2047 तक सुरक्षित पेयजल में 25% वृद्धि भारत का वैज्ञानिक और वैश्विक विज़न
2047 तक सुरक्षित पेयजल में 25% वृद्धि भारत का वैज्ञानिक और वैश्विक विज़न

2047 तक सुरक्षित पेयजल में 25% वृद्धि

भारत का वैज्ञानिक और वैश्विक विज़न

अजय सहाय

दुनिया में पानी बहुत है लेकिन पीने योग्य पानी बहुत कम है क्योंकि पृथ्वी के पूरे जल भंडार का सिर्फ 2.5–2.7% हिस्सा ही ताज़ा यानी फ्रेश वाटर है और यह भी पूरा पीने योग्य नहीं है, इसका लगभग दो-तिहाई हिस्सा ग्लेशियरों और बर्फ की मोटी चादरों में फँसा रहता है और जो बचता है उसका बड़ा हिस्सा दलदलों, नदियों, झीलों, आर्द्रभूमि और भूमिगत जल के रूप में होता है, इसलिए सीधे पीने योग्य पानी का उपलब्ध हिस्सा बहुत कम रह जाता है ।

भारत की स्थिति इससे भी अधिक कठिन है क्योंकि भारत के पास दुनिया की लगभग 18% जनसंख्या है लेकिन विश्व के मीठे पानी का हिस्सा लगभग 4% ही है, यानी मांग अधिक और स्रोत सीमित, इसी कारण भारत एक “जल-स्ट्रेस्ड” देश माना जाता है ।

भारत में सालाना लगभग 1869 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध होता है लेकिन उपयोग योग्य पानी केवल 1123 BCM माना जाता है जिसमें सतही जल लगभग 690 BCM और भूजल लगभग 433 BCM है, लेकिन यह पूरा भी पीने लायक नहीं होता क्योंकि इसका लगभग 80–90% पानी कृषि सिंचाई में चला जाता है, घरेलू जल उपयोग जिसमें पीने का पानी भी शामिल है केवल लगभग 7–10% होता है और उद्योगों में बहुत कम हिस्सा जाता है ।

इस तरह सीधे पीने योग्य पानी का उपलब्ध संसाधन बेहद कम रह जाता है, साथ ही इसमें प्रदूषण की समस्या भी जुड़ जाती है—कई जगहों पर जल स्रोत आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन, नाइट्रेट, TDS और E-Coli जैसे खतरनाक तत्वों से प्रभावित हैं, नीतिआयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत का लगभग 70% सतही जल किसी न किसी रूप में प्रदूषित है और लगभग 60 करोड़ लोग गंभीर जल-संकट का सामना कर रहे हैं, WHO और UNICEF के संयुक्त अध्ययनों में कहा गया है कि हर साल लाखों लोग असुरक्षित पानी के कारण बीमार पड़ते हैं ।

यानी भारत में समस्या केवल मात्रा की नहीं बल्कि गुणवत्ता की भी है, और इसी कारण भारत के लिए 2047 तक “ड्रिंकिंग वाटर में 25% वृद्धि” का लक्ष्य बहुत बड़ा लेकिन आवश्यक मिशन है ।

पीने योग्य पानी बढ़ाने का मतलब केवल पाइपलाइन बिछाना नहीं है, बल्कि पानी की उपलब्धता, गुणवत्ता, स्थिरता, पहुँच, वितरण, रिचार्ज, निगरानी और जनभागीदारी—इन सभी का सुधार एक साथ करना होता है, क्योंकि अगर नदी प्रदूषित है, तालाब सूख गए हैं, वेटलैंड खत्म हो रहे हैं, भूजल लगातार नीचे जा रहा है, सीवेज बिना ट्रीटमेंट के नदी में जा रहा है ।  

शहरी क्षेत्रों में 40–50% पानी पाइपों में ही लीक हो जाता है, खेती में 80–90% पानी खर्च हो जाता है—तो केवल पाइपलाइन सुधार से पीने का पानी नहीं बढ़ सकता । इसलिए भारत को एक बड़ा, संयुक्त, दीर्घकालिक और वैज्ञानिक समाधान अपनाना होगा जिसमें दुनिया के सफल मॉडल भी शामिल हों ।  

