हमें जन्म देने वाली स्त्री और नदियों को जन्म देने वाली अरावली—पर्वतमाला हमारी माँ है।
हमें जन्म देने वाली स्त्री और नदियों को जन्म देने वाली अरावली—पर्वतमाला हमारी माँ है।

हमें जन्म देने वाली स्त्री और नदियों को जन्म देने वाली अरावली—पर्वतमाला हमारी माँ है।

खनन अरावली की प्रकृति और संस्कृति—दोनों के विरुद्ध है।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह

अरावली के गर्भ से सैकड़ों नदियों का जन्म हुआ है, जो खनन एवं जल-शोषण के कारण सूख गई थीं। तरुण भारत संघ ने पिछले 50 वर्षों में दर्जनों नदियों को पुनर्जीवित किया है। जब नदियाँ सूखती हैं, तभी सभ्यता और संस्कृति भी कमजोर पड़ने लगती है। हमारी सभ्यता, संस्कृति और सरिता का बहुत गहरा संबंध है। इसी संबंध के कारण नर से निर्मित नारी और नदी को एक ही माना गया है।

समुद्र के खारे जल को सूर्य वशीकृत करके भाप (गैस) बनाता है। बादल भी जल के गैस-रूप ही हैं। बादलों को पुनः जल में बदलने का काम भारत की रेतली अरावली करती है, जो कि एकमात्र आदि पर्वतश्रेणी है। यह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाले बादलों के सामने आड़ी खड़ी होकर उन्हें वर्षा में परिवर्तित करती है।

अरावली भारत के ब्रह्मा-रूपी भगवान मानी गई है, इसलिए भारत के ऋषियों ने अरावली के मध्य पुष्कर में ब्रह्मा सरोवर और ब्रह्मा मंदिर बनाया था। यह पूरे भारत में एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है।

राजस्थान में जहाँ बादल उठते थे, वहीं अरावली के जंगल उन्हें बरसाते थे। खनन के कारण अरावली का तापमान 3 से 5 डिग्री तक बढ़ जाता है। पहले जयपुर की झालाना डूंगरी में खनन के कारण दोपहर बाद, जयपुर के अन्य हिस्सों की तुलना में, वहाँ का तापमान 1 से 3 डिग्री अधिक रहता था। सर्दियों में भी झालाना का तापमान जयपुर से अलग रहता था।

खनन अरावली की प्रकृति और संस्कृति—दोनों के विरुद्ध है। इससे हमारी पारिस्थितिकी बिगड़ती है। हाँ, कुछ खनन-मालिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है, परंतु अधिकतर लोगों को सिलिकोसिस जैसी भयानक बीमारियाँ हो जाती हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ता है और फिर बीमारी के कारण आर्थिक स्थिति भी खराब होने लगती है।

अरावली की हरियाली ही हमारी अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी का आधार है। जैसे हमारे शरीर का आधार हमारी रीढ़ है, वैसे ही अरावली भारत की रीढ़ है, इसलिए इसकी सुरक्षा आवश्यक है। अरावली को खनन-मुक्त करना ही भारत की समृद्धि का मार्ग है।

समृद्धि केवल आर्थिक ढाँचा ही नहीं है; हमारे जीवन-ज्ञान और जीवनविद्या ने हमें 200 वर्ष पूर्व तक 32% जीडीपी तक पहुँचाया था, तब भारत में बड़े पैमाने पर खनन नहीं था। हमारी खेती, संस्कृति और प्रकृति ने ही हमें समृद्ध बनाए रखा था।

सोने की चिड़िया को काटने वाली तकनीक आज एक ही खनन उद्यमियों के कब्जे में है। वह अरावली को कटवाकर इसमें से सब कुछ निकालने वाला है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अब उसी को जिम्मेदारी दी जा रही है। अरावली में बहुत खास सुरक्षा सामग्री भी है, इसलिए अचानक उसकी नज़र इस आड़े पहाड़ पर पड़ गई है।

अरावली के मूल आदिवासी भी अब खास खनन सामग्री निकालने हेतु हटाए जा सकते हैं। वन्यजीवों की तो बात ही क्या? वन-औषधियों की क्या अहमियत? जलवायु परिवर्तन, रेगिस्तान विस्तार, प्रदूषण, वर्षा चक्र के बदलाव, बाढ़–सुखाड़—इन सबको यह पहाड़ों से जुड़ा हुआ मानते ही नहीं।

जैसे अकेले रावण ने सभी कुछ अपने नियंत्रण में कर लिया था, वैसे ही आज का लोकतंत्र—पहाड़, नदी—सभी खनन उद्यमियों के बस में ही है। वह जो चाहे, न्यायपालिका, विधानपालिका, कार्यपालिका—सभी से करवाता है। अरावली में भी उसने वही करवा लिया है।

भारत के प्रधानमंत्री COP-15, COP-30 में क्या बोलकर आए हैं? उनके किए वादों की उद्यमियों के मन में कोई कीमत है? नहीं—उसके लिए नहीं। प्रधानमंत्री भी उसे बचाने हेतु सभी कुछ दाँव पर लगा देता है। ट्रंप–अमेरिका के साथ यही हुआ। भारत–अमेरिका रिश्ते तुड़वाने वाला भी वही है।

अब अरावली की समृद्धि का ढाँचा खनन में नहीं, बल्कि हरियाली में है। हरियाली से बादल रूठकर बिना बरसे कहीं और नहीं जाते; अरावली में ही अच्छी वर्षा करते हैं। वर्षा का पानी खेतों में खेती करने हेतु रोजगार के अवसर देता है। अरावली के जवानों को अरावली के जल के सहारे खेती-किसानी करने का अवसर मिलेगा।

विश्व पर्वत दिवस 11 दिसंबर 2025 को अरावली विरासत जन अभियान उक्त हवाओं को अरावली में आने से रोकने हेतु खड़ा है। अरावली पर्वतमाला और इसकी संस्कृति–प्रकृति को बचाने हेतु यह आंदोलन खड़ा हुआ है। अरावली का प्रत्येक वनवासी, जीव–जंतु, पेड़–पौधे, वन्यजीव—सभी आज जयपुर में संकल्पित हो रहे हैं। आड़ा पहाड़ खुद भी अपने विरोधियों को रोकेगा।

अब अरावली की समृद्धि का ढाँचा खनन में नहीं, बल्कि हरियाली में है। हरियाली से बादल रूठकर बिना बरसे कहीं और नहीं जाते; अरावली में ही अच्छी वर्षा करते हैं। वर्षा का पानी खेतों में खेती करने हेतु रोजगार के अवसर देता है। अरावली के जवानों को अरावली के जल के सहारे खेती-किसानी करने का अवसर मिलेगा।

अरावली के सभी बेटे–बेटियाँ संगठित होकर खड़े होकर इसे खनन-मुक्त बनाकर रखने में जुटे।