सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का अंकुश
सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का अंकुश

सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का अंकुश

वर्षों से जहरीली बदबू और प्रदूषित पानी झेल रही नौगांव नगर

रवीन्द्र व्यास ( छतरपुर/बुंदेलखंड )

वर्षों से जहरीली बदबू और प्रदूषित पानी झेल रही नौगांव नगर और आसपास की जनता की पीड़ा आखिरकार प्रशासन तक पहुंची। 26 सितंबर 2025 को एसडीएम जी.एस. पटेल ने जैकपिन ब्रेवरीज क्रॉस डिस्टलरी (संचालक: जगदीश अग्रवाल) के खिलाफ सख्त आदेश पारित कर जनता को बड़ी राहत दी। फैक्ट्री की मौजूदगी अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का सवाल बन गई है |

बदबू से दम घुटा, बीमारियों का खतरा

नगर की गलियों से लेकर गांव-मोहल्लों तक जहरीली बदबू ने ऐसा कहर ढाया कि लोगों ने घरों की खिड़कियां तक खोलना बंद कर दिया। मासूम बच्चों का दम घुटने लगा, बुजुर्ग सांसों की तकलीफ से कराह उठे। पशु-पक्षी तक इस गंध से परेशान हैं।दुर्गन्ध ने ही लोगों का जीना हराम नहीं किया बल्कि इस  फैक्ट्री से निकलने वाले जहरीले  पानी ने  ना सिर्फ  सीलप नदी  को जहरीला बना दिया | इस जहरीले पानी का असर भूजल श्रोतों पर भी पड़ा , हेंड  पम्प  और कुओं के पानी का रंग भी बदल गया|

नौगांव से लेकर चंद्रपुर, शिकारपुरा, चांदोरा, दोरिया, खम्मा, रावतपुरा और धवर्रा सहित  लगभग आधा दर्जन से अधिक गांव के लोग  इस फैक्ट्री के से निकलने वाली दुर्गन्ध और केमिकल युक्त पानी के कारण अनेकों तरह की बीमारियों के शिकार होते रहे | गाँव वालों को अपने ही घरों के आँगन में बैठना मुश्किल हो गया ।बच्चों का पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगना,बुज़ुर्गों को आंखों से पानी, सिरदर्द और सांस लेने में तकलीफ।जितनी गहरी बदबू है, उतनी ही गहरी चिंता भी लोगों के मन में बैठ चुकी थी ।

ऐसा भी नहीं कि ग्रामीणों की इस आवाज को मीडिया ने नहीं उठाया हो ,मीडिया ने भी इस पर अनेकों बार समाचार प्रकशित किये ग्रामीणों ने भी शिकवा शिकायत की पर कोई सुनने वाला ही नहीं था  ।

पिछले आठ साल से नियम कह रहे हैं कि फैक्ट्री की 33% ज़मीन ग्रीन बेल्ट में बदलनी चाहिए थी। लेकिन  उस बंजर ज़मीन को, जहां न एक पौधा है और न कोई हरियाली। आठ साल में ग्रीन जोन बस कागजी दस्तावेजों पर ही पोषित होता रहा।

निरीक्षण में उजागर हुआ सच

एसडीएम पटेल ने स्वयं डिस्टलरी पहुंचकर जांच की। निरीक्षण में पाया गया, फैक्ट्री में चावल की सड़ी भूसी खुलेआम सड़ रही थी। पांच किलोमीटर तक का इलाका जहरीली बदबू से भर गया था। गंदा पानी बिना ट्रीटमेंट सीधे नदी में छोड़ा जा रहा था।  

निरीक्षण के दौरान हर अधिकारी के चेहरे पर मास्क था। दृश्य ऐसा था मानो नौगांव फिर से कोरोना काल में लौट आया हो। फर्क सिर्फ इतना था कि यह बीमारी नहीं बल्कि बदबू का कोरोना था जिसने पूरे क्षेत्र की हवा जहरीली कर दी थी। फैक्ट्री का दूषित जल और जहरीली गंध लोक स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर ख़तरे में डाल रहे हैं।

यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 152 (1) का उल्लंघन है और पब्लिक न्यूसेंस की श्रेणी में आता है। एसडीएम ने स्पष्ट किया कि जल्द से जल्द प्रदूषण बंद किया जाए और जवाब पेश किया जाए, अन्यथा फैक्ट्री पर स्थायी कार्रवाई होगी।

साथ ही थाना प्रभारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, तहसीलदार, स्वास्थ्य विभाग और पशु चिकित्सा अधिकारी को रिपोर्ट देने के आदेश दिए गए। विवादित स्थल पर आदेश की प्रति चस्पा करने के निर्देश भी दिए गए।

पहली बार सुना गया दर्द

नौगांव की जनता हमेशा से इस फैक्ट्री को बदबू का कारखाना कहती रही। वर्षों से आवेदन, धरने और आंदोलन होते रहे। यहां तक कि बदबू के चलते विद्यालय तक दूसरी जगह शिफ्ट करना पड़ा। लोगों का मानना था कि संचालक के बाहुबली असर से ही अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। लेकिन इस बार हालात बदले।

