बाढ़ मैदान, ढलान और हिमालयी आपदाएँ
अजय सहाय
हिमालय केवल पर्वतों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह भारत की जल-सुरक्षा, जलवायु संतुलन, नदियों के उद्गम, जैवविविधता और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है, किंतु आज यही हिमालय बार-बार आने वाली बाढ़, भूस्खलन, क्लाउड बर्स्ट, ग्लेशियर ब्रस्ट और नदी-तबाही का केंद्र बनता जा रहा है, और वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इनमें से अधिकांश आपदाएँ पूर्णतः प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव द्वारा बढ़ाई गई या उत्पन्न की गई आपदाएँ हैं ।
इसी संदर्भ में Flood Plain Zoning Act 2012 का महत्व अत्यंत गहरा और दूरगामी है, क्योंकि यह कानून हमें यह सिखाता है कि नदी, बाढ़ मैदान और मानव बसावट के बीच संतुलन बिगड़ने पर आपदा अनिवार्य हो जाती है।
Flood Plain Zoning Act 2012 का मूल दर्शन यह है कि नदी का बाढ़ मैदान (Flood Plain) नदी का प्राकृतिक विस्तार होता है, जहाँ नदी को वर्षा, हिमपिघलन और अचानक जलप्रवाह के समय फैलने, ऊर्जा छोड़ने और तलछट जमाने का अधिकार होता है ।
इस अधिनियम के अंतर्गत बाढ़ मैदान को अलग-अलग ज़ोन में बाँटकर यह तय किया गया कि कहाँ कोई निर्माण नहीं होगा, कहाँ सीमित उपयोग होगा और कहाँ सुरक्षित विकास संभव है, क्योंकि केंद्रीय जल आयोग (CWC), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और IIT-NIH रुड़की के अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि भारत में बाढ़ से होने वाली लगभग 70 प्रतिशत क्षति फ्लड प्लेन पर हुए अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण के कारण होती है।
हिमालयी क्षेत्र में इस अधिनियम की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि हिमालय एक युवा पर्वत श्रृंखला है, जहाँ चट्टानें भूगर्भीय रूप से अस्थिर हैं, ढलान तीखे हैं और नदियाँ अत्यंत सक्रिय हैं ।
Geological Survey of India के अनुसार हिमालय अभी भी टेक्टोनिक रूप से सक्रिय है, अर्थात् यहाँ किसी भी बड़े पैमाने पर ब्लास्टिंग, सड़क कटान या भारी निर्माण से भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, और जब यह सब फ्लड प्लेन में होता है तो आपदा की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है।
यदि हम इतिहास और पारंपरिक ज्ञान की ओर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि पहले के लोग प्रकृति के नियमों को समझते थे; हिमालयी क्षेत्रों में गाँव नदी के बिल्कुल किनारे नहीं बल्कि फ्लड प्लेन से ऊपर सुरक्षित ढलानों, टेरेस और पहाड़ी कंधों पर बसाए जाते थे, जबकि बाढ़ मैदान को खेती, चराई, वनस्पति और नदी के फैलाव के लिए छोड़ा जाता था ।
उदाहरण के लिए उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्र में पुराने गाँव जैसे कि हर्षिल, माणा, मलारी, जौंसार क्षेत्र के गाँव, या हिमाचल के किन्नौर और कुल्लू क्षेत्र के पारंपरिक बसाव नदी से ऊँचाई पर स्थित थे, जहाँ बाढ़ का सीधा प्रभाव नहीं पड़ता था, क्योंकि लोग जानते थे कि नदी को रास्ता देने से ही जीवन सुरक्षित रहता है।
इसके विपरीत आधुनिक विकास मॉडल में हमने नदी को कंक्रीट चैनल समझ लिया; होटल, सड़क, बाजार, कॉलोनी, जलविद्युत परियोजनाएँ और पर्यटन ढाँचे सीधे फ्लड प्लेन और नदी के बहाव क्षेत्र में बना दिए गए ।
परिणामस्वरूप जब IMD के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ बढ़ीं—जहाँ पिछले 50 वर्षों में अत्यधिक वर्षा (Extreme Rainfall Events) की आवृत्ति लगभग 2.5 गुना बढ़ चुकी है—तो नदी के पास फैलने की जगह नहीं रही और पानी ने मानव-निर्मित ढाँचों को ही अपना रास्ता बना लिया।
2013 की केदारनाथ आपदा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ वैज्ञानिक विश्लेषण बताते हैं कि मंदाकिनी नदी का प्राकृतिक बाढ़ क्षेत्र होटल, दुकान और सड़क निर्माण से संकुचित हो चुका था; जब चोराबाड़ी झील से अचानक जलप्रवाह बढ़ा तो नदी ने वही मार्ग चुना जहाँ मानव बसावट थी, NDMA के अनुसार यदि फ्लड प्लेन पर निर्माण नहीं होता तो क्षति का स्तर कई गुना कम होता। इसी प्रकार 2021 की चमोली आपदा में ग्लेशियर टूटने से उत्पन्न मलबा और पानी सीधे उन क्षेत्रों में पहुँचा जहाँ नदी के किनारे जलविद्युत परियोजनाएँ और सड़कें बनी थीं, जबकि पुराने गाँव अपेक्षाकृत सुरक्षित रहे।
ISRO-NