देश भर में मौसम इन दिनों तेजी से करवट ले रहा है
पंकज चतुर्वेदी
बीते दो साल ठंड के मौसम में पहाड़ों पर बर्फ देर से गिरी और ठंड भी कम हुई लेकिन इस बार भारतीय मौसम विभाग (आई एम डी ) और अंतर्राष्ट्रीय मौसम एजेंसियों के पूर्वानुमान इस ओर इशारा कर रहे हैं कि इस वर्ष (2025-2026) की सर्दी सामान्य से अधिक ठंडी और लंबी अवधि वाली हो सकती है।
यह संभावित “शीत लहर” भारत के जलवायु, कृषि, जंगल और वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करती है। नवंबर के तीसरे हफ्ते की शुरुआत में ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, उड़ीसा के की जिलों में ठंड का येलो अलर्ट जारी कर दिया गया है ।
देश भर में मौसम इन दिनों तेजी से करवट ले रहा है और ठंड का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है… दिल्ली में शीत लहर का असर और तेज होने की उम्मीद है.. वहीं उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा में भी शीत लहर का प्रकोप बढ़ सकता है… देश के उत्तरी हिस्सों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है, दक्षिणी राज्यों में बारिश और तूफान ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं ।
मौसम विभाग ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल में भारी बारिश की चेतावनी जारी की है, जिसकी वजह से चेन्नई और आसपास के कई जिलों में स्कूलों को बंद रखने का आदेश दिए गइ हैं ।
आईएमडी के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में एक निम्न दाब का क्षेत्र बना हुआ है… इसके ऊपरी वायुमंडल में चक्रवाती हवाओं का घेरा भी मौजूद है… जो आने वाले दिनों में देश के मौसम पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है ।
इस वजह से कुछ इलाकों में भारी बारिश और तूफानी हवाओं की संभावना भी बनी हुई है…. इसके असर से.. तमिलनाडु में 23 नवंबर तक कई जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश होगी…. केरल और माहे में 20 से 23 नवंबर तक बारिश का दौर रहेगा ।
इसी तरह अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में 19 से 22 नवंबर तक भारी से अति भारी बरसात हो सकती है… गरज-चमक के साथ आकाशीय बिजली की भी आशंका है… उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के कई मैदानी इलाकों में न्यूनतम तापमान सामान्य से 2-4 डिग्री सेल्सियस कम बना हुआ है… पश्चिम मध्य प्रदेश में 19 नवंबर तक कुछ हिस्सों में शीतलहर की स्थिति रह सकती है… 20-21 नवंबर को अलग-अलग जगहों पर शीतलहर रहेगी… पूर्वी राजस्थान, पूर्वी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मराठवाड़ा, तेलंगाना और विदर्भ में भी 20 नवंबर के दौरान अलग-अलग स्थानों पर शीतलहर की चेतावनी है… मछुआरों को सलाह दी गई है कि 22 नवंबर तक प्रभावित समुद्री क्षेत्रों में न जाएं….
ओडिशा के 4 जिलों में शीतलहर की चेतावनी
आईएमडी ने ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर और 4 जिलों के लिए शीतलहर की चेतावनी जारी की है… सोमवार को उदयगिरि 5.4 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ राज्य का सबसे ठंडा स्थान रहा… मंगलवार सुबह तक झारसुगुड़ा, खोरधा, सुंदरगढ़ और कंधमाल जिलों के लिए शीतलहर को लेकर येलो अलर्ट जारी किया गया ।
कटक, भुवनेश्वर और अंगुल में शीतलहर की स्थिति बनी रहेगी… ओडिशा के जिलों में न्यूनतम तापमान में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है… यह सामान्य से लगभग 5-7 डिग्री सेल्सियस कम है…. अचानक सर्दी पड़ने से ओडिशा के कई हिस्सों में सामान्य जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है… उत्तर भारत से लगातार आ रही उत्तर-पश्चिमी हवाओं के कारण शीतलहर की स्थिति बनी हुई है…
झारखंड के 7 जिलों के लिए शीतलहर अलर्ट
बता दें झारखंड के सात जिलों में शीतलहर की चेतावनी जारी की गई है…. राज्य के कई स्थानों पर तापमान 10 डिग्री सेल्सियस या उससे कम दर्ज किया गया… मंगलवार सुबह 8.30 बजे तक गढ़वा, पलामू, चतरा, लातेहार, लोहरदगा, गुमला और सिमडेगा जिलों के लिए येलो अलर्ट जारी किया गया… मौसम विभाग के मुताबिक, पारे में गिरावट उत्तर-पश्चिमी हवाओं के कारण हुई ।
पूर्वी हवाओं के आने से मंगलवार से गिरते पारे से आंशिक राहत मिलने की संभावना है, क्योंकि बंगाल की खाड़ी से कुछ नमी भी आएगी.. अगले तीन दिनों में न्यूनतम तापमान में 3-4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है और उसके बाद अगले दो दिनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा… यह समय विशेष सावधानी का है…. एक साथ शीतलहर और बारिश शरीर पर बुरा असर डाल सकती है ।
लोगों को गर्म कपड़े पहनने चाहिए, बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखना चाहिए… खुली हवा में लंबे समय तक रहने से बचें और सर्दियों में पर्याप्त पानी पिएं… IMD ने जो अलर्ट जारी किया है, उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए क्योंकि अगले 48 घंटे में मौसम काफी चुनौतीपूर्ण रहेगा…. IMD के मुताबिक, अगले 2-3 दिन में उत्तर भारत में ठंड लगातार बढ़ सकती है… बारिश का असर उत्तर-पूर्वी राज्यों और मध्य भारत में रहेगा ।
देश के कई हिस्सों में तापमान में गिरावट और बारिश के चलते ट्रैफिक और सामान्य दिनचर्या प्रभावित हो सकती है…. लोगों को यात्रा योजना में बदलाव करना पड़ सकता है… जिसमें स्थानीय प्रशासन ने जरूरी उपाय शुरू कर दिए हैं… वहीं मौसम विभाग भी जरूरी जानकारी की लगातार निगरानी कर रहा है….
राजस्थान में शीतलहर का अटैक, बारिश का दौर फिर होगा शुरू
राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी जिलों पर सर्दी के साथ बारिश का डबल हमला होने वाला है । भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने उदयपुर सहित कोटा, बूंदी, झालावाड़, बारां और चित्तौड़गढ़ जैसे इलाकों के लिए 21 से 27 नवंबर तक हल्की से मध्यम बारिश या बूंदाबांदी की संभावना जताई है ।
जयपुर केंद्र से जारी नए अलर्ट में कहा गया है कि मानसून के बाद फिर बादलों का साया मंडरा रहा है । अगर यहां बारिश होती है, तो तापमान में तेज गिरावट दर्ज हो सकती है, जिससे शीतलहर का असर और गहरा हो जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों जैसे हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रही बर्फबारी ठंडी हवाओं को मैदानी इलाकों तक पहुंचा रही है, जो पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव है ।
