणीय प्रभाव को मापा जाता है। भारत भी अब इसी दिशा में बढ़ सकता है—“ग्रीन बजटिंग”, “वॉटर बजटिंग” और “क्लाइमेट बजटिंग” को एकीकृत कर।
इस पूरे संदर्भ का निष्कर्ष यह है कि 2025 का रिटर्निंग मॉनसून और उससे उपजे फ्लैश फ्लड केवल एक मौसमीय घटना नहीं बल्कि एक सख्त सबक हैं। अब भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने विकास के हर आयाम—चाहे कृषि हो, जल संसाधन हो, शहरी नियोजन हो या ऊर्जा नीति—सबको “क्लाइमेट रेसिलियंट” बनाए।
राज्यों को चाहिए कि वे वर्ष 2026 के बजट से ही “क्लाइमेट चेंज बजट सेक्शन” जोड़ें, जिसमें जलवायु जोखिम मूल्यांकन, जल संचयन क्षमता, हरित कवर, नवीकरणीय ऊर्जा, और आपदा प्रबंधन के लिए पृथक राशि निर्धारित हो। इसके साथ-साथ शहरी और ग्रामीण दोनों स्तर पर रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, सोख्ता निर्माण, ड्रेनेज सुधार और वेटलैंड संरक्षण को बजट का अनिवार्य भाग बनाया जाए।
यदि भारत के सभी 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश अपने-अपने भूगोल, वर्षा-पैटर्न, और जोखिम सूचकांक के आधार पर वर्ष-भर का “क्लाइमेट बेस्ड बजट” तैयार करते हैं, तो न केवल जलवायु आपदाओं से बचा जा सकेगा बल्कि भारत 2047 तक “जल आत्मनिर्भर” और “जलवायु-सक्षम राष्ट्र” बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा सकेगा।
यह समय “प्रतिक्रिया” का नहीं, “पूर्व तैयारी” का है—क्योंकि अब जलवायु परिवर्तन सिर्फ भविष्य की बात नहीं, हमारे वर्तमान का यथार्थ बन चुका है, और यदि हमने इस वास्तविकता को बजट, नीति और योजनाओं में शामिल नहीं किया तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।