इस बार देश के बड़े हिस्से में बरसात अनियमित हुई है । अल नीनो असर के चलते कम बरसात हुई और कुछ देर में ही आती वर्ष हुई । इसके चलते देश के पानी का रिजर्व स्टॉक बहुत कम रह गया है। मप्र और महाराष्ट्र सरकार ने अभी से कुछ पबनियाँ लगा दी हैं ताकि आने वाले दिनों के लिए कुछ पानी बचाया जा सके। यह लेख आने वाले जल संकट पर हैं ।

सावधान! जल संकट सिर पर खड़ा है

दक्षिण भारत में स्थिति सबसे अधिक संवेदनशील है, जहां कावेरी बेसिन में सामान्य से 60.50 प्रतिशत और पेन्नार बेसिन में 72.32 प्रतिशत कम पानी बचा है। विभिन्न राज्यों के विशिष्ट जलाशयों के आंकड़े इस गिरते जलस्तर की गंभीरता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। आंध्र प्रदेश के सोमासिला जलाशय में सामान्य भंडारण का केवल 22.05 प्रतिशत और श्रीशैलम में 33.64 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है। तमिलनाडु के मेट्टूर बांध में पानी का स्तर घटकर 32.49 प्रतिशत पर आ गया है, जबकि राज्य के 79 प्रतिशत सिंचाई स्रोतों का पानी या तो पूरी तरह सूख चुका है या क्षमता के एक-चौथाई से भी कम रह गया है। केरल के इडुक्की बांध में सामान्य का महज 10.62 प्रतिशत और महाराष्ट्र के उजनी जलाशय में भी केवल 10.62 प्रतिशत पानी ही शेष बचा है। इसके अलावा जायकवाड़ी में 15.55 प्रतिशत, मंजरा में 12.45 प्रतिशत और लोअर तेरना में 28.24 प्रतिशत जल भंडारण दर्ज किया गया है। कर्नाटक के घटप्रभा में 22.56 प्रतिशत और तुंगभद्रा में 22.54 प्रतिशत पानी उपलब्ध है, जबकि अलीयार जलाशय में यह स्तर लगभग शून्य के करीब पहुंच गया है। देश भर के 42 जलाशयों में पानी की मात्रा उनके सामान्य स्तर की तुलना में 50 से 80 प्रतिशत के बीच ही सिमट कर रह गई है। जल की इस व्यापक कमी का सबसे पहला और प्रत्यक्ष असर देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। भारत में रबी फसलों की बुवाई और सिंचाई काफी हद तक जलाशयों तथा नहरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर होती है। जलाशयों में जल भंडारण घटने से नहरों में जलापूर्ति कम की जा रही है, जिससे रबी सीजन में गेहूँ, चना और सरसों जैसी फसलों की बुवाई और उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। सिंचाई का जल न मिलने से किसानों की फसल लागत में वृद्धि हो रही है और पैदावार घटने का जोखिम गहरा गया है। इसके साथ ही, मिट्टी में नमी की कमी के कारण भूमि की उर्वरता पर भी दीर्घकालिक विपरीत प्रभाव पड़ता है।

कृषि संकट के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में मवेशियों और पशुधन प्रबंधन के सामने भी एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है। पानी की किल्लत के चलते चारागाह सूख रहे हैं और मवेशियों के पीने के पानी के पारंपरिक स्रोत जैसे पोखर, तालाब और कुएँ समय से पहले ही जलविहीन हो चुके हैं। राज्य सरकारें सूखा प्रभावित क्षेत्रों में चारे की किल्लत से निपटने के लिए चारा डिपो स्थापित करने की योजना बना रही हैं। पानी और हरे चारे की अनुपलब्धता का सीधा असर दुग्ध उत्पादन पर पड़ रहा है, जो ग्रामीण परिवारों की आय का एक मुख्य पूरक साधन होता है। संकट बढ़ने पर पशुपालकों को अपने मवेशियों को कम दामों पर बेचने या विस्थापित करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। पेयजल आपूर्ति की दृष्टि से भी आने वाले आठ-नौ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं।

देश के कई छोटे-बड़े शहरों में जल जीवन मिशन और स्थानीय निकायों द्वारा जलापूर्ति की राशनिंग शुरू की जा चुकी है। पानी के पाइपलाइनों में रिसाव, जल चोरी और अपव्यय को रोकने के लिए प्रशासन को सख्त नियम बनाने पड़ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल स्रोतों के सूखने से महिलाओं को पानी जुटाने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है। स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण आबादी को दूषित जल का उपयोग करना पड़ता है, जिससे जलजनित बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। अर्थव्यवस्था के स्तर पर जल संकट का प्रभाव केवल कृषि तक सीमित न रहकर बहुआयामी रूप धारण कर लेता है। खाद्यान्न उत्पादन में कमी आने से बाजार में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल आता है और मुद्रास्फीति बढ़ती है। इसके अलावा, देश की 20 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में से 12 से जुड़े जलाशयों में पानी का स्तर सामान्य या उससे कम दर्ज किया गया है। जलविद्युत उत्पादन में गिरावट आने से बिजली का संकट उत्पन्न हो सकता है, जिसका सीधा असर उद्योगों, विनिर्माण इकाइयों और वाणिज्यिक गतिविधियों की परिचालन लागत पर पड़ेगा।

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