जिस साबरमती को आदर्श बताया जा रहा है, पहले उसकी असलियत देख लेनी चाहिए।

यमुना रिवर फ्रन्ट  : नदी है नहीं, महज ज़मीन का सौदा

जिस साबरमती को आदर्श बताया जा रहा है, पहले उसकी असलियत देख लेनी चाहिए। साबरमती मूल रूप से मानसूनी नदी है जो अहमदाबाद के पास गर्मियों में सूख जाया करती थी। आज रिवरफ्रंट के भीतर जो पानी दिखता है, वह उसका अपना प्रवाह नहीं है। वासना बैराज के रास्ते नर्मदा नहर का पानी लाकर वहाँ डाला जाता है और बैराज उसे रोककर रखता है। नतीजा करीब ग्यारह किलोमीटर लंबी एक ठहरी हुई, कृत्रिम झील है जिसमें नावें चलती हैं और जिसके किनारे पर्यटक तस्वीरें खिंचवाते हैं। बैराज के नीचे उतरिए तो वही साबरमती फिर वैसी ही मटमैली और बदबूदार मिलती है। उच्च न्यायालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर इसके पानी की गुणवत्ता पर चिंता जताते रहे हैं। जिस परियोजना की सफलता के गीत गाए जाते हैं, उसने नदी को नहीं बचाया। उसने शहर के बीच एक सजा हुआ जलाशय बनाया और उसे दूसरी नदी के पानी से ज़िंदा रखा।

फिर यह परियोजना हुई ही क्यों, और इसका पैसा कहाँ से आया? इसका जवाब नदी में नहीं, ज़मीन में है। अहमदाबाद नगर निगम ने 1997 में साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन बनाई। परियोजना की लागत करीब बारह सौ करोड़ रुपये आँकी गई थी और यह तय था कि इसे नदी की “निकाली गई” ज़मीन बेचकर वसूला जाएगा। नदी के पाट को दोनों ओर से दीवारें खड़ी करके संकरा किया गया और इस तरह लगभग 202 हेक्टेयर ज़मीन निकल आई। प्रचार में बार-बार कहा जाता है कि इसका पचासी फीसदी हिस्सा सार्वजनिक उपयोग के लिए है। सही है, पर शेष चौदह-पंद्रह फीसदी हिस्सा व्यावसायिक और आवासीय निर्माण के लिए है, और यही असल कमाई है। नगर निगम के अधिकारियों ने कभी इस बिक्री से डेढ़ हज़ार करोड़ रुपये के राजस्व का अनुमान पेश किया था। हाल की एक नीलामी में नदी किनारे के दो व्यावसायिक भूखंडों का आधार मूल्य एक सौ बारह करोड़ रुपये प्रति भूखंड रखा गया, यानी साढ़े तीन लाख रुपये प्रति वर्ग मीटर। जो ज़मीन कभी नदी का पाट थी, वह आज अरबों के कारोबार का सामान है। साबरमती का “मॉडल” असल में नदी का नहीं, ज़मीन से पैसा बनाने का मॉडल है।

अब सोचिए कि यही मॉडल उस दिल्ली में आए जहाँ ज़मीन की कीमत अहमदाबाद से कई गुना ज़्यादा है। यमुना का बाढ़ क्षेत्र राजधानी के बीचोंबीच बची हुई सबसे बड़ी खुली सार्वजनिक ज़मीन है। दिल्ली विकास प्राधिकरण पहले ही इस बाढ़ क्षेत्र के करीब पंद्रह सौ हेक्टेयर को पैकेजों में बाँटकर “पुनर्स्थापन और कायाकल्प” की योजना बना चुका है। लोक निर्माण विभाग ने प्राधिकरण से कहा कि उसकी चल रही परियोजनाओं को जोड़कर एक अटूट रिवरफ्रंट बनाया जाए। यानी पहले से जो पार्क, घाट और कैफे बन रहे थे, उन्हें एक छतरी के नीचे लाया जा रहा है। जो विशेषज्ञ बरसों से यमुना पर काम कर रहे हैं, वे लगातार चेता रहे हैं कि इस रास्ते पर चलने का मतलब बाढ़ क्षेत्र का व्यावसायीकरण है। इस पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नदी का पाट संकरा होगा, किनारे कंक्रीट के होंगे और उससे निकली ज़मीन पर “विकास” होगा, तो उस ज़मीन का मालिक कौन होगा और उसका लाभ किसे मिलेगा? अब तक ऐसा कोई सार्वजनिक भू-उपयोग नक्शा सामने नहीं रखा गया है जो बताए कि कितनी ज़मीन खुली और हरी रहेगी और कितनी निर्माण के लिए जाएगी। जब तक यह साफ़ नहीं होता, आशंका जायज़ है कि रियल एस्टेट के लोग ही इसके असली लाभार्थी होंगे।