राजस्थान के उत्तरी और पूर्वी हिस्सों में कोल्ड वेव का असर सबसे ज्यादा देखा जा रहा है । सर्दी रिकॉर्ड तोड़ रही है । कई इलाकों में सुबह-शाम घना कोहरा छाने से दृश्यता कम हो रही है, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ गया है ।
इस वर्ष कड़ाके की ठंड पड़ने की प्रबल आशंका के पीछे सबसे बड़ा कारण ला नीना (La Niña) मौसमी परिघटना का मजबूत होना है। ला नीना, एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र का वह चरण है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से 0.5°C या उससे अधिक कम हो जाता है।
ला नीना उत्तरी गोलार्ध के वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर्न को प्रभावित करता है। इसके कारण, साइबेरियाई उच्च दबाव प्रणाली मजबूत होती है और उत्तरी-पश्चिमी ठंडी और शुष्क हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप में अधिक तेज़ी और तीव्रता से प्रवेश करती हैं। यह प्रवाह शीत लहर की आवृत्ति और अवधि को बढ़ा देता है।
मौसम विभाग की आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि मजबूत ला नीना वर्षों में (जैसे 1975-76, 1998-99, 2010-11, और 2020-21), उत्तर और मध्य भारत में न्यूनतम तापमान सामान्य से 2°C से 4°C तक नीचे दर्ज किया गया था। उदाहरण के लिए, 2020-21 की सर्दियों में, दिल्ली में दिसंबर में कई दिन 3.4°C तक तापमान दर्ज हुआ था, जो सामान्य से काफी कम था।
पश्चिमी विक्षोभ और उच्च हिमालयी बर्फबारी भी इस साल अपनी करामात दिखाएगी । इस वर्ष ला नीना के साथ-साथ भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आने वाले पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के भी अधिक सक्रिय रहने की संभावना है। ये विक्षोभ जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भारी और लगातार बर्फबारी करा सकते हैं।पहाड़ों पर जमा यह विशाल हिम भंडार मैदानी इलाकों में ठंडी हवाओं के लिए एक निरंतर स्रोत का काम करता है, जिससे शीतलन प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।
कड़ाके की ठंड और कृषि व खाद्य सुरक्षा पर बहुआयामी प्रभाव
कड़ाके की ठंड भारत की रबी की फसलों (मुख्यतः गेहूं, सरसों, दलहन) पर सीधा असर डालती है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
सकारात्मक प्रभाव
- गेहूं और तिलहन: गेहूं की वानस्पतिक वृद्धि और दाना भरने की प्रक्रिया के लिए 10°C से 20°C के बीच का तापमान आदर्श माना जाता है। लंबी अवधि की ठंड फसल को पर्याप्त चिलिंग आवर प्रदान करती है, जिससे उसकी गुणवत्ता और पैदावार में वृद्धि हो सकती है। जैसे कि 2020-21 की लंबी ठंड के बाद भारत का गेहूं उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचा था।
अत्यधिक ठंड की आशंका के मद्देनजर, सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत किसानों को पाले से सुरक्षा के लिए तकनीकी सलाह और वित्तीय सहायता देने की तैयारी कर सकती है।
नकारात्मक प्रभाव: पाला का खतरा
- पाला: यदि तापमान जमाव बिंदु (0°C) या उससे नीचे गिर जाता है, तो पौधों की कोशिकाओं में मौजूद पानी जम जाता है, जिससे उनके ऊतक नष्ट हो जाते हैं। इसे पाला कहते हैं।
- संवेदनशील फसलें: पाला आलू, टमाटर, मटर, बैंगन जैसी सब्जियों, पपीता और केला जैसे फलों और सरसों की फूलों वाली अवस्था को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाता है। राजस्थान और हरियाणा में अत्यधिक पाले के कारण आलू और सरसों की फसलों को बड़ा नुकसान होने के मामले ऐतिहासिक रूप से दर्ज हैं।
सरकारी नीतियां और उपाय:
मौसम विभाग चेतावनी: मौसम विभाग पाला पड़ने की संभावना पर चेतावनी जारी करता है। कृषि विभाग किसानों को रात में हल्की सिंचाई (जिसे पाला हटाना कहते हैं, क्योंकि पानी 0°C पर बर्फ बनने पर ऊष्मा उत्सर्जित करता है), खेत की मेड़ों पर धुआँ करना, और सल्फर आधारित फफूंदीनाशकों का छिड़काव करने की सलाह देता है।
अत्यधिक ठंड और भारी बर्फबारी जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र को बदल देती है और वन्यजीवों के जीवन को सीधे प्रभावित करती है। निचले और मध्य हिमालयी क्षेत्रों में, ठंड का अचानक बढ़ना पत्तियों के गिरने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। इसे पर्णपाती चक्र कहते हैं ।
इसके अलावा तहन्ड के आधिक्य से जंगली आग का जोखिम बढ़ जाता है । अत्यंत शुष्क और ठंडी हवाएँ जंगल के फर्श पर गिरी पत्तियों और झाड़ियों को पूरी तरह से सुखा देती हैं, जिससे शीतकालीन जंगल की आग (Winter Forest Fires) का खतरा बढ़ जाता है, खासकर मानवीय लापरवाही से।
यदि ठंड अधिक हो तो जंगल की जानवर भी इससे प्रभावित होते हैं । अधिक ऊंचाई पर रहने वाले जानवर जैसे हिम तेंदुआ और हिमालयी भूरा भालू जैसे जानवर तक बर्फबारी के लिए अनुकूलित हैं, लेकिन अत्यधिक और लगातार बर्फबारी उनके शिकार के रास्ते बंद कर देती है, जिससे उन्हें भोजन की तलाश में निचले इलाकों में आने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है।
यही नहीं शीत-निष्क्रियता (Hibernation) में जाने वाले साँपों, छिपकलियों और कीड़ों के जीवन चक्र पर गहरा असर पड़ता है, जो बदले में पक्षियों और छोटे शिकारियों की खाद्य श्रृंखला को बाधित करता है। ऐसे में वन विभाग को ऐसे वर्षों में वन्यजीव गलियारों की निगरानी बढ़ानी पड़ती है और गंभीर रूप से प्रभावित क्षेत्रों में जानवरों के लिए पूरक भोजन की व्यवस्था करनी पड़ सकती है।
कहने की जरूरत नहीं कि शीत लहर का सबसे सीधा प्रभाव मानव स्वास्थ्य और सार्वजनिक व्यवस्था पर पड़ता है। महानगरों में जलवायु, कोहरा और वायु प्रदूषण इसका स्थाई कुप्रभाव है ।
- स्मॉग (Smog): ठंडी, स्थिर हवाएँ, जिसे सीमांत परत (Boundary Layer) कहते हैं, वायुमंडलीय प्रदूषकों (जैसे PM2.5 और PM10) को सतह के पास फंसा लेती हैं। कम तापमान (Temperature Inversion) इस स्थिति को और गंभीर बनाता है, जिससे दिल्ली-NCR और गंगा के मैदानी इलाकों में घना और जहरीला स्मॉग छा जाता है। विदित हो दिसंबर 2023 और जनवरी 2024 में, दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई दिनों तक ‘गंभीर’ श्रेणी (400+) में बना रहा।
इस स्थिति से निपटने के लिए, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) को लागू करता है, जिसमें प्रदूषण के स्तर के अनुसार निर्माण कार्य पर प्रतिबंध और वाहनों पर सम-विषम योजना लागू की जाती है।
अधिक जाड़ा स्वास्थ्य जोखिम को न्योता देता है । अत्यधिक ठंड से हाइपोथर्मिया (Hypothermia), हृदय संबंधी दौरे (Cardiac Arrest) और श्वसन संबंधी बीमारियाँ बढ़ जाती हैं। बेघर और कमजोर आबादी सबसे अधिक प्रभावित होती है।
ऐसे में गरीबों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था, कंबल और गर्म कपड़े वितरित करना बड़ी जिम्मेदारी हो जाता है ।
कड़ाके की सर्दी एक क्षणिक मौसम घटना नहीं है, बल्कि बदलते वैश्विक जलवायु पैटर्न का एक मजबूत संकेत है। हमें इन बहुआयामी प्रभावों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक अनुकूलन और शमन रणनीतियों की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार और समाज को अभी से तैयारी करना होगी , खासकर हिमालय पर्वतमाला की गोद में भासे आठ राज्य और उसके आसपास के इलाकों में ।