“बदबू मुक्त नौगांव” अभियान सोशल मीडिया पर तेज हुआ।

महिलाएं, युवा और सामाजिक संगठन खुलकर सामने आए।

 बीजेपी ,कांग्रेस ने ज्ञापन सौंपा और कांग्रेस ने केंद्रीय मंत्री का वाहन रोककर कार्रवाई की मांग की।

यही दबाव काम आया और प्रशासन हरकत में आया।

जिला कलेक्टर की कड़ी नाराजगी और एसडीएम की ईमानदार जांच ने जनता में उम्मीद जगाई।

जनता की मांग – “हमें सांस लेने का हक़ चाहिए”

ग्रामीणों का कहना है 

हम कोई सौगात या घोषणा नहीं चाहते, हमें तो सिर्फ सांस लेने का अधिकार चाहिए  जो हमारा जन्मसिद्ध हक है। या तो फैक्ट्री बंद हो, या फिर नियमों का पालन कर प्रदूषण हमेशा के लिए रोका जाए।

जनता की जीत या अधूरी कार्रवाई

यह आदेश नौगांव की जनता के संघर्ष व एकता की जीत बताया जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यही है

क्या प्रशासन आदेश को पूरी तरह लागू कर पाएगा?

क्या वाकई फैक्ट्री बंद होगी या फिर कागजों में ही खानापूर्ति रह जाएगी?

फिलहाल नौगांव की गलियों में लोग बस यही कह रहे हैं

हमें सौगात नहीं चाहिए, न कोई वादा,

बस चाहिए हवा  जिसमें हम सांस ले सकें।

जनता की सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का  अंकुश

रवीन्द्र व्यास

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला के नौगांव  के  हालिया घटनाक्रम से एक गहरा सवाल उभरता है—क्या वाकई आम आदमी की सांसों की कीमत इतनी सस्ती है कि वर्षों तक जहरीली हवा और पानी के जहर को उसके नसीब का हिस्सा मान लिया जाए? जैकपिन ब्रेवरीज कॉक्स  डिस्टलरी के खिलाफ हुआ यह प्रशासनिक आदेश सिर्फ एक फैक्ट्री की सीलिंग नहीं, बल्कि उस जूझती हुई जनता की जीत है, जिसने बगैर किसी बड़े नेता या सत्ता के, अपने जीने के अधिकार के लिए साहस दिखाया।

वर्षों की चुप्पी टूटी, आवाज़ बनी ताक़त

नौगांव और आसपास के क्षेत्र महीनों नहीं, कई वर्षों से  कॉक्स  डिस्टलरी से निकलने वाली   बदबू में तनाव, बीमारी और हताशा के बीच  जीवन  जी रहे थे । जब कभी आवाज उठी, वह कुचल दी गई, या  धनबल या  बाहुबल के सामने दम तोड़ गई। पर इस बार महिला हों, युवा हों या सामाजिक संगठन सबने बदबू मुक्त नौगांव  के बैनर तले एकजुटता दिखाई। शायद प्रशासन भी महसूस कर सका कि जनता अब सरकारी फाइलों में कैद रहने वाली नहीं है।

प्रशासनिक कार्रवाई

एसडीएम स्तर पर हुए इस साहसी कदम को सिर्फ व्यक्तिगत कार्रवाई कहना भूल होगी। यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक दबाव सोशल मीडिया मुहिम, बीजेपी ,कांग्रेस द्वारा ज्ञापन, केंद्रीय मंत्री के वाहन को घेरने जैसी कार्रवाइयों ने मिलकर रणनीतिक माहौल बनाया। यह केस बताता है कि लोकतंत्र में प्रशासन अगर जनता के साथ खड़ा हो जाए, तो प्रभावशाली और रसूखदार कारखानों की भी जवाबदेही तय की जा सकती है।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार का प्रतीक

निरीक्षण के समय अफसरों के मास्क पहनना प्रतीक है उस खतरे का, जिसे झेलते-जागते आम लोग बिना किसी सुरक्षा के जी रहे थे। यह घटना यह भी बताती है कि एक फैक्ट्री की लापरवाही पूरे समाज और पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती है। स्थानीय प्रशासन का आदेश चाहे सशर्त हो या तो सुधारो या बंद करो मगर असल इम्तहान उसकी क्रियान्विति का है, ताकि यह कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए।

सबसे बड़ी बात यह उजागर होती है कि नागरिक अधिकार सिर्फ कागज या संविधान की किताब में नहीं, जमीन पर अमल के साथ मायने रखते हैं। नौगांव के लोगों की मांग सांस लेने का हक केवल स्थानीय सवाल नहीं, बल्कि समूचे भारत के उन लाखों-करोड़ों नागरिकों की प्रतिध्वनि है जो हर दिन किसी न किसी प्रकार के प्रदूषण के साए में जीने को मजबूर हैं।

यह मामला सिर्फ फैक्ट्री बंद करने या गंध भगाने भर की लड़ाई नहीं यह ग्रामीण भारत में लोगों की बढ़ती जागरूकता और संगठित दबाव की जीत भी है। इस लड़ाई को मजबूती और स्थायित्व तभी मिलेगा जब प्रशासन अपने आदेश की सख्ती से अनुपालन करे  ऐसे फैसले वास्तविक ज़मीन तक जाएँ, न कि केवल फाइलों, विज्ञप्तियों या ट्वीट्स तक सिमट जाएँ।