अगर पानी साफ तौर पर दिखाई दे, सबके लिए आसानी से उपलब्ध हो, और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए, तो हमारे शहर कैसे दिखेंगे?
नुपुर खांतर
‘पोरंबोके उन्नकु इल्ला, पोरंबोके एन्नकु इल्ला। पोरंबोके ऊरुकु, पोरंबोके बूमिकु।
पोरंबोके उन पोरूपू , पोरंबोके एन पोरूपू , पोरंबोके ऊर पोरूपू , इयार्कैकी बूमिकु।’
[पोरंबोके न तो तुम्हारे लिए है, न यह मेरे लिए है। यह हम सब के लिए है, यह धरती के लिए है। तुम्हें पोरंबोके का ध्यान रखना है, और मुझे भी। यह प्रकृति और धरती के प्रति हमारी साझा ज़िम्मेदारी है।]
ये शब्द ‘चेन्नई पोरंबोके पाडल’ गीत से लिए गए हैं, जिसे गायक-गीतकार काबेर वासुकी ने लिखा है और कर्नाटक गायक टी. एम. कृष्णा ने गाया है। यह गीत पोरंबोके शब्द को पुनः अपनाने और उसकी अहमियत को फिर से ज़िंदा करने के अभियान का एक हिस्सा था।
पोरंबोके एक पुराना तमिल शब्द है, जिसका अर्थ है साझा सामुदायिक संसाधन, जैसे जलाशय और चरागाह, जो समुदाय के लाभ के लिए होते हैं और निजी स्वामित्व से बाहर रहते हैं।
औपनिवेशिक काल में पोरंबोके को आकलन-मुक्त भूमि कहा जाता था। इसका कारण शायद यह था कि उसे सार्वजनिक कार्यों के लिए अलग रखा जाता था, या यह कि उसे खेती योग्य नहीं माना जाता था। चूंकि यह भूमि निजी संपत्ति के ढांचों के अनुकूल नहीं थी, इसलिए समय के साथ यह शब्द स्वयं में ही अपमानजनक बन गया और इसका अर्थ कोई मूल्यहीन स्थान या व्यक्ति हो गया।
यह बदलाव इस बात को दर्शाता है कि कैसे साझा भूमि को अक्सर बंजर या अनुपयोगी मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जिससे उस पर अतिक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कई अन्य सार्वजनिक संपत्तियां, जैसे आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स), जलाशय और वन भी इस उपेक्षा का शिकार होते हैं। इन सार्वजनिक संपत्तियों को निजी और आर्थिक रूप से लाभकारी हितों के लिए लगातार बदला जा रहा है। ऐसे बदलाव इन्हें जनमानस से बाहर कर देते हैं और रोजमर्रा के ताने-बाने में इनकी गहराई को क्षीण बनाते जाते हैं।
भारत में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच यह खंडित रिश्ता और भी उजागर होता है, खासकर समुदायों और उन जलाशयों के बीच जो कभी उन्हें सहारा देते थे। इसका बड़ा कारण पानी के प्रति वह दृष्टिकोण है, जो केवल उसे नियंत्रित करने और दूर धकेलने पर केंद्रित है। पानी स्वाभाविक रूप से शहर के भीतर कैसे प्रवाहित होता है, इससे जुड़ी सोच की कमी साफ झलकती है।
लंबे समय से शहरी जल प्रबंधन ने पानी को नज़रों से ओझल रखने के लिए ग्रे आधारभूत संरचना को प्राथमिकता दी है। पानी को बोझ मानने की सोच (जिसे बहा देना, बाहर रखना या बंद कर देना बेहतर है) ने आर्द्रभूमियों, टैंकों और नहरों पर अतिक्रमण और निर्माण को बढ़ावा दिया।
लेकिन इसके परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं। कई शहर अत्यधिक बाढ़ और पानी के गहरे संकट के बीच झूल रहे हैं। जैसे-जैसे पूरे शहरी भारत में यह स्थिति बार-बार सामने आ रही है, कुछ सवालों को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता जा रहा है।
पानी को खतरे के बजाय शहरी जीवन की आधारशिला के रूप में देखने का क्या अर्थ होगा? यदि पानी को सुलभ, नजर आने वाले और पारिस्थितिक संसाधन की तरह एकीकृत किया जाए, तो हमारे शहर कैसे दिखेंगे? और यदि हम शहरी जलाशयों को एक बार फिर सामुदायिक संसाधन के रूप में देखते हैं, तो कौन सी संभावनाएं जन्म ले सकती हैं?
ये प्रश्न चेन्नई के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। एक ऐसा शहर, जो पानी से ही आकार लेता है, उससे फलता-फूलता होता है और बार-बार उसके कड़े इम्तिहानों से गुज़रता है।
चेन्नई का जल-परिदृश्य
चेन्नई में पानी स्मृति भी है और शक्ति भी, जो लगातार अपनी जगह लौटकर आता है। शहर की पारंपरिक एरिस प्रणाली जल प्रबंधन के लिए उपयोग में लायी जाती थी। यह आपस में जुड़े टैंकों और तालाबों का एक विशाल ताना-बाना था जो बारिश के जल को संचित करता था, भूजल का पुनर्भरण करता था, भू-क्षरण को कम करता था और शहर को बाढ़ से बचाता था। ये टैंक मानसून के दौरान फैलते थे और शुष्क महीनों में सिमट कर वर्षा-आधारित भूदृश्य की लयों के अनुरूप स्वाभाविक रूप से ढल जाते थे।
लेकिन समय के साथ चेन्नई की मौसमी जल-लय बाधित हो गयी है। औपनिवेशिक योजनाकारों ने इस बात पर बल दिया कि नदियां हमेशा बहती रहें, नहरें नावों के चलने लायक हो और टैंक हर समय भरे रहें-चाहे सूखा हो, बाढ़ हो या ज्वारीय बदलाव। यह अपेक्षा मानसून चक्र के उतार-चढ़ाव के विपरीत थी और यह दृष्टिकोण स्थानीय जलवायु के विपरीत था।
इसके कारण अस्थायी रूप से पानी को थामने के लिए बनाए गए स्थान धीरे-धीरे समाप्त हो गए। चूंकि जब टैंक सूखे होते थे, तब वे खाली जमीन जैसे दिखते थे। इसलिए उन्हें धीरे-धीरे भर दिया गया और उन पर निर्माण कर दिया गया। यही वजह है कि आज जब बारिश के पानी को ठहरने की जगह नहीं मिलती, तो मामूली सी बारिश का पानी भी सड़कों पर भर जाता है।
उदाहरण के लिए लॉन्ग टैंक को देखें। कभी माउंट रोड के पश्चिम में स्थित 70 एकड़ की यह झील, नुंगमबक्कम झील क्षेत्र से जुड़ी हुई थी। 1970 के दशक तक इसे कंक्रीट से भर दिया गया और उस पर निर्माण कर दिया गया, क्योंकि जब भी यह सूख जाती थी, इसे अनुपयोगी भूमि मान लिया जाता था। भरे जाने के बाद इस नई जमीन को अधिक लाभकारी समझा गया और इसे एक नए कॉलेज परिसर को सौंप दिया गया।
आज केवल मंबलम नहर ही इसके छोटे से अवशेष के रूप में बची है। झील के समाप्त हो जाने के कारण नहर और आसपास के क्षेत्र अब तेजी से जलमग्न हो जाते हैं, क्योंकि अतिरिक्त वर्षा के जल को थामने वाली झील अब मौजूद नहीं है। यह चेन्नई के एक व्यापक स्वरूप का हिस्सा है, जहां कई मौसमी झीलों को लगातार कंक्रीट से भर दिया गया है, जिससे शहर की बाढ़ की समस्या और गंभीर हुई है।
यहां सबक स्पष्ट है। जब हम पानी को दूर रखने की कोशिश करते हैं, तो हम उसकी मौजूदगी से तब तक दूर रहते हैं, जब तक वह हमें अभिभूत न कर दे। लेकिन जब पानी को शहरी जीवन को आकार देने वाली एक अनिवार्य प्रणाली के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो रचना के नए अवसर खुलते हैं। पानी को नियंत्रित करने की प्रवृति से निकलकर उसे दिशा देने और उसका उत्सव मनाने की ओर बढ़ना एक ऐसे ढांचे को विकसित कर सकता है, जो उसे एक बार फिर नजर में लाएगा और शहरी ताने-बाने में समाहित करेगा।
