विकास बनाम विनाश: हसदेव से हैदराबाद तक पेड़ कटाई
विकास बनाम विनाश: हसदेव से हैदराबाद तक पेड़ कटाई

विकास बनाम विनाश: हसदेव से हैदराबाद तक पेड़ कटाई

ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय आपदा का वैज्ञानिक विश्लेषण

अजय सहाय

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन के नाम पर 3,68,217 पेड़ों के काटे जाने की योजना ने न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी, जैव विविधता, और आदिवासी संस्कृति को संकट में डाल दिया है बल्कि यह तथाकथित विकास के नाम पर वैश्विक ऊष्मीकरण (Global Warming) को और प्रोत्साहित करने वाली नीति को भी उजागर करता है ।

जिसका वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टिकोण से गहन मूल्यांकन आवश्यक है क्योंकि जुलाई 2025 में लोकसभा में पर्यावरण राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा दिए गए उत्तर के अनुसार इतने विशाल वृक्षों की कटाई से प्रतिवर्ष लगभग 1.47 लाख टन से अधिक CO₂ अवशोषण क्षमता समाप्त हो जाएगी और इसके साथ ही प्रतिवर्ष 2.6 लाख टन ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता भी खत्म हो जाएगी, जिससे ना केवल जलवायु परिवर्तन की गति तेज होगी बल्कि मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा ।

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार एक वयस्क पेड़ प्रतिवर्ष औसतन 21.77 किलोग्राम CO₂ अवशोषित करता है और लगभग 118 किलोग्राम ऑक्सीजन उत्पन्न करता है, इस आधार पर 3.68 लाख पेड़ों के काटने से लगभग 80 लाख किलोग्राम (80,10,000 किग्रा) CO₂ हर वर्ष वातावरण में अधिक रह जाएगी और लगभग 4.3 करोड़ किलोग्राम (4,34,00,000 किग्रा) ऑक्सीजन का प्राकृतिक उत्पादन बाधित होगा, जो कि पूरे क्षेत्र की वायु गुणवत्ता, वर्षा चक्र, तापमान नियंत्रण, और जलीय स्रोतों की सततता को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा ।

 यह तब और चिंताजनक हो जाता है जब हम पिछले 20 वर्षों में देश में कथित विकास कार्यों के नाम पर पेड़ों की कटाई के आंकड़ों को देखें, उदाहरण के लिए 2001 से 2020 तक भारत में 1.09 करोड़ पेड़ काटे गए, जिनमें से अकेले 2014 से 2020 के बीच ही 1.5 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र विकास परियोजनाओं के नाम पर नष्ट किया गया, जिससे अनुमानतः 23 करोड़ टन CO₂ अधिक वायुमंडल में रह गया और लगभग 50 लाख टन ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता समाप्त हुई, जिससे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु जैसे शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक सीमा (PM2.5 > 200 μg/m³) को पार कर गया ।

यहां तक कि WHO की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सबसे प्रदूषित 50 शहरों में से 39 भारत में हैं, और इसके पीछे मुख्य कारणों में से एक वनों की कटाई और शहरीकरण है, साथ ही वैज्ञानिक विश्लेषणों में यह भी पाया गया कि 2003 से 2023 के बीच भारत के मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, महाराष्ट्र, उत्तराखंड जैसे राज्यों में खनन, सड़क निर्माण, औद्योगिक कॉरिडोर, डैम और अन्य संरचनाओं के निर्माण के नाम पर 60% प्राकृतिक वन क्षेत्र क्षतिग्रस्त हुआ, जिनसे न केवल लाखों टन कार्बन अवशोषण की क्षमता समाप्त हुई बल्कि जैव विविधता का विनाश, वर्षा में असंतुलन, मिट्टी क्षरण और जल स्रोतों का सूखना जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हुईं ।

 हसदेव अरण्य का उदाहरण इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि किस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र को जबरन विकास परियोजनाओं के लिए चयनित किया जाता है, जबकि वैज्ञानिक और रणनीतिक विकल्पों के रूप में इन परियोजनाओं को अल्पवृक्षीय या बंजर भूमि में स्थानांतरित किया जा सकता था, जैसे कि छत्तीसगढ़ के रायगढ़, कोरबा, या महासमुंद जैसे क्षेत्रों में अनुपजाऊ भूमि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है ।

फिर भी हसदेव जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में कोयला खनन परियोजना को आगे बढ़ाना यह दर्शाता है कि नीति निर्माण में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की भूमिका या तो कमजोर कर दी गई है या वाणिज्यिक हितों के अधीन हो चुकी है; IPCC की रिपोर्ट (2021–23) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि हम वृक्षों की कटाई को रोकने और कार्बन उत्सर्जन को सीमित करने के ठोस कदम नहीं उठाते हैं, तो 2040 तक वैश्विक तापमान में 1.5°C से अधिक वृद्धि होना लगभग निश्चित है ।

