हाथी- मानव भिड़ंत क्यों बढ़ रही है ?हाथी- मानव भिड़ंत क्यों बढ़ रही है ?

झारखंड के उड़ीसा से सटे जिले पूर्वी सिंहभूमि में 9 दिनों में 19 लोगों को हाथी द्वारा मार देने की घटना हाथी के बदलते स्वभाव के प्रति चेतावनी हैं ।

पंकज चतुर्वेदी

झारखंड के उड़ीसा की सीमा से लगे पश्चिमी सिंहभूम जिले में  पिछले हफ्ते  नौ दिनों में  19 लोग जंगली हाथियों के पैरों तले कुचल कर मारे जा चुके हैं । पिछले एक महीने में छत्तीसगढ़ के कोरबा, बलरामपुर, जशपुर आदि में जंगली हाथियों के गाँव-बस्ती पर हमले की 50 से अधिक घटनाएं हुई जिसमें बहुत से खेत-मकान नष्ट हुए और दो लोग मारे भी गए ।

ओडिसा के बालासौर में  हाथियों से भयभीत प्रशासन ने दस दिनों के लिए स्कूल बंद करवा दिए । अभी 20 दिसंबर को ही असम के होजओई में रेलगाड़ी से टक्कर के बाद 9 हाथी मारे गए  थे। छत्तीसगढ़  का रायगढ़ जिले के ये आँकड़े चिंता बढ़ाते हैं कि वहाँ 25 सालों में  170 इंसानों और 75 हाथियों की मौत हुई है ।

जब  इस साल  बढ़िया बरसात हुई है, जंगलों में पर्याप्त हरियाली भी है और पानी भी , उसके बावजूद हाथी बस्ती में क्यों  आ रहा है ? आखिर उसका गुस्सा क्यों समाज  के लिए जानलेवा हो रहा है ?

बढ़िया मानसून के बाद भी हाथियों का आक्रामक होना यह दर्शाता है कि संकट केवल ‘भोजन’ का नहीं, बल्कि बदलते ‘पारिस्थितिकी तंत्र’ और हाथियों के ‘मानसिक स्वास्थ्य’ का है। एक बात गौर करने की है कि हाथियों के इस क्षेत्र में आमतौर पर अधिक सर्दी होती नहीं है लेकिन इस साल अप्रत्याशित ढंग से  यह  इलाका तापमान के बहुत काम होने की चपेट में हैं ।

जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों में ‘लैंटाना कमारा’  जैसी जहरीली झाड़ियाँ देशी घास को खत्म कर रही हैं। जंगल ऊपर से हरा दिखता है, लेकिन नीचे हाथियों के खाने योग्य चारा  खत्म हो चुका है। इसे वैज्ञानिक ‘ग्रीन डेजर्ट’ कहते हैं। जंगली चारे में पोषक तत्वों की कमी के कारण हाथी ‘हाई-प्रोटीन’ फसलों जैसे धान, मक्का और गन्ने की ओर आकर्षित होते हैं।

“भारत का एलीफेंट मैन” प्रोफेसर रमन सुकुमार के 2003 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, हाथी एक सोची-समझी रणनीति के तहत खेतों में आते हैं क्योंकि वहां उन्हें कम मेहनत में अधिक पौष्टिक आहार  मिलती है।

 इसके अलावा जब एक हाथी अपने पूर्वजों द्वारा इस्तेमाल किए गए रास्ते या कॉरीडोर  पर अचानक कोई सड़क, रेल लाइन या बिजली का पावर हाउस देखता है, तो वह ‘भ्रमित’ (Confused) हो जाता है। भ्रम की यह स्थिति तनाव पैदा करती है, और जब ग्रामीण उसे भगाने की कोशिश करते हैं, तो वह तनाव ‘आक्रामकता’ में बदल जाता है।

बीते कुछ सालों में हाथी के पैरों तले  कुचल कर मरने वाले इंसानों की संख्या तो बढ़ी ही पिछले  तीन सालों के दौरान लगभग  300 हाथी मारे गए हैं। सन 2018 -19 में 457 लोगों की मौत हाथी के गुस्से से हुई तो  सन 19-20 में यह आंकडा 586 हो गया ।  वर्ष 2020-21 में मरने वालों की संख्या 464, 21-22 में 545 और बीते साल 22-23 में 605 लोग मारे गए ।  

