तबाही अकेले अरावली तक ही नहीं रुकतीतबाही अकेले अरावली तक ही नहीं रुकती

“ हर कोई शिखर पर पहुंचना चाहता है, लेकिन पहाड़ की चोटी पर कोई विकास नहीं होता। घाटी में ही हम हरी-भरी घास और उपजाऊ मिट्टी में मेहनत करते हैं, सीखते हैं और वह सब कुछ बनते हैं जो हमें जीवन के अगले शिखर तक पहुंचने में सक्षम बनाता है।” – एंडी एंड्रयूज

पंकज चतुर्वेदी

बीते 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह  अपने ही 20  नवंबर की आदेश पर रोक लगाते  हुए  अरावली पर्वत की  ऊंचाई 100 मीटर होने पर ही पहाड़ मानने और दो पहाड़ों के बीच की दूरी 500 मीटर से अधिक होने पर उसे पहाड़ की श्रंखला न मानने के आदेश पर 21 जनवरी 2026 तक रोक लगाई, यह महज चार राज्यों में फैली अरावली का ही सवाल नहीं हैं , यह प्रायः  उपेक्षित रहने वाले पूरे देश के “पहाड़ पर्यावरण” के संरक्षण का बड़ा कदम हैं ।

देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहिम चल रही हैं , लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्श है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

हजारों-हजार साल में गांव-शहर बसने का मूल आधार वहां पानी की उपलब्धता होता था। पहले नदियों के किनारे सभ्यता आई, फिर ताल-तलैयों के तट पर बस्तियां बसने लगीं। जरा गौर से किसी भी आंचलिक गांव को देखें, जहां नदी का तट नहीं है- कुछ पहाड़, पहाड़े के निचले हिस्से में झील व उसके घेर कर बसी बस्तियों का ही भूगोल दिखेगा। वहां के समाज ने पहाड़ के किनारे बारिश की हर बूंद को सहेजने तथा पहाड़ पर नमी को बचा कर रखने की तकनीक सीख ली थी।

हरे-भरे पहाड़, खूब घने जंगल वाले पहाड़ जिन पर जड़ी बूटियां थी, पंक्षी थे, जानवर थे। जब कभी पानी बरसता तो पानी को अपने में समेटने का काम वहां की हरियाली करती, फिर बचा पानी नीचे तालाबों में जुट जाता। भरी गरमी में भी वहां की शाम ठंडी होती और कम बारिश होने पर भी तालाब लबालब ।

बीते चार दशकों में तालाबों की जो दुर्गति हुई सो हुई, पहाड़ों पर हरियाली उजाड़ कर उसके पत्थर और खनिज निकाल कर गहरी खाईयां बना दी गईं, जहां बस्ती थी वहाँ झोपड़-झुग्गी उगा दी गईं। नंगे पहाड़ पर पानी गिरता है तो सारी पहाडी काट देता है, जिससे नदी- तालाब उथले हो गए ।

किसी को जमीन चाहिए थी तो किसी को पत्थर तो किसी को खनिज; पहाड़ को एक बेकार, बेजान संरचना समझ कर खोद दिया गया। भला हो अरावली का जिसके चलते अब समझ में आ रहा है कि नष्ट किए गए पहाड़ के साथ उससे जुड़ा पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही नष्ट हो जाता  है।

अरावली पर्वतमाला  में पहाड़ों की ऊंचाई

क्रमांकऊंचाईवर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल
120 मीटर तक1,07,494 व. किमी.
220 से 40 मी12,081 व. किमी.
340 से 60 मी5009 व. किमी.
4.60 से 80 मी2656 व. किमी.
580 से 100 मी1594 व. किमी.
6.100 से अधिक1048 व. किमी.

यानि 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई की पहाड़ियाँ कुल  श्रंखला का महज 8.71 प्रतिशत है ।

सुप्रीम कोर्ट  के 20 नवंबर 2025 के  आदेश के बाद जिस तरह कांग्रेस ने एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाते हुए अरावली के अस्तित्व को देश के लिए  अनिवार्य संरचना निरूपित कर जन  आंदोलन खड़ा किया , उससे सारे देश में पहाड़ों के प्रति  जागरूकता  उत्पन्न हुई हैं . यह किसी से छुपा  नहीं कि अरावली की तबाही वाला पहला असल में केंद्र सरकार की सिफारिश पर ही दिया गया था ।  

