कृत्रिम प्रकाश की उपस्थिति में, जुगनुओं को तेज रोशनी करने की कोशिश में
पंकज चतुर्वेदी
पिछले महीने महाराष्ट्र के पुरुषवाड़ी , भंडारदरा , राजमाची , प्रबलमाची ,कर्जत जैसे स्थानों पर जुगनुओं का उत्सव मनाया गया जो जून के अंत तक चला । वहाँ का आदि – समाज जानता है कि जुगनू महज रोशनी फैंकने वाला कीट मात्र नहीं हैं, यह खेती-किसानी अकाम मित्र कीट है । चूंकि मानसून-पूर्व महीने उनके प्रजनन के काल होते है सो लोक समाज उनका स्वागत करता है । बीते कुछ सालों से जब गाँव-गाँव में बिजली पहुँच गई, बल्ब-ट्यूब लाइट और सोलर लेंप की रोशनी में यह सुंदर जीव अपना नैसर्गिक अंधकार मे परिवेश तलाशता है ।
कृत्रिम प्रकाश की उपस्थिति में, जुगनुओं को तेज रोशनी करने की कोशिश में, और संभावित साथियों द्वारा उनके संकेतों पर ध्यान देने में अधिक ऊर्जा खर्च करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसका सीधा सीधा असर उनकी प्रजनन क्षमता और संख्या पर पड रहा हैं । नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च के एक शोधकर्ता रमेश चतरगड्डा ने आंध्र प्रदेश के एक खास क्षेत्र में एब्सकॉन्डिटा चिनेंसिस जुगनू प्रजातियों की आबादी को रिकॉर्ड करने का प्रयास किया । बरनकुला गाँव में 1996 में 10-मीटर क्षेत्र में जुगनुओं की संख्या 500 थी जो 2019 में 10-20 रह गई । लंबे अंतराल 23 साल में महज दो बार गणना से भले ही संख्या में गिरावट के सटीक कारण तय करना कठिन हो लेकिन यह तथ्य है कि इस अवधि में यहाँ रोशनी का इस्तेमाल बढ़ा ।
आधुनिकता और संपन्नता की प्रतीक कही जाने वाली कृत्रिम रोशनी ने भले ही बहुत से अंधेरे स्थानों पर उजाला भर दिया हो लेकिन अब ऐसी अधिक रोशनी का इस्तेमाल समूचे परिवेश और मानवीय जीवन पर पड़ रहा है। रात में बल्ब-ट्यूब लाइट के प्रकाश में लंबे समय तक काम करने वाले बहुत सी मानसिक और शारीरिक व्याधियों का शिकार हो रहे हैं । यह अलग मामला है कि इस रोशनी को उपजाने के लिए जरूरी बिजली को पैदा करने के कितने खतरे यह धरती झेल रही है।
एक अन्य अध्ययन में पता चला कि कृत्रिम प्रकाश प्रवासी पक्षियों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है । कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी के मछली, वन्यजीव और संरक्षण जीव विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और मुख्य अध्ययनकर्ता काइल हॉर्टन के नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित शोध में बताया गया है कि लंबी दूरी तय करने वाले थके हुए पक्षी तेज रोशनी वाले शहरों में आराम की जगह या भोजन तलाशने में विफल रहते हैं और उनकी जान भी चली जाती है । सनद रहे अधिकांश प्रवासी पक्षी रात में सफर करते हैं और दमकती रोशनी उनके मार्ग में भी व्यवधान होती है । अभी अमेरिका के कुछ महानगरों में रात में ऊंची इमारतों की बत्ती बंद करने का प्रयोग किया गया है ।