Singapore एक ऐसा देश है जहाँ प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत लगभग न के बराबर हैं लेकिन उन्होंने तकनीक, योजना, अनुशासन और प्रबंधन की मदद से दुनिया के सबसे सफल जल प्रबंधन मॉडल में अपना नाम दर्ज किया, Singapore ने अपनी पूरी जल व्यवस्था को “चार राष्ट्रीय नलिकाओं” यानी Four National Taps के तहत चलाया—

(1) वर्षा जल संचयन,

(2) NEWater यानी सीवेज को अत्याधुनिक तकनीक से शुद्ध कर पीने योग्य पानी बनाना, (3) समुद्री पानी को मीठा बनाने के लिए डी-सैलिनेशन, और

(4) आयातित पानी, इन चारों के संयोजन ने Singapore को लगभग जल-सुरक्षित बना दिया,

आज Singapore का लगभग 40% पानी रीसायकल्ड वेस्टवाटर यानी NEWater से मिलता है, बाकी समुद्री पानी को शुद्ध करके, इससे यह साबित होता है कि यदि सही तकनीक और इच्छाशक्ति हो तो सबसे छोटे और सीमित संसाधन वाले देश भी सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता बढ़ा सकते हैं ।

दूसरा बड़ा उदाहरण है Israel जो एक रेगिस्तानी देश है जहाँ बारिश कम होती है, प्राकृतिक जल स्रोत सीमित हैं लेकिन उन्होंने दुनिया का सबसे बड़ा समुद्री जल को मीठा बनाने वाला नेटवर्क तैयार किया, उन्होंने 80–90% सीवेज को ट्रीट करके कृषि में उपयोग किया, ड्रिप इरिगेशन की तकनीक को दुनिया भर में फैलाया और आज Israel दुनिया को तकनीक के माध्यम से पानी निर्यात करने वाला देश बन चुका है, यानी पानी बढ़ाने का समाधान सिर्फ प्रकृति पर निर्भर नहीं है बल्कि तकनीक और प्रबंधन पर है ।

तीसरा महत्वपूर्ण उदाहरण है कंबोडिया की राजधानी Phnom Penh, जहाँ 1990 में जल-संकट इतना भयानक था कि 72% पानी लीक हो जाता था, दबाव बहुत कम था, भ्रष्टाचार बढ़ा हुआ था, लेकिन उन्होंने मीटरिंग, पारदर्शिता, अवैध कनेक्शन हटाने, बिल वसूली सुधारने, और जल बोर्ड को स्वायत्त बनाने के बाद कुछ ही वर्षों में पानी की उपलब्धता 24×7 कर दी और non-revenue water 72% से 6% तक ला दिया, यह उदाहरण दिखाता है कि केवल पाइप बदलने से नहीं बल्कि प्रशासन और पारदर्शिता सुधार से भी पानी बढ़ाया जा सकता है ।  

जब दुनिया के ये तीन उदाहरण—Singapore (तकनीक + पुनर्चक्रण), Israel (सूखा + डी-सैलिनेशन + दक्षता), Phnom Penh (अच्छा प्रशासन + पारदर्शिता)—को हम भारत के संदर्भ में देखते हैं तो साफ दिखाई देता है कि भारत के पास 2047 तक पीने योग्य पानी को 25% बढ़ाने के बेहद स्पष्ट, व्यावहारिक और वैज्ञानिक रास्ते मौजूद हैं ।

पहला बड़ा कदम होगा देश में “नेशनल ड्रिंकिंग वाटर सिक्योरिटी मिशन–2047” चलाना जिसमें सभी जल योजनाओं—जल जीवन मिशन, नमामि गंगे, MGNREGA NRM, अटल भूजल योजना, अमृत योजना, स्मार्ट सिटी, जल शक्ति अभियान—इन सबको एक साथ जोड़कर पानी का एकीकृत मिशन बनाया जाए जहाँ लक्ष्य हो—हर नागरिक को 24×7 सुरक्षित पीने योग्य पानी ।  