जल स्थलों को फिर से सामुदायिक संसाधन बनाना
इसे हासिल करने का एक तरीका यह है कि समुदायों को इन स्थानों तक फिर से सुलभता और अधिकार मिलें। जब कोई झील, नहर या आर्द्रभूमि साझा सामूहिक संसाधन बनती है, तो स्थानीय समुदाय ज्ञान का योगदान देते हैं, उसकी निरंतर निगरानी और देखभाल करते हैं, और कचरा डालने व अतिक्रमण को हतोत्साहित करने वाले मानदंडों को लागू करते हैं।
जैसे-जैसे समुदाय नहरों, टैंकों और आर्द्रभूमियों से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी का एहसास करेंगे, ये स्थान फिर से मानसून के पानी को सोखने और थामने की अपनी पारिस्थितिक भूमिका निभा पायेंगे। चेन्नई में भारी बारिश को अक्सर जाम नालों और अतिक्रमित जलमार्गों का सामना करना पड़ता है। साझा नागरिक आधारभूत संरचना के रूप में इनकी पुनर्प्राप्ति उपेक्षित जल प्रणालियों को दोबारा सार्वजनिक सामुदायिक संसाधन के रूप में सक्रिय कर सकती है। यह कई रूप ले सकता है:
- ऐसी आर्द्रभूमि जो पार्क का रूप लेकर लोगों को मनोरंजन के लिए खुली जगह उपलब्ध कराए और साथ ही तेज बारिश के दौरान तूफानी जल को स्वाभाविक रूप से धीमा करे और छाने।
- सीढ़ीनुमा संरचना वाले पुनर्स्थापित मंदिर तालाब, जो मानसूनी बहाव को रोकने और भूजल का पुनर्भरण करने के साथ-साथ समुदायों को पारंपरिक जल स्थलों से फिर से जोड़ें।
- नहर की छायादार सैरगाह, जो सुलभता को बेहतर बनाए, गर्मी को कम करे और पानी को फैलने व धीमा होने का अवसर दे, ताकि नालों पर अत्यधिक दबाव न पड़े।
पानी के साथ रहने (लिविंग विद वॉटर) का यह दृष्टिकोण, जिसका उदाहरण ग्रेटर न्यू ऑरलियन्स अर्बन वॉटर प्लान में मिलता है, दिखाता है कि कैसे रोजमर्रा के शहरी जीवन में समाहित होकर, पानी खतरे की जगह संसाधन बन सकता है।
जल चौराहों, हरित सड़कों और पुनर्स्थापित नहरों के माध्यम से यह योजना दर्शाती है कि सामान्य शहरी स्थल किस तरह बाढ़-नियंत्रक के रूप में काम कर सकते हैं। यह हमें जलाशयों को देखभाल, संस्कृति और समुदाय में निहित सामुदायिक संसाधन के रूप में सार्वजनिक कल्पना में वापस लाने का रास्ता भी दिखाती है।
चेन्नई में, जहां ‘पोरंबोके’ की अवधारणा पहले से ही भूमि और पानी के साथ साझा, सामुदायिक संबंधों की याद दिलाती है, यह बदलाव विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है। इसी के आधार पर, मैं ‘पोरंबोके शहरीकरण’ की अवधारणा को अपने शोध के हिस्से के रूप में प्रस्तुत कर रही हूं।
यह अवधारणा जलाशयों को शहरी सामुदायिक संसाधन—सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और शैक्षिक संपत्तियों—के रूप में देखने और पानी की लय के साथ डिज़ाइन देने पर केंद्रित है, न कि उसके विरुद्ध। एक काल्पनिक शहरी डिज़ाइन दृष्टिकोण का उपयोग कर, मैं चेन्नई के लुप्त हो चुके लॉन्ग टैंक की पुनर्कल्पना का प्रयास कर रही हूं।
यह दिखाता है कि डिज़ाइन के माध्यम से समुदायों को पानी से फिर से जोड़ने से बाढ़ और शहरी सार्वजनिक स्थलों के क्षरण के प्रति लचीलापन और स्थान-आधारित प्रतिक्रियाएं कैसे विकसित की जा सकती हैं।
पानी के साथ ये संबंध—लोग उसके साथ कैसे जीते हैं, उससे क्या सीखते हैं और उसका उत्सव कैसे मनाते हैं—डिज़ाइन की सोच का आधार बने हैं:
1. संबंध: सार्वजनिक आधारभूत संरचना और आवागमन साधन के रूप में पानी
सबसे पहला संबंध पानी को स्पष्ट, सुलभ और सार्वजनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाकर लोगों से फिर से जोड़ने का है। चेन्नई में मंबलम नहर लगभग 5.7 किलोमीटर तक फैली हुई है। यह पश्चिम मंबलम के क्षेत्र से होकर बहती है और कई इलाकों के हिस्सों से पानी निकालते हुए अड्यार नदी में मिलती है।
घने विकास, व्यावसायिक केंद्रों तथा बहुमंज़िला और निम्न-आय आवासों से घिरी यह नहर आज गंभीर प्रदूषण और अतिक्रमण का सामना कर रही है। इसमें नियमित रूप से कचरा डाला जाता है, इसकी वहन क्षमता घट गई है और इसका प्रवाह बाधित हो चुका है।
नगर प्रशासन द्वारा समय-समय पर की गई गाद निकासी और बहाली से भी सार्वजनिक धारणा में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है। इसके अलावा, यह नहर शहर के सार्वजनिक क्षेत्र से आज भी अलग-थलग है क्योंकि न तो इसके किनारे पैदल चलने का मार्ग है, न सार्वजनिक सुविधाएं हैं, और न ही पूरी लंबाई में कोई सतत पथ। सार्वजनिक जीवन से कटी हुई यह नहर आसपास के समुदायों में स्वामित्व की भावना पैदा नहीं कर पाती और चेन्नई के शेष हिस्सों के लिए लगभग अदृश्य बनी रहती है।
नहर को लोगों से फिर से जोड़ने के लिए उसे एक साथ सुलभ और सुरक्षित बनाए जाने पर विचार करना चाहिए। इसके लिए ऐसे सार्वजनिक मार्ग बनाने होंगे, जो लोगों को पानी के किनारे और ऊपर से चलने की अनुमति दें और आसपास के इलाकों को बाढ़ से भी बचाएं।
यह दृष्टिकोण गुप्त जलविज्ञान से प्रेरित है, जो कला, भूदृश्य वास्तुकला और शहरी पारिस्थितिकी के माध्यम से लुप्त नदियों और गायब हो चुकी धाराओं की खोज करता है। इसी तरह के सिद्धांतों ने सैन एंटोनियो रिवर वॉक के रूपांतरण का मार्गदर्शन किया, जिसने बाढ़-प्रवण नदी को एक अनुकूलनीय और जीवंत सार्वजनिक स्थल में बदल दिया।