कृत्रिम प्रकाश, खासकर रात में, मानव स्वास्थ्य, वन्यजीवों और पर्यावरण के लिए कई तरह के नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें नींद की समस्या, मोटापा, हृदय रोग, कैंसर का खतरा, और पारिस्थितिक तंत्र पर प्रभाव शामिल हैं। दुनिया में रहने अधिकांश जीवों की तरह इंसान भी सर्कैडियन रिदम या लय, जिसे शरीर की आंतरिक घड़ी भी कहा जाता है, का पालन करते हैं। अर्थात हमारी जैविक घड़ी के मुताबिक जागने-सोने का एक तंत्र होता हैं। यह काफी कुछ आँखों में मौजूद फोटोरिसेप्टर की कारण संचालित होता है ।
यह तंत्र दिन में तेज रोशनी और रात में कम या शून्य रोशनी पर आधारित है । कृत्रिम प्रकाश,जिसमें अब मोबाईल भी शामिल है, इस नैसर्गिक तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा है । इससे मेलोटोनिन का उत्पादन कम होता है जो नींद लाने के लिए जरूरी है । नींद की कमी और सर्कैडियन लय में गड़बड़ी अवसाद और चिंता, मोटापे और चयापचय संबंधी विकारों के जोखिम को बढ़ा सकती है। लंबे समय तक नकली रोशनी में बैठने से सिरदर्द, थकान, आँखों में सूखापन और अन्य लक्षण हो सकते हैं ।
कृत्रिम प्रकाश में कुछ रसायन होते हैं जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकते हैं । सभी प्रकाश स्रोत दृश्य प्रकाश और अदृश्य विकिरण दोनों उत्सर्जित करते हैं । विकिरण के प्रकारों में पराबैंगनी और अवरक्त शामिल हैं, और इन्हें उनकी तरंगदैर्घ्य के अनुरूप संकरी पट्टियों में विभाजित किया जा सकता है । सूर्य हानिकारक विकिरण का मुख्य स्रोत है, लेकिन अधिकांश को पृथ्वी के वायुमंडल द्वारा अवरुद्ध कर दिया जाता है । दृश्य प्रकाश का रंग भी इसकी तरंगदैर्घ्य पर निर्भर करता है, बैंगनी (लघु तरंगदैर्घ्य) से लेकर लाल (दीर्घ तरंगदैर्घ्य) तक ।
प्रकाश का हानिकारक प्रभाव कुछ कारकों पर निर्भर करता है । इनमें शामिल हैं कि यह कौन सा विकिरण है, इसकी तरंगदैर्घ्य क्या है और कोशिका का प्रकार क्या है । यदि प्रकाश क्रोमोफोरस तक पहुँचता है, जो कोशिकाओं में मौजूद अवशोषित करने वाले अणु होते हैं, तो दृश्यमान और यूवी प्रकाश उन कोशिकाओं के भीतर रासायनिक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकते हैं। क्रोमोफोरस विशेष रूप से त्वचा और आँख की कोशिकाओं में प्रचुर मात्रा में होते हैं। जब अवरक्त प्रकाश पदार्थ को प्रकाशित करता है, तो यह उसे गर्म कर सकता है । प्रवेश की गहराई विकिरण की तरंगदैर्घ्य पर निर्भर करती है।
अब सिर्फ इंसानों की दिनचर्या ही नहीं, बल्कि पेड़-पौधों के जीवनचक्र को भी प्रभावित करने लगी है । एक नए अंतरराष्ट्रीय शोध के मुताबिक कृत्रिम प्रकाश के चलते शहरी क्षेत्रों में पेड़ों की हरियाली का समय ग्रामीण इलाकों की तुलना में औसतन तीन सप्ताह तक बढ़ गया है । इस बदलाव से मौसम और स्वास्थ्य से जुड़ी कई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं । अध्ययन में 2014 से 2020 के बीच उत्तरी गोलार्ध के 428 शहरों के सैटेलाइट डाटा का विश्लेषण किया गया ।
