लद्दाख में औद्योगिक खनन लॉबी के का विरोध करते ही वो "देशद्रोही" बन गए
लद्दाख में औद्योगिक खनन लॉबी के का विरोध करते ही वो "देशद्रोही" बन गए

लद्दाख में औद्योगिक खनन लॉबी का विरोध करते ही  वो “देशद्रोही” बन गए

वांगचुक का दिल्ली के साथ समीकरण तीन दशकों में कैसे बदला।।

अनुवाद और रूपांतरण – आशुतोष कुमार (प्रोफेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी )

वांगचुक का नवाचारी दिमाग लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी की समस्याओं के वास्तविक समाधान पर केंद्रित रहा। 2013 में उन्होंने बर्फ के स्तूप बनाए। ये कृत्रिम ग्लेशियर हैं। पानी जमा करने के उपाय, जो लद्दाख की गर्मियों में किसानों के लिए पानी की कमी का एक अच्छा समाधान था।

तीन दशकों तक दुनिया ने सोनम वांगचुक को एक शिक्षा सुधारक, पर्यावरण कार्यकर्ता और नवाचारी के रूप में जाना, जिनके बर्फ के स्तूप ने लद्दाख और दुनिया के ठंडे रेगिस्तानों को नई जिंदगी देने का वादा किया।

लद्दाख से लेकर नई दिल्ली तक  उनका सम्मानित पर्यावरण  सक्रियतावाद धीरे-धीरे उन्हें लद्दाख की जटिल राजनीति के जाल में खींच लाया।

तीन दशकों का ये लम्बा सफर है। वे एक पर्यावरण कार्यकर्ता थे, जो लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी पर जलवायु परिवर्तन के असर को उजागर करना चाहता था। अब वे झुकने को तैयार न होने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता हैं; जो लद्दाख के लिए  राज्य का दर्जा, जमीन, नौकरी और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा चाहता है।

 शुक्रवार को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत उनकी गिरफ्तारी के साथ यह सफर चरम पर पहुंचा।

1966 में लेह के एक दूरदराज गांव में जन्मे वांगचुक के बचपन के शिक्षा अनुभवों ने उनकी सोच को आकार दिया। एक मैकेनिकल इंजीनियर से उन्होंने खुद को शिक्षा सुधारक में बदल लिया और पहला वैकल्पिक स्कूल स्थापित किया — स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL)।

वांगचुक ने अपनी ऊर्जा लद्दाख और उसकी शिक्षा पर केंद्रित की। 1994 में, उन्होंने सरकार के साथ मिलकर ‘ऑपरेशन न्यू होप’ शुरू किया, जो सरकारी शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने का एक सहयोगी प्रयास था।

इस आंदोलन ने उन्हें लद्दाख और जम्मू-कश्मीर प्रशासन के करीब पहुंचाया और उन्हें कई शैक्षिक परियोजनाओं के लिए सलाहकार नियुक्त किया गया। 2005 में, उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय में प्रारंभिक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय शासी परिषद का सदस्य बनाया गया।

वांगचुक ने लद्दाख की पारिस्थितिकी में गहरी रुचि विकसित की, जिसने उन्हें जलवायु कार्यकर्ता बना दिया। उनका SECMOL पहला ग्रीन कैंपस था, जो पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर चलता था। उनकी सक्रियता ने उन्हें 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार दिलाया।

5 अगस्त 2019 को, जब केंद्र ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों — जम्मू-कश्मीर और लद्दाख — में बांट दिया, वांगचुक ने, लेह के ज्यादातर लोगों की तरह, इसका स्वागत किया।

“थैंक यू प्राइम मिनिस्टर। लद्दाख पीएम नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देता है कि उन्होंने लद्दाख का लंबे समय का सपना पूरा किया। ठीक 30 साल पहले, अगस्त 1989 में, लद्दाखी नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे के लिए आंदोलन शुरू किया था। इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद करने वालों को धन्यवाद,” उन्होंने ट्विटर (अब X) पर पोस्ट किया।

2020 में, जब भारत और चीन गलवान में भिड़े, वांगचुक ने लोगों से अपनी “वॉलेट पावर” का इस्तेमाल कर चीनी सामान का बहिष्कार करने की अपील की। एक साल बाद, उन्होंने कठिन परिस्थितियों में रह रहे सैनिकों के लिए सौर टेंट विकसित किए।

वांगचुक, जो सक्रिय राजनीति से दूर रहे थे, ने 2023 में खारदुंग ला — दुनिया के सबसे ऊंचे दर्रों में से एक — पर जलवायु उपवास की घोषणा की, ताकि लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को उजागर किया जाए और छठी अनुसूची के तहत लद्दाख के लोगों के लिए सुरक्षा की मांग की जाए।

 सरकार ने उपवास की अनुमति नहीं दी और उन्हें घर में नजरबंद कर दिया। उन्होंने यह भी राजनीतिक बयान दिया कि लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश बनने की बजाय जम्मू-कश्मीर के साथ बेहतर था।

एक साल बाद, उन्होंने लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग के लिए अनिश्चितकालीन उपवास की घोषणा की। लेकिन इस बार उन्होंने कहा कि लद्दाख को औद्योगिक खनन लॉबी से सुरक्षा चाहिए। इससे उनका केंद्र के साथ सीधा टकराव हो गया।

हालांकि केंद्र ने उनके खिलाफ शिकंजा कसना शुरू किया — पहले उनके हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख को दी गई जमीन का आवंटन रद्द किया, फिर उनके खिलाफ CBI जांच शुरू की — वांगचुक नहीं झुके।

उन्होंने एक और उपवास शुरू किया, इस बार केंद्र और लद्दाख की कोर कमेटी के बीच 6 अक्टूबर को होने वाली बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए। इस उपवास के 15वें दिन, कुछ युवाओं का समूह टूट गया और हिंसा पर उतर आया, जिसके बाद पुलिस की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई।

 केंद्र ने वांगचुक पर “भड़काऊ बयान” देकर युवाओं को उकसाने का आरोप लगाया और उनके संस्थान का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया। तीन दिन के ड्रामे के बाद आखिरकार वांगचुक की गिरफ्तारी हुई।

गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए, वांगचुक ने कहा कि वो जेल जाने को तैयार हैं, लेकिन जेल में एक वांगचुक “आजाद सोनम वांगचुक से ज्यादा समस्याएं पैदा कर सकता है”।

साभार : इंडियन एक्सप्रेस