तब सरकार ने इस बात में कोई रूचि नहीं दिखाई थी कि अदालत को यह बताया जाए कि समूची पर्वतमाला एक ही धरती की कोख से उगी है और उसकी पारिस्थितकी  समान है , जिसमें  शिखर की ऊंचाई के आधार  पर  विभेद नहीं किया जा सकता, विखंडित नहीं किया जा सकता ।

पहले भी अदालत ने यह  माना था कि लगातार इसके नैसर्गिक स्वरूप से  छेड़छाड़ ने इसके मूल स्वभाव – पाकिस्तान की तरफ से आने  वाली गरम हवा और बालू को रोकने की दीवार , में रास्ता बना दिया  और इससे  रेगिस्तान के हौले-हौले कदम बढ़ने की संभावना है ।   

समझना होगा कि अरावली दो तरह से  देश के बड़े हिस्से को गर्मी और अंधड़ से बचाता रहा है । इसके ऊंचे शिखर हवा के साथ  बह कर आने वाले पी एम 2.5 कणों  को   रोकते हैं तो 30 मीटर तक की नीची पहाड़ियाँ भारी रेत और धूल के कणों को रोकती हैं।

जबकि एफएसआइ की रिपोर्ट के मुताबिक, 10 से 30 मीटर ऊंची छोटी पहाड़ियां भी तेज हवाओं को उसके साथ आने वाली रेत को थामने में सक्षम होती हैं। चूंकि  अरावली का 90 प्रतिशत हिस्सा  100 मीटर से काम ऊंचाई का है और अब वहाँ  खनन होगा   तो रेगिस्तान से उड़ने वाली धूल सीधे दिल्ली और इंडो-गैंगेटिक मैदानों (एनसीआर) तक पहुंचेगी।

यह किसी से छिपा नहीं हैं कि अभी तक  अरावली ने मरू भूमि के विस्तार को थामने में निर्णायक भूमिका निभाई है । यही नहीं  मानसून के पानी भरे बादलों को दिशा देने में इस पर्वत श्रंखला के मध्यम ऊंचाई वाले पहाड़ों की भूमिका रही है  और अब इन पहाड़ियों के गायब होने  की दशा में उत्तर-पश्चिम भारत में बरसात के स्वभाव में बदलाव आ सकता है ।

पहले से ही  बढ़ते तापमान से  तंग इन इलाकों में “ गरम-द्वीप “ का विस्तार  छोटे कस्बों तक हो सकता है। रेत की आंधियां कृषि भूमि को बंजर बना देंगी, जिससे किसानों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय जर्नल ‘अर्थ साइंस इंफोरमैटिक्स’  में प्रकाशित एक शोध में  पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि अरावली पर्वतमाला में पहाड़ियों के गायब होने से राजस्थान में रेत के तूफान में वृद्धि हुई है। भरतपुर, धोलपुर, जयपुर और चित्तौड़गढ़ जैसे स्थान, जहां अरावली पर्वतमाला पर अवैध खनन, भूमि अतिक्रमण और हरियाली उजाड़ने की अधिक मार पड़ी है , को सामान्य से अधिक रेतीले तूफानों  का सामना करना पड़ रहा है। 

केंद्रीय विश्वविद्यालय राजस्थान के पर्यावरण विज्ञानं के प्रोफेसर एल के शर्मा और पीएचडी स्कॉलर आलोक राज द्वारा किए गए इस अध्ययन का शीर्षक है “ एसेसमेंट ऑफ़ लेंड यूज़ डायनामिक्स  ऑफ़ द  अरावली यूजिंग इंटीग्रेटेड”।  

यह गांठ बांध लें कि दिल्ली , राजस्थान के गैर मरुस्थलीय जिलों और  हरियाणा का अस्तित्व भी अरावली पर टिका है और अरावली को नुकसान का अर्थ है कि देश एक अन्न के कटोरे पंजाब तक बालू के धोरों का विस्तार । रेत के बवंडर  खेती और हरियाली वाले इलाकों तक ना पहुंचे इसके लिए  सुरक्षा-परत या शील्ड  का काम हरियाली और जल-धाराओं से सम्पन्न अरावली पर्वतमाला सदियों से करती रही है। 

इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ें जमा रहा है । सनद रहे भारत के राजस्थान से सुदूर पाकिस्तान व उससे आगे तक फैले भीषण रेगिस्तान से हर दिन लाखों टन रेत उड़ती है ।  खासकर गर्मी में यह धूल पूरे परिवेश में छा जाती है ।