दूसरा कदम होगा “वर्षा की हर बूंद को रोकना” क्योंकि भारत में सालाना 4000 BCM बारिश होती है लेकिन सिर्फ 1123 BCM ही उपयोग होता है, अगर हम 100–150 BCM अतिरिक्त वर्षा जल को रोक लें तो पीने योग्य पानी का आधार 25% बढ़ सकता है, इसे रिचार्ज शाफ्ट, रिचार्ज ट्रेंच, चेक डैम, वेटलैंड पुनर्जीवन, खेत तालाब, पहाड़ी क्षेत्रों में कंटूर ट्रेंचिंग, शहरी क्षेत्रों में अनिवार्य रेन हार्वेस्टिंग से हासिल किया जा सकता है ।

तीसरा कदम होगा जल गुणवत्ता सुधारना—हर शहर में 100% सीवेज ट्रीटमेंट, हर उद्योग में CETP, नदियों में रियल-टाइम सेंसर, हर पंचायत में जल जांच किट, महिलाओं को फील्ड टेस्ट किट देना, स्कूलों में “जल प्रहरी क्लब” बनाना ताकि प्रदूषण कम हो और सुरक्षित पानी बढ़े ।

चौथा कदम होगा खेती में पानी की बचत—ड्रिप, स्प्रिंकलर, मिलेट आधारित फसलें, फसल चक्र, ताकि कृषि में पानी का उपयोग 80–90% से घटकर लगभग 60–65% तक आ जाए और बचा पानी घरेलू और पीने के उपयोग में आए ।

पाँचवाँ कदम होगा शहरी पानी की बर्बादी रोकना—क्योंकि भारत के शहरों में लगभग 40–50% पानी पाइपों में ही लीक हो जाता है, अगर इसे 10–15% तक ला दिया जाए तो शहरों को बिना कोई नया जल स्रोत बनाए 10–15% अतिरिक्त पानी मिल सकता है ।

छठा कदम है तटीय राज्यों में डी-सैलिनेशन प्लांट स्थापित करना, जिससे समुद्र भारत के लिए नया मीठा पानी स्रोत बन सके ।

सातवाँ कदम है सीवेज और वेस्ट वॉटर को ट्रीट करके इसे उद्योग, पार्क, फ्लशिंग, सफाई और सिंचाई में उपयोग करना ताकि फ्रेश वाटर केवल पीने के लिए बचा रहे ।

आठवाँ कदम है भूजल शासन—हर ब्लॉक का वार्षिक भूजल बजट, ट्यूबवेल नियंत्रण, भूजल रिचार्ज को अनिवार्य बनाना, Atal Bhujal Yojana का पूरे देश में विस्तार, हर शहर में रेन हार्वेस्टिंग 100% लागू।  

नौवाँ कदम है कानूनी सुधार—पेयजल को कानूनी अधिकार घोषित करना, प्रदूषण पर सख्त दंड देना, वेटलैंड-नदी-झीलों के लिए सुरक्षा कानून बनाना ।

दसवाँ कदम है डिजिटल वॉटर ग्रिड—ISRO, CGWB, CWC, CPCB, IMD सभी का डेटा जोड़कर एक राष्ट्रीय वॉटर ग्रिड तैयार करना ताकि हर जिले, हर ब्लॉक के पानी का रियल-टाइम डेटा मिले और सरकारें तथा जनता दोनों मिलकर पानी का बेहतर प्रबंधन कर सकें।  

इन सभी कदमों को जब Singapore की तकनीक, Israel की दक्षता और Phnom Penh की पारदर्शिता के साथ जोड़ा जाएगा तो भारत 2047 तक पीने योग्य पानी को 25% बढ़ाने में सफल हो सकता है और यह सिद्ध कर सकता है कि पानी की समस्या कभी “कमी” से नहीं बल्कि “कमजोर प्रबंधन” से पैदा होती है, और जब पूरा देश, सरकार, पंचायतें, शहर, स्कूल, युवा और किसान मिलकर “हर बूंद बचाओ, हर बूंद का सही उपयोग करो और हर बूंद को स्रोत तक वापस पहुँचाओ” का मंत्र अपनाएंगे तो 2047 तक भारत का सपना—

“हर नागरिक को सुरक्षित पीने योग्य पानी”—पूरी तरह पूरा हो सकता है और आने वाली पीढ़ियाँ जल-संकट से दूर, सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य जी सकेंगी ।