इसमें पाया कि शहरों में पेड़ों की पत्तियां औसतन 12.6 दिन पहले निकलती हैं और 11.2 दिन बाद झड़ती हैं । यानी हर साल शहरी हरियाली 23.8 दिन ज्यादा लंबी रहती है ।अब तक माना जाता रहा था कि यह बदलाव मुख्यतः अर्बन हीट आइलैंड यानीशहरी गर्मी के कारण होता है । लेकिन इस अध्ययन ने साबित किया है कि मौसमी गतिविधियों में कृत्रिम प्रकाश अधिक अहम भूमिका निभा रहा है ।
कार्बन सोख सकते हैं पर यह बदलाव पारिस्थितिक संतुलन को भी खतरे में डाल रहा है ।
पिछले दस वर्षों में शहरी क्षेत्रों में रात के समय कृत्रिम प्रकाश में हर साल करीब 10 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है । खासकर एल. ई . डी लाइट्स ने इस वृद्धि को और अधिक तीव्र कर दिया है । यह रोशनी पौधों की जैविक घड़ी को गुमराह कर देती है, जिससे वे मौसमी बदलावों को सही तरीके से पहचान नहीं पाते । नतीजतन, पत्तियों का गिरना देर से और बसंत का आगमन जल्दी होता है। अध्ययन में स्पष्ट किया गया कि पेड़ों की पत्तियों के गिरने के समय पर कृत्रिम रोशनी का असर मौसम के शुरुआत से भी अधिक होता है । पत्तियों की उपस्थिति बढ़ने से पेड़ अधिक कार्बन सोख सकते हैं पर यह बदलाव पारिस्थितिक संतुलन को भी खतरे में डाल रहा है ।
भले ही पुरानी पीली रोशनी वाले बल्ब ज्यादा बिजली खाते थे और उनकी रोशनी में वह चमक नहीं होती थी लेकिन पुराने सोडियम लैंप की जगह अब शहरों में चमकीली सफेद एलईडी लाइट्स लगाई जा रही हैं, जो अधिक मात्रा में नीली रोशनी छोड़ती हैं। पौधे इस नीली रोशनी को विशेष रिसेप्टर के माध्यम से महसूस करते हैं और इसका सीधा असर उनके विकास चक्र पर पड़ता है। हालांकि अभी तक अधिकतर सैटेलाइट नीली रोशनी को ठीक से नहीं पकड़ पाए हैं , जिससे इसके दीर्घकालिक प्रभावों को समझना मुश्किल हो जाता है।
शहरों में रातों की बढ़ती रोशनी शरीर ने तेज या गर्म रोशनी के खिलाफ कई रक्षा तंत्र विकसित किए हैं। ये जैविक और व्यवहारिक दोनों हैं, जिनमें दर्द की प्रतिक्रिया, पलक झपकाना, पुतली का सिकुड़ना और तेज रोशनी के प्रति स्वाभाविक घृणा शामिल है। एंटीऑक्सिडेंट और त्वचा में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पिगमेंट जैसे अणु विकिरण के कारण होने वाले हानिकारक अणुओं के अत्यधिक स्तर को नष्ट करके प्रतिकूल रासायनिक प्रतिक्रियाओं को धीमा कर देते हैं ।
हालाँकि, इन बचावों के बावजूद, कृत्रिम प्रकाश के संपर्क में आने से शरीर को नुकसान पहुँच सकता है । उदाहरण के लिए, एक मजबूत कृत्रिम प्रकाश स्रोत से बहुत अधिक विकिरण, हानिकारक रसायनों के विषाक्त स्तरों के निर्माण का कारण बन सकता है । इस कारण से, व्यावसायिक रूप से उपलब्ध प्रकाश की तीव्रता और जोखिम स्तरों को नियंत्रित करने वाले सुरक्षा प्रोटोकॉल मौजूद हैं ।
जब सारी दुनिया जलवायु परिवर्तन के विभिन्न कुप्रभावों से रूबरू हो रही है , ऐसे में प्रकाश-प्रदूषण अभी भी लगभग बहुत काम चिंता का विषय है । अधिक रोशनी के लिए अधिक ऊर्जा और उससे अधिक कार्बन उत्सर्जन के अलावा भी इस चमकती रोशनी के स्याह पक्ष हैं, जिसके लिए अब आम लोगों को जागरूक करना जरूरी है । जहां जरूरत न हो कुछ अंधेरा भी अच्छा है दुनिया को जगमगता रखने के लिए ।