सदियों तक चले जलवायु संकट की वजह से खत्म हुई सिंधु घाटी सभ्यतासदियों तक चले जलवायु संकट की वजह से खत्म हुई सिंधु घाटी सभ्यता

4,450 साल पहले कई बार पड़ा सूखा, 0.5 डिग्री तक बढ़ा तापमान तो वर्षा में 10 से 20% तक की आई कमी

जलवायु संकट नया नहीं है। इसने सदियों से मानव सभ्यता को प्रभावित किया है। भारतीय शोधकर्ताओं के नेतृत्व में हुए एक नए अध्ययन ने सिंधु घाटी सभ्यता के पतन को लेकर चली आ रही अचानक विनाश की धारणा को खारिज किया है।

शोध के मुताबिक यह पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि सदियों तक चले सूखे, घटती वर्षा और बढ़ते तापमान से उपजे दीर्घकालिक जलवायु संकटों की श्रृंखला का नतीजा था, जिसने धीरे-धीरे इस उन्नत शहरी सभ्यता की सामाजिक-आर्थिक नींव को कमजोर कर दिया। अध्ययन बताता है कि सिंधु घाटी सभ्यता का अंत एक झटके में नहीं हुआ।

लंबे समय तक जारी जलवायु दबावों ने कृषि, जल उपलब्धता और बसावट के स्वरूप को प्रभावित किया, जिससे लोगों को चरणबद्ध तरीके से अपने शहर छोड़कर अन्य क्षेत्रों की ओर पलायन करना पड़ा ।

यह प्रक्रिया कई पीढ़ियों तक चली और अंततः सभ्यता का शहरी ढांचा बिखर गया। करीब 5,000 से 3,500 साल पहले अस्तित्व में रही सिंधु घाटी सभ्यता, जो आज के भारत पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में फैली थी, अपने दौर की सबसे उन्नत सभ्यताओं में गिनी जाती है। पक्की सड़कों, सुव्यवस्थित नालियों और उन्नत जल प्रबंधन प्रणालियों के बावजूद यह सभ्यता प्रकृति के लंबे संकटों के सामने टिक नहीं पाई।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, गांधीनगर से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में जलवायु मॉडल, गुफाओं में मौजूद स्टैलेक्टाइट स्टैलेग्माइट की रासायनिक संरचना और उत्तर-पश्चिम भारत की झीलों के जल स्तर के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। नतीजों से पता चला कि इस दौर में औसत तापमान लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, जबकि सालाना वर्षा में 10 से 20 फीसदी तक की गिरावट आई।

जर्नल कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित शोध के अनुसार, करीब 4,450 से 3,400 साल पहले कम से कम चार लंबे सुखे पड़े। हर सुखा 85 साल से अधिक समय तक चला और सभ्यता के 65 से 91 फीसदी क्षेत्र को प्रभावित किया। इसका अर्थ यह है कि जल संकट किसी एक पीढ़ी की समस्या नहीं था, बल्कि कई पीढ़ियों ने उसका प्रभाव झेला।

शोध में बताया गया- सदियों तक रहा था भीषण सूखा

शोधकर्ताओं ने नदियों के बहाव में बदलाव के आधार पर सिंधु क्षेत्र को चार हिस्सों ऊपरी सिंधु, मध्य सिंधु, निचला सिंधु और सौराष्ट्र में बांटा। सूखे के दौरान इन क्षेत्रों में पानी की कमी अलग-अलग स्तर की रही। 3,826 से 3,663 वर्ष और 3,531 से 3,418 वर्ष पहले पड़े सूखों में मध्य सिंधु क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ, जबकि सौराष्ट्र अपेक्षाकृत कम प्रभावित रहा।

अस्तित्व बचाने के लिए खेती की तकनीक भी बदली

पुरातात्विक साक्ष्य दिखाते हैं कि अलग-अलग नदी घाटियों में कृषि के तरीके स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप थे। 5,000 से 4,500 साल पहले बस्तियां अधिक वर्षा वाले इलाकों में केंद्रित थीं, लेकिन 4,500 साल बाद जल संकट गहराने पर बसावट सिंधु नदी के आसपास सिमटने लगी। करीब 3,531 से 3,418 साल पहले पड़ा 113 वर्षों तक चला भीषण सुखा मोहनजोदड़ो जैसे बड़े शहरों के कमजोर पड़ने और धीरे-धीरे खाली होने का कारण बना। जल संकट के दबाव में लोग बड़े शहरों से छोटी बस्तियों की ओर बढ़ने लगे।

सभ्यता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसने खुद को नए हालात के अनुसार ढाला। गेहूं-जी जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों की जगह सूखा सहने वाले मोटे अनाज अपनाए गए और लोग अधिक नमी वाले क्षेत्रों, जैसे पूर्व में गंगा के मैदानों और दक्षिण में सौराष्ट्र, की ओर चले गए।

धीरे-धीरे सब कुछ खत्म होता गया

वैज्ञानिकों के मुताबिक पानी का धीरे-धीरे जब जल स्रोत सूखने लगे और सूखे की अवधि लंबी होती चली गई, तो लोगों ने जीवन बचाने के लिए नई बसावटों की तलाश शुरू की। लेकिन जहां-जहां वे पहुंचे, वहां भी पानी की कमी ने टिकाऊ जीवन को असंभव बना दिया। कृषि ठप पड़ने लगी, मवेशियों के लिए चारा और पानी खत्म होता गया और पालतू व जंगली जानवर धीरे-धीरे लुप्त होने लगे।

अंततः यह स्पष्ट हो गया कि संकट किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे भूभाग को जकड़ चुका है। इसी व्यापक और दीर्घकालिक जलवायु संकट ने उस समय की एक समृद्ध, सुनियोजित और शक्तिशाली सिंधु घाटी सभ्यता की जीवन-रेखा को तोड़ दिया और उसका पतन हो गया।

विवेकपूर्ण प्रबंधन, बदलती जलवायु के अनुसार खेती और मजबूत सामाजिक-व्यापारिक नेटवर्क ही किसी भी सभ्यता के टिके रहने की असली कुंजी हैं।

साभार – अमर उजाला नेटवर्क