इस योजना को यमुना की सफ़ाई का नाम देना जनता में सबसे बड़ा भ्रम पैदा करता है। रिवर फ्रंट बनाने से नदी का पानी साफ़ नहीं होता। यमुना की दिल्ली में असली समस्या उसके पानी का न होना और जो है, उसका ज़हरीला होना है। दिल्ली में सीवेज शोधन संयंत्रों की कुल क्षमता लगभग 3,800 एमएलडी बताई जाती है, जबकि शहर में रोज़ छह हज़ार एमएलडी से ज़्यादा सीवेज निकलता है। यानी बड़ी मात्रा में गंदा पानी बिना शोधन के या आधे-अधूरे शोधन के बाद नालों के रास्ते नदी में पहुँचता है। नदी के पानी की जाँच में कई स्थानों पर घुलित ऑक्सीजन का स्तर शून्य के करीब पाया जाता है, और जो पानी बहता है उसमें फीकल कॉलिफॉर्म मानक से कई गुना ज़्यादा होता है। सरकार का दावा है कि अब कुछ हज़ार करोड़ रुपये की सीवरेज परियोजनाओं की नींव रखी जा रही है और आने वाले दो-ढाई साल में दिल्ली का कोई अनुपचारित गंदा पानी नालों से यमुना में नहीं जाएगा। यह दावा परखा जाना चाहिए, क्योंकि पहले भी हज़ारों करोड़ खर्च हुए हैं और नदी की हालत नहीं बदली। फिर भी अगर सफ़ाई ही असली मक़सद है, तो पैसा और ध्यान सीवेज शोधन और नालों की निगरानी पर जाना चाहिए, न कि दीवारों और घाटों पर। रिवर फ्रंट सफ़ाई की जगह एक सुंदर पर्दा बन जाता है जिसके पीछे नदी की बदहाली छिप जाती है।

नदी की ज़िंदगी का दूसरा आधार उसका नैसर्गिक प्रवाह है, जिसे तकनीकी भाषा में पर्यावरणीय प्रवाह या ई-फ्लो कहते हैं। राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान रुड़की के आकलन के हवाले से दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट बताती है कि मई जैसे सूखे महीने में हथिनीकुंड बैराज से ओखला बैराज के बीच यमुना में सिर्फ़ करीब दस क्यूमेक्स पानी रहता है, यानी लगभग 190 एमजीडी। नदी को जीवित रखने के लिए कम से कम 23 क्यूमेक्स, यानी करीब 437 एमजीडी पानी चाहिए। कमी बड़ी है और इसे पूरा किए बिना कोई रिवर फ्रंट, कोई घाट और कोई पार्क नदी में जान नहीं डाल सकता। यहाँ साबरमती और यमुना का फ़र्क़ और खतरनाक हो जाता है। साबरमती में पानी नर्मदा से आता है। यमुना तो पहले से ही हरियाणा और उत्तर प्रदेश में नहरों में बाँट दी जाती है और दिल्ली पहुँचते-पहुँचते वह पानी का नाला बन जाती है। दिल्ली के किनारे बनने वाले रिवर फ्रंट में पानी कहाँ से आएगा? पर्यावरण विभाग के अधिकारी खुद कह चुके हैं कि दिल्ली में यमुना शोधित सीवेज का पानी ढोएगी। तब जो बनेगा, वह नदी नहीं होगी। वह शोधित सीवेज का एक सजा हुआ तालाब होगा, जहाँ लोग घूमने जाएँगे और जिसे सरकार “ज़िंदा यमुना” कहेगी।

तीसरी बात बाढ़ क्षेत्र की है, जिसे हम अक्सर खाली और बेकार ज़मीन समझ लेते हैं। नदी केवल पानी का रास्ता नहीं होती। बरसात में जब वह उफनती है, तो उसे फैलने के लिए रेतीली, कच्ची ज़मीन चाहिए। यही ज़मीन बाढ़ के पानी को सोख लेती है, भूजल को भरती है और यहीं पनपने वाले सूक्ष्म जीव और वनस्पतियाँ पानी को स्वच्छ रखने का प्राकृतिक तंत्र बनाते हैं। यमुना के आसपास की मिट्टी सरंध्र है, इसलिए यह इलाका भूजल पुनर्भरण के लिए बेहद अहम है। 2023 की बाढ़ में यमुना ने जो रिकॉर्ड स्तर छुआ और जिस तरह पानी ने राजधानी के भीतर तक दस्तक दी, उसका एक बड़ा कारण यही था कि नदी का पाट और उसका फैलाव पहले से ही तटबंधों, सड़कों और निर्माणों से सिकुड़ चुका था। अब इसी पाट को और संकरा करके उस पर इमारतें, कैफे और आयोजन स्थल खड़े करने की बात हो रही है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण 2015 में ही यमुना के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण पर रोक लगा चुका है। इसके बावजूद सराय काले खाँ के पास “बाँस घर” नाम से कैफे और दूसरे निर्माण खड़े हो गए, और अब उसी इलाके में बाईस एकड़ पर रिवर फ्रंट बनाने की बात चल रही है। यह अधिकरण के आदेश की खुली अनदेखी होगी, जिसे “सौंदर्यीकरण” का नाम दे दिया जाएगा।