 जिसका प्रभाव भारत जैसे कृषि-प्रधान, मानसून पर निर्भर और जनसंख्या-सघन देश पर अत्यधिक विनाशकारी होगा, क्योंकि इससे सूखा, बाढ़, ताप लहर, जल संकट, और खाद्य संकट जैसी आपदाएँ बढ़ेंगी; इसके अतिरिक्त हसदेव अरण्य जैसे क्षेत्र आदिवासी समुदायों की आस्था, जीविका और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े होते हैं, जो संविधान की अनुच्छेद 244, पांचवीं अनुसूची, PESA अधिनियम 1996, और वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत संरक्षित हैं ।

इन कानूनों के अनुसार किसी भी आदिवासी क्षेत्र में खनन कार्य ग्रामसभा की सहमति के बिना नहीं किया जा सकता, जबकि हसदेव क्षेत्र में ग्रामसभाओं के विरोध और बार-बार की असहमति के बावजूद परियोजनाओं को जबरन लागू किया गया, जो न केवल संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है बल्कि सामाजिक न्याय और जनसंभाग की अवहेलना भी है ।

जलवायु परिवर्तन के दौर में जब दुनिया भर में कार्बन सिंक (Carbon Sink) के रूप में जंगलों को बचाने और बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, तब भारत में हसदेव जैसे स्थलों की कटाई यह संकेत देती है कि विकास की वर्तमान परिभाषा प्राकृतिक संसाधनों की बलि चढ़ाकर आर्थिक लाभ की एकतरफा सोच पर आधारित है, जबकि विज्ञान और नीति दोनों यह सिद्ध कर चुके हैं कि सतत विकास (Sustainable Development) का आधार पर्यावरणीय सुरक्षा, सामुदायिक भागीदारी और दीर्घकालिक पारिस्थितिक संतुलन होता है ।

ऐसे में आवश्यक है कि भारत सरकार ‘वन नेशन वन प्लान’ नीति के तहत पर्यावरण-हितैषी विकास मॉडलों को अपनाए जिसमें उद्योगों को हरित प्रौद्योगिकी के साथ बंजर भूमि पर स्थानांतरित किया जाए, और जिन क्षेत्रों में वन कटाई हो चुकी है वहां क्लाइमेट रेज़िलिएंट मियावाकी प्लांटेशन, कार्बन क्रेडिट प्रणाली, और ऑक्सीजन बैंक योजनाएं शुरू की जाएं ताकि नुकसान की भरपाई वैज्ञानिक रूप से की जा सके, अन्यथा यदि इसी तरह प्रत्येक वर्ष 10 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई जारी रही तो 2047 तक भारत की लगभग 100 करोड़ टन कार्बन अवशोषण क्षमता समाप्त हो जाएगी और हर वर्ष लगभग 220 करोड़ टन ऑक्सीजन उत्पन्न करने वाली प्राकृतिक प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी ।

जो भारत को जलवायु आपदा की उस भयावह स्थिति में पहुंचा देगी जहां न तो सांस लेना आसान होगा और न ही खेती करना, और न ही जल स्रोतों का अस्तित्व बना रहेगा; विशेष चिंता की बात यह है कि हसदेव के अतिरिक्त भी हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में पेड़ कटाई के अनेक उदाहरण सामने आए हैं ।

 जैसे हैदराबाद आईटी हब (2023–24) में रायडुर्ग और गच्चीबौली क्षेत्रों में 10,000 पेड़ काटे गए, मुंबई आरे कॉलोनी (2019–2023) में मेट्रो कार शेड के लिए 2,100 वृक्ष, बेंगलुरु हाईवे प्रोजेक्ट में 1,800 पेड़, दिल्ली द्वारका एक्सप्रेसवे में 6,000 पेड़, रायगढ़–कोरबा (छत्तीसगढ़) में अतिरिक्त 50,000 पेड़, उत्तराखंड चारधाम प्रोजेक्ट में 50,000+ वृक्ष, तेलंगाना काजिपेट रेलवे में 3,000 पेड़, अरुणाचल प्रदेश डैम में 20,000 पेड़, जेवर एयरपोर्ट, यूपी में 8,000 पेड़, और चेन्नई मेट्रो के लिए 4,000 वृक्षों की कटाई की गई ।

 जिससे कुल मिलाकर लाखों टन CO₂ वातावरण में अवशोषित नहीं हो सका और ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हुई, इसलिए हसदेव को बचाना केवल एक वन क्षेत्र का संरक्षण नहीं बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के जीवन अधिकार का संरक्षण है, जिसमें संविधान, विज्ञान और समाज तीनों की जिम्मेदारी है कि वह विकास को विनाश नहीं बनने दें ।