मानवीय जीवन पर इसका दुष्परिणाम ठण्ड में दिखने वाले स्मोग से अधिक होता है । विडंबना है कि बीते चार दशकों में यहां मानवीय हस्तक्षेप और खनन इतना बढ़ा कि कई स्थानों पर पहाड़ की श्रंखला की जगह गहरी खाई हो गई और एक बड़ा कारण यह भी है कि अब उपजाऊ जमीन पर रेत की परत का विस्तार हो रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट में कहा  गया है कि  पिछले दो दशकों में कई अन्य पहाड़ियों के अलावा, ऊपरी अरावली पर्वतमाला की हरियाणा और उत्तरी राजस्थान  में कम  और मध्य  उंचाई की कम से कम 31 पहाड़ियां पूरी तरह गायब हो गई हैं ।

ऊपरी स्तर पर पहाड़ियों का गायब होना नरैना, कलवाड़, कोटपुतली, झालाना और सरिस्का में समुद्र तल से 200 मीटर से 600 मीटर की ऊँचाई पर दर्ज किया गया था। याद करें कोई पाँच  साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने ही  सरकार से पूछा था कि आखिर कौन हनुमानजी  ये पहाड़ियां उठा कर ले गए ? सन 1975 से 2019 के दौरान किए गए अध्ययन में, यह पता चला कि वन क्षेत्र में सघन बस्तियां बस जाना ,पहाड़ियों के गायब होने के प्रमुख कारणों में से एक थे।

अध्ययन के परिणामों से पता चला है कि 1975 से 2019 के बीच अरावली की 3676 वर्ग किमी भूमि बंजर हो गई ।  इस अवधी  में अरावली  के वन क्षेत्र में 5772. 7 वर्ग किमी (7. 63 प्रतिशत) की कमी आई है ।  यदि यही हाल रहे तो 2059 तक कुल 16360। 8 वर्ग किमी (21. 64 प्रतिशत) वन भूमि पर कंक्रीट के जंग उगे दिखेंगे । 

ऐसे हालात में अंधड़ की मार का दायरा बढ़ेगा  ।  अरावली पहाड़ का उजड़ना अर्थात वहां के जंगल और जल निधियों का उजड़ना, दुर्लभ वनस्पतियों का लुप्त होना।  इसके दुष्परिणाम  सामने आ रहे हैं ।  तेंदुए, हिरण और चिंकारा भोजन के लिए मानव बस्तियों में प्रवेश कर रहे  हैं और मानव- जानवर टकराव के वाकये बढ़ रहे हैं । अंधड़ बढ़ने से भी जानवरों के बस्ती में घुसने की घटनाएँ बढ़ती  हैं ।

यह बेहद दुखद और चिंताजनक तथ्य है कि बीसवीं सदी के अंत में अरावली के 80 प्रतिशत हिस्से पर हरियाली थी जो आज बमुश्किल  सात फीसदी रह गई। जाहिर है कि हरियाली खतम हुई तो वन्य प्राणी, पहाड़ों की सरिताएं और छोटे झरने भी लुप्त हो गए।

सनद रहे अरावली  रेगिस्तान की रेत को रोकने के अलावा मिट्टी के क्षरण, भूजल का स्तर बनाए रखने और जमीन की नमी बरकरार रखने वाली कई जोहड़ व नदियों को आसरा देती रही है।

अदालत के भरोसे ही बची है अरावली!

अरावली पर खनन से रोक का पहला आदेश 07 मई 1992 को जारी किया गया। फिर सन 2003 में एमसी मेहता की जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई। कई-कई आदेश  आते रहे लेकिन दिल्ली में ही अरावली पहाड़ को उजाड़ कर वसंत कुंज सांस्थानिक क्षेत्र, होटल, रक्षा मंत्रालय की बड़ी आवासीय कालोनी बना दी गई। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर 2018 जब सरकार से पूछा कि राजस्थान की कुल 128 पहाड़ियों में से 31 को क्या हनुमानजी उठा कर ले गए? तब सभी जागरूक लोग चौंके कि इतनी सारी पाबंदी के बाद भी अरावली पर चल रहे अवैध खनन से किस तरह भारत पर खतरा है। सितंबर-2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को आदेश दिया था कि वह 48 घंटे में अरावली पहाड़ियों के 115.34 हेक्टेयर क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन पर रोक लगाए।