यह भी याद रखना चाहिए कि अगर साबरमती की तरह यहाँ भी नदी को दीवारों में बाँधा गया, तो बाढ़ का खतरा घटेगा नहीं, बल्कि सिर्फ़ दूसरी जगह सरक जाएगा। जिस पानी को फैलने की ज़मीन नहीं मिलेगी, वह ऊपर उठेगा और नीचे की बस्तियों को डुबोएगा। जब तक हरियाणा की सीमा तक यमुना की धारा अविरल नहीं आती और उसके उद्गम से लेकर मैदान तक जंगल और नदी का पाट सुरक्षित नहीं रहते, तब तक दिल्ली में कोई भी तकनीक यमुना को पूरी तरह साफ़ नहीं कर सकती। सीवेज शोधन संयंत्र ज़रूरी हैं, पर वे बीमार को दवा देने जैसे हैं। असली इलाज बहाव है। अगर नदी को बिना रोक-टोक बहने दिया जाए, तो दिल्ली कितना भी कचरा डाले, यमुना खुद अपने आप का एक बड़ा हिस्सा साफ़ कर लेगी। नदी में अपनी सफ़ाई की क्षमता होती है, बशर्ते हम उसे साँस लेने की जगह दें।

सरकार की ओर से कहा जा सकता है कि रिवर फ्रंट से लोगों को नदी तक पहुँच मिलेगी, हरियाली बढ़ेगी और सार्वजनिक स्थान बनेंगे। इसमें दम है। शहर के लोगों का नदी से रिश्ता टूट गया है और उसे जोड़ना ज़रूरी है। लेकिन यह काम बिना कंक्रीट, बिना पाट को संकरा किए और बिना ज़मीन बेचे भी हो सकता है। देशी पेड़ों वाला बाढ़ का मैदान, गीली भूमि, सुलभ पगडंडियाँ और घाट, यह सब नदी के स्वभाव के साथ चल सकता है। तब सवाल उठता है कि जब नदी के अनुकूल रास्ता उपलब्ध है, तो साबरमती जैसा रास्ता ही क्यों? इसका उत्तर शायद इसमें है कि हरी जगह से वोट तो मिलते हैं, पर ज़मीन से पैसा नहीं मिलता। रिवर फ्रंट में दोनों मिलते हैं।

योजना बनाने वालों से कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए। क्या बाढ़ क्षेत्र की एक भी इंच ज़मीन व्यावसायिक या आवासीय उपयोग के लिए बेची या पट्टे पर दी जाएगी? क्या पूरी परियोजना रिपोर्ट, पर्यावरण प्रभाव आकलन और भू-उपयोग का नक्शा आम लोगों के सामने रखा जाएगा? राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश का पालन कैसे होगा? नदी में पर्यावरणीय प्रवाह कौन और कब सुनिश्चित करेगा? और सबसे बुनियादी बात यह कि रिवर फ्रंट के भीतर जो पानी दिखेगा, वह कहाँ से आएगा? जब तक इन सवालों के जवाब सार्वजनिक नहीं होते, इसे नदी बचाने की योजना मानना कठिन है।

यमुना को किनारों का श्रृंगार नहीं, अपना पानी चाहिए। उसे पाट चाहिए, बाढ़ का मैदान चाहिए और ऐसी धारा चाहिए जो हथिनीकुंड से ओखला तक खुलकर बहे। रिवर फ्रंट अगर बना भी, तो उसके साथ यह दावा नहीं जुड़ना चाहिए कि इससे यमुना साफ़ होगी। साबरमती हमें यही सिखाती है कि पानी की चमक और नदी की ज़िंदगी एक चीज़ नहीं हैं। दिल्ली को यह सबक सीखने के लिए अहमदाबाद की नकल करने की ज़रूरत नहीं है। उसे बस यह समझना है कि जिस दिन यमुना के किनारे की ज़मीन नदी की नहीं, खरीदारों की हो जाएगी, उस दिन नदी की लड़ाई हम हार चुके होंगे।

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