इस दृष्टिकोण के तहत पहला कदम ऐसी जल रणनीति तैयार करना है, जो मौसमी बाढ़ को रोकने की कोशिश करने के बजाय उसे स्वीकार करे, और साथ ही आसपास के इलाकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे। बाढ़ के पानी को सुरक्षित दिशा देना और उसे शहर तथा उसके निवासियों के लिए उपयोगी बनाना हमारा उद्देश्य होना चाहिए।
नीचे दिए गए रेखाचित्र में दिखाई गई प्रक्रिया यह बताती है कि निचले हरित क्षेत्रों में पानी को रोकने से जमीन उसे सोख लेती है, और अतिरिक्त पानी का भूमिगत संचयन हो जाता है। पुल और ऊंचे पैदल मार्ग नहर के प्राकृतिक प्रवाह का अनुसरण करते हैं, जिससे लोग सुरक्षित रूप से पानी से जुड़ पाते हैं।
बाढ़ के मैदान को चौड़ा करने से पानी को फैलने की जगह मिलती है, उसका वेग कम होता है, बहाव घटता है और आसपास के इलाकों की रक्षा होती है। ऊंचे पैदल मार्ग, पुल और हरित किनारे पानी को धारण क्षेत्रों की ओर निर्देशित कर सकते हैं।
ये सभी तत्व शहरी ताने-बाने को नहर से फिर से जोड़ते हैं और एक कटे हुए जलाशय को फिर से सुलभ व दर्शनीय सार्वजनिक स्थल में बदल देते हैं।
2. शिक्षा: जीवंत पाठ्यक्रम के रूप में पानी
दूसरा संबंध जल-विज्ञान भूदृश्य को समझने पर केंद्रित है। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण वेस्ट फ़िलाडेल्फ़िया लैंडस्केप प्रोजेक्ट में देखा जा सकता है, जहां मिल क्रीक वॉटरशेड के इर्द-गिर्द एक पाठ्यक्रम विकसित किया गया। इसमें पूरा मोहल्ला कक्षा बन गया और विद्यालय उसका केंद्र।
इस स्थान-आधारित पद्धति के द्वारा छात्रों ने अपने भूदृश्य को पढ़ना, अपने इतिहास को समझना, अपने वर्तमान को जानना और अपने भविष्य की कल्पना करना सीखा। ऐसा संबंध लंबे समय तक संरक्षण की समझ को जन्म देता है, जहां जल और उसके आसपास से मिली शिक्षा, उसकी देखभाल में बदल जाती है।
पोरंबोके शहरीकरण की इस परिकल्पना के भीतर लॉन्ग टैंक की भूमि पर बने स्कूलों को जल-विज्ञान की जीवंत कक्षाओं के रूप में पुनः परिकल्पित किया जा सकता है। डिज़ाइन में जल प्रबंधन और शिक्षा का समावेश है:
खेल के मैदानों को धंसे हुए क्षेत्र का आकार दिया जा सकता है, जिससे वर्षा का जल स्वाभाविक रूप से एकत्र होकर जमीन में समा जाए और बाढ़ की संभावना कम हो। इसके बाद अतिरिक्त पानी का भूमिगत संचयन कर शुष्क महीनों में पुनः उपयोग किया जा सकता है। स्कूल परिसरों को खोलकर एक नए प्रकार का सार्वजनिक स्थल भी बनाया जाता है (रेखाचित्र में पीले रंग से दर्शाया गया है)।
जल-प्रणालियों से जुड़ी समझ को सार्वजनिक और सजीव बनाते हुए, ये स्थान पोरंबोके को अनुपयोगी भूमि की छवि से मुक्त कर ज्ञान, जिम्मेदारी और देखरेख की एक जीवंत सामूहिक धरोहर में बदल देते हैं।
3. उत्सव: सार्वजनिक जीवन में पानी और संस्कृति
