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कहकशां नहीं, कहर है बारिश प्रकृति का उग्र चेहरा

कहकशां नहीं, कहर है बारिश का

प्रकृति का उग्र चेहरा सुनील कुमार महला मानव की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है और आज मानव अपनी इच्छाओं, लालच और सुविधाओं की अंधी […]

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बाढ़: प्राकृतिक आपदा या मानवजनित त्रासदी ?

बाढ़ – प्राकृतिक आपदा या मानवजनित त्रासदी ?

बरसात, जो कभी वरदान कहलाती थी सुनील कुमार इस साल देशभर में बारिश बहुत ज्यादा कहर मचा रही है। जगह-जगह तबाही का आलम है।बरसात, जो […]

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फोटो - गूगल

मानसून को जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा

मानसून शब्द असल में अरबी शब्द ‘मौसिम’ से आया है, जिसका अर्थ होता है मौसम। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरबी मल्लाह इस षब्द का इस्तेमाल करते थे।

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स्त्रोत - गूगल

पानी बचाना है तो बचाएं पारंपरिक जल-प्रणालियाँ

सन् 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिर्पाट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई  और देश  की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख
करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया ।

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