दरअसल राजस्थान के करीब 19 जिलों में अरावली पर्वतमाला निकलती है। यहां 45 हजार से ज्यादा वैध-अवैध खदाने है। इनमें से लाल बलुआ पत्थर का खनन बड़ी निर्ममता से होता है और उसका परिवहन दिल्ली की निर्माण जरूरतों के लिए अनिवार्य है। अभी तक अरावली को लेकर रिचर्ड मरफी का सिद्धांत लागू था ।

इसके मुताबिक सौ मीटर से ऊंची पहाड़ी को अरावली हिल माना गया और वहां खनन को निषिद्ध कर दिया गया था, लेकिन इस मामले में विवाद उपजने के बाद फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की नए सिरे से व्याख्या की।  फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक, जिस पहाड़ का झुकाव तीन डिग्री तक है उसे अरावली माना गया ।

इससे ज्यादा झुकाव पर ही खनन की अनुमति है, जबकि राजस्थान सरकार का कहना था कि 29 डिग्री तक झुकाव को ही अरावली माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने यदि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के तीन डिग्री के सिद्धांत को माना होता  तो प्रदेश के 19 जिलों में खनन को तत्काल प्रभाव से बंद करना पड़ता ।

कितना दुखद है कि जिस  अदालत के बदौलत  अरावली अपने अस्तित्व को बचाने का भरोसा सँजोये थी , उसी अदालत ने  इसको उजाड़ने की इबारत लिख दी। यही नहीं इससे दिल्ली से उत्तराखंड तक और पंजाब तक बंजर, जल संकट और रेगिस्तान के विस्तार के भी शुरुआत होगी  ।

अदालत की आड़ में  अवैध निर्माण को जायज किया

20 नवंबर से 29 दिसंबर के बीच  सरकार ने न केवल कुछ नए खनन के ठेके उठाया दिए, बल्कि  अरबों रुपये की  रसुखदार लोगों के निर्माण को भी वाइड कर दिया अरावली की पहाड़ी की गोदी में “पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए), 1900” के तहत 17,39,907 हेक्टेयर जमीन है ।

इस अधिसूचित भूमि में गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, अंबाला, पंचकूला, यमुनानगर, रेवाड़ी, भिवानी, चरखी दादरी, महेंद्रगढ़ और मेवात शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 के फैसले में कहा था कि पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए), 1900 के तहत आने वाली जमीन को वन भूमि माना जाएगा।

इस तर्क के आधार पर ही कोर्ट ने 2018 में फरीदाबाद में आवासीय कॉलोनी कांत एन्क्लेव में सभी इमारतों को गिराने का आदेश दिया था । सुप्रीम कोर्ट ने जब अपने सात जून 2021 के आदेश के क्रियान्वयन के लिए सरकारी अफसरों पर  सख्ती दिखाई तो फरीदाबाद नगर निगम क्षेत्र में सूरजकुंड से सटे खोरी गांव में 80 एकड़ में फैले कोई दस हजार मकान आनन-फानन में तोड़ दिए गए और कोई साठ हजार लोगों को सड़क पर ला दिया गया।

परंतु 22 अक्तूबर 2021 को ही हरियाणा सरकार कोर्ट को कहा कि अदालत का 2018 को फैसला कुछ गलत है और इसके पूरी तरह क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार असमर्थ है। 

अभी जब सुप्रीम कोर्ट ने  100 मीटर से कम ऊंचाई के  पहाड़ों पर  खनन की अनुमति दी तो उसी की याद में गुपचुप अरावली वन क्षेत्र में स्थित बहुत सारे  निर्माण को  हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HSVP) ने वैध बना दिया ।

केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की फॉरेस्ट  एडवाइजरी कमिटी (FAC) ने अरावली फॉरेस्ट में स्थित 67.68 हेक्टेयर भूमि पर बने सरकारी और अर्द्धसरकारी निर्माणों को सैद्धांतिक रूप से वैधता प्रदान कर दी है। इसके साथ ही ये निर्माण सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत चल रही तोड़फोड़ की कार्रवाई के दायरे से बाहर हो गए है।

FAC की यह मंजूरी पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट (PLPA) की धारा-4 के तहत अधिसूचित अरावली वन क्षेत्र में पहले से मौजूद निर्माणों को डायवर्जन पॉलिसी के अंतर्गत एक्स पोस्ट फैक्टो क्लियरेंस के रूप में दी गई है।