तीसरा संबंध उत्सव पर केंद्रित है। चेन्नई में पानी का लंबे समय से एक पवित्र स्थान रहा है। खासकर मंदिर के तालाबों और अनुष्ठानों के माध्यम से, जो उसके आगमन को चिह्नित करते हैं। यदि वर्षा के आने की योजना बनाई जाए और उसका उत्सव मनाया जाए, तो यह शहर के कठोर मानसून के साथ संबंध को संकट के मौसम से, नवीनीकरण के मौसम में बदल सकता है।
इसका एक समानांतर उदाहरण टॉलर कैपिटल द्वारा बनाए गए मेक्सिको के ला केब्रादोरा वॉटर पार्क में देखा जा सकता है, जहां प्लेटफॉर्म, चौराहे और पैदल मार्ग, शहरी बाढ़ आधारभूत संरचना को समुदाय के लिए सार्वजनिक और मनोरंजक स्थल में बदल देते हैं। स्थानीय ज्वालामुखीय पत्थर और जड़युक्त वनस्पति से निर्मित ये स्थान न केवल बाढ़ को कम करते हैं, बल्कि सामुदायिक जीवन को भी बढ़ावा देते हैं।
हालांकि ला केब्रादोरा की डिज़ाइन भाषा उसके अपने भूगोल पर आधारित है, चेन्नई में ऐसे ही सिद्धांत स्थानीय अभिव्यक्तियों के रूप में, मौजूदा प्रथाओं और अनुष्ठानों पर आधारित होकर बनाए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, मर्ग़जी ऋतु (मध्य दिसंबर से मध्य जनवरी) ऐसी ही एक लय प्रदान करती है। यह संगीत और नृत्य का शहर-व्यापी उत्सव है, जो मौसमी वर्षा के स्वरूप से साथ मेल खाता है।
पोरंबोके शहरीकरण इस कैलेंडर से जुड़े एक खुले उत्सव के मैदान की पुनर्कल्पना करता है, जहां प्रस्तुतियां, कैंटीन और सार्वजनिक अनुष्ठान शहर के जल चक्रों के साथ समन्वय में होते हैं। यह शहर की उन परंपराओं पर आगे बढ़ता है, जहां मंदिर तालाब और वर्षा-आह्वान गीत पानी के साथ एक काव्यात्मक और संवेदनात्मक संबंध बनाए रखते हैं और जो कला, संगीत और सामूहिक स्मृति के माध्यम से जीवित रहता है।
सामूहिक जीवन में जल-संरक्षण को निहित करते हुए, हर मर्ग़जी एक अधिक जल-संवेदनशील शहर का एक सार्वजनिक पड़ाव बन जाता है।
पोरंबोके शहरीकरण आधारभूत संरचना को सामाजिक-पारिस्थितिक और सांस्कृतिक रूप से समझने योग्य रूप में पुनर्निर्धारित करता है। यद्यपि यह एक कल्पनात्मक डिज़ाइन पुनर्कल्पना है, फिर भी यह अत्यंत आवश्यक है कि यह सोच केवल शैक्षिक दायरे तक सीमित न रहे, बल्कि चेन्नई के शहरी ताने-बाने में सक्रिय रूप से एकीकृत की जाए।
इन विचारों को मज़बूत करने के लिए, खंडित जल-शासन द्वारा विभिन्न एजेंसियों, नागरिकों और संस्थानों को एक साथ लाना होगा। ऐसा करते हुए, पानी के बारे में सोचने का एक ‘पोरंबोके’ तरीका आकार ले सकता है-जो जल-विभाजन के स्तर पर काम करे और साथ ही स्थानीय जल-चैंपियनों के माध्यम से सामुदायिक-स्तरीय जिम्मेदारी की सोच को प्रेरित करे।
“यह लेख मूलतः इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू में प्रकाशित हुआ था और इसे यहां देखा जा सकता है।”