दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला का निधन
दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला का निधन

दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला का निधन

पन्ना टाइगर रिजर्व की शान रही हथिनी वत्सला अब नहीं रही।

अरुण सिंह , वरिष्ठ पत्रकार

तीन दशक से भी अधिक समय तक पन्ना टाइगर रिजर्व की शान रही हथिनी वत्सला अब नहीं रही । पन्ना टाइगर रिजर्व में आने वाले पर्यटक व वन्य जीव प्रेमी दुनिया की इस सबसे बुजुर्ग हथिनी का दीदार जरूर करते थे। लेकिन अब ऐसा संभव नहीं हो सकेगा क्योंकि हिनौता हांथी कैम्प में वत्सला नजर नहीं आएगी ।

म.प्र. के पन्ना टाइगर रिजर्व की धरोहर तथा बीते कई दशक से पर्यटकों और वन्य जीव प्रेमियों के लिए आकर्षक का केंद्र रही दुनिया की सबसे उम्रदराज हथिनी वत्सला का आज दोपहर लगभग डेढ़ बजे हिनौता हांथी कैम्प के निकट निधन हो गया ।

पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ. संजीव कुमार गुप्ता ने बताया कि हिनौता हांथी कैम्प के पास एक नरिया में वत्सला गिर गई थी, जो फिर उठ नहीं पाई । सौ वर्ष से भी अधिक उम्र की इस हथिनी की मौत से पन्ना टाइगर रिजर्व में जहाँ शोक का माहौल है वहीं वन्य जीव प्रेमी सहित पन्ना जिले के लोग भी दुखी हैं ।

शतायु पार कर चुकी हथिनी वत्सला की कहानी बेहद दिलचस्प तथा रहस्य व रोमांच से परिपूर्ण है । वत्सला मूलतः केरल के नीलांबुर फॉरेस्ट डिवीजन में पली-बढ़ी है । इसका प्रारंभिक जीवन नीलांबुर वन मंडल (केरल) में वनोपज परिवहन का कार्य करते हुए व्यतीत हुआ।   नीलांबुर ,  मलप्पुरम जिले में स्थित , वायनाड़ से सटा हुआ छोटा सा कस्बा हैं , जहां टीक वुड का म्यूजियम हैं , शायद दुनिया का एकमात्र म्यूजियम ।

इस हथिनी को 1971 में केरल से होशंगाबाद मध्यप्रदेश लाया गया, उस समय वत्सला की उम्र 50 वर्ष से अधिक थी । वत्सला को वर्ष 1993 में होशंगाबाद के बोरी अभ्यारण्य से पन्ना राष्ट्रीय उद्यान लाया गया, तभी से यह हथिनी यहां की पहचान बनी हुई है

विशेष गौरतलब बात यह है कि वत्सला की अधिक उम्र व सेहत को देखते हुए वर्ष 2003 में उसे रिटायर कर कार्य मुक्त कर दिया गया था । तब से किसी कार्य में उसका उपयोग नहीं किया गया । वत्सला का पाचन तंत्र भी कमजोर हो चुका था, इसलिए उसे विशेष भोजन दिया जाता रहा है । फरवरी वर्ष 2020 में वत्सला की दोनों आंखों में मोतियाबिंद हो जाने से उसे दिखाई भी नहीं देता था, फलस्वरुप चारा कटर मनीराम उसकी सूंड अथवा कान पकड़कर जंगल में घुमाने ले जाता था । बिना सहारे के वत्सला ज्यादा दूर तक नहीं चल सकती थी । हाथियों के कुनबे में शामिल छोटे बच्चे भी घूमने टहलने में वत्सला की पूरी मदद करते रहे हैं ।

वन्य प्राणी चिकित्सक डॉ एस. के. गुप्ता बताते हैं कि पन्ना टाइगर रिजर्व के ही नर हाथी रामबहादुर ने वर्ष 2003 और 2008 में दो बार प्राणघातक हमला कर वत्सला को बुरी तरह से घायल कर दिया था। डॉ गुप्ता ने बताया कि पन्ना टाइगर रिजर्व के मंडला परिक्षेत्र स्थित जूड़ी हाथी कैंप में नर हाथी रामबहादुर (42 वर्ष) ने मस्त के दौरान वत्सला के पेट पर जब हमला किया तो उसके दांत पेट में घुस गये।

 हाथी ने झटके के साथ सिर को ऊपर किया, जिससे वत्सला का पेट फट गया और उसकी आंतें बाहर निकल आईं। डॉ. गुप्ता ने 200 टांके 6 घंटे में लगाए तथा पूरे 9 महीने तक वत्सला का इलाज किया। समुचित देखरेख व बेहतर इलाज से अगस्त 2004 में वत्सला का घाव भर गया ।

लेकिन फरवरी 2008 में नर हाथी रामबहादुर ने दुबारा अपने टस्क (दाँत) से वत्सला हथिनी पर हमला करके गहरा घाव कर दिया, जो 6 माह तक चले उपचार से ठीक हुआ। हथिनी वत्सला अत्यधिक शांत और संवेदनशील थी। पन्ना टाइगर रिजर्व में हाथियों के कुनबे में बच्चों की देखभाल दादी मां की भांति करती रही है। कुनबे में जब कोई हथिनी बच्चे को जन्म देती है, तो वत्सला जन्म के समय एक कुशल दाई की भूमिका भी निभाती थी ।