आज भी यहां के पानी के पीएच कीमत 7.2 से 7.5 है जोकि एक उच्च स्तर के मिनरल वाटर का मानक है। लेकिन खुले कुडों के पास चूने के कारखाने लगने से प्रणाली के पानी की पवित्रता भी प्रभावित हुई है। कुंडों के आसपास लोगों का रहना बढ़ता गया है।
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बर्बादी न रोकी तो बेपानी हो जाएगा देश
पानीजन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है। पूरी पृथ्वी पर एक अरब 40 घन किलोलीटर पानी है। इसमें से 97.5 प्रतिशत पानी समुद्र में है जोकि खारा है, शेष 1.5 प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में ध्रुवीय क्षेत्रों में है। बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुआं, झरना और झीलों में है जो पीने के लायक है।
Read moreपानी बचाना है तो बचाएं पारंपरिक जल-प्रणालियाँ
सन् 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई और देश की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख
करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया ।
बेंगलुरू के जल संकट का सबक
बंगलूरू के तालाब सदियों पुराने तालाब-शिल्प का बेहतरीन उदाहरण हुआ करते थे । बारिश चाहे जितनी कम हो या फिर बादल फट जाएं, एक-एक बूंद नगर में ही रखने की व्यवस्था थी । ऊंचाई का तालाब भरेगा तो उसके कोड़वे(निकासी) से पानी दूसरे तालाब को भरता था ।
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