केरल के वायनाड जिले, जहां 36 फ़ीसदी जंगल है , पिछले साल हाथी- इंसान  के टकराव की 4193 घटनाएं हुई और इनमें 27 लोग मारे गए ।   देश में उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, असम , केरल, कर्णाटक सही 16 राज्यों में बिगडैल हाथियों के कारण इन्सान से टकराव बढ़ रहा है।  इस झगड़े में हाथी भी मारे जाते हैं।  

वन पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता को सहेज कर रखने में गजराज की  महत्वपूर्ण भूमिका हैं।  पयार्वरण-मित्र पर्यटन और और प्राकृतिक आपदाओं के बारे में पूर्वानुमान में भी हाथी बेजोड़ हैं। अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों में, आबादी हाथियों के आवास के पास रहते हैं और वन संसाधनों पर निर्भर हैं। तभी जंगल में मानव अतिक्रमण और खेतों में हाथियों की आवाजाही ने संघर्ष की स्थिति बनाई और तभी यह विशाल जानवर  खतरे है। जंगली हाथियों के बस्तियों में घुसने को किसी राज्य की सीमा  से बांधा जा नहीं सकता ।

यदि आंकड़ों पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि ओडिसा के हालात  हाथियों को ले कर इतने खराब है कि दंतैल और गुस्सैल हो गए जंगली हाथी  छत्तीसगढ़ और झारखंड में अपनी खीज मिटा रहे हैं ।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बैंगलुरु के एक अध्ययन में बताया गया था कि ओडिसा में उपलब्ध जंगल और संसाधन अधिकतम 1700 हाथियों के लिए है । जबकि आज यहाँ गजराज की संख्या 2100 से अधिक है । इस तरह 400 से अधिक हाथियों के लिए भोजन, पानी और आने पर्यावासीय संकट सामने दिख रहा है  और यह झुंड इधर उधर भटकता है ।

जानना जरूरी है कि हाथियों केा 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि।  की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटेां तक भटकना पड़ता है ।  हाथी दिखने में भले ही भारीभरकम हैं, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है । 

थेाड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है ।  ऐसे में थके जानवर के प्राकृतिक घर यानि जंगल को जब नुकसान पहुँचाया जाता है तो मनुष्य से उसकी भिडंत  होती है ।  यदि हाथियों के पास पर्याप्त बड़ा जंगल (कम से कम 500-1000 वर्ग किमी) नहीं है, तो वे मानव बस्तियों पर निर्भर हो जाते हैं । 

झारखंड जैसे राज्यों में जहां जंगल टुकड़ों में बंटा है, वहां संघर्ष को केवल ‘बाड़’ लगाकर नहीं रोका जा सकता। एक तरफ घने जंगल कम हो रहे हैं तो साथ ही जंगलों में निरंतर मानवजन्य  शोर जैसे कि खनन, रेल, सड़क परिवहन आदि बढ़ रहा है । इसके चलते हाथियों की नींद का चक्र प्रभावित होता है, जिससे उनमें चिड़चिड़ापन और क्रोध बढ़ता है।

झारखंड और छत्तीसगढ़ में कोयला और लौह अयस्क का खनन हाथियों के मुख्य आवासों में हो रहा है। ब्लास्टिंग के शोर और धूल से हाथी विचलित होकर गांवों की ओर भागते हैं।

साल 2018 में पेरियार टाइगर कन्जर्वेशन फाउंडेशन  ने केरल में हाथियों के हिंसक होने पर एक अध्ययन किया था ।  रिपोर्ट में  पता चला कि जंगल में पारंपरिक पेड़ों को काट  कर उनकी जगह नीलगिरी और बबूल  बोने से हाथियों का भोजन समाप्त हुआ और यही उनके गुस्से का कारण बना ।  पेड़ों की ये किस्म जमीन का पानी भी सोखती हैं सो हाथी के लिए पानी की कमी भी हुई । 

वन पारिस्थितिकी तंत्र और जैवविविधता को सहेज कर रखने में गजराज की  महत्वपूर्ण भूमिका है । अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों में, आबादी हाथियों के आवास के पास रहते हैं और वन संसाधनों पर निर्भर हैं।  तभी जंगल में मानव अतिक्रमण और खेतों में हाथियों की आवाजाही ने संघर्ष की स्थिति बनाई और तभी यह विशाल जानवर खतरे में है।  यह समस्या केवल वन विभाग की नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचा विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की है । हाथी की  उपस्थति स्वस्थ जंगल की निशानी है, अच्छा जंगल धरती पर इंसान के लिए अनिवार्य है ।  जलवायु परिवर्तन के दवाब में हाथी के बदलते स्वभाव को समझना अब सरकार और समाज दोनों कि जिम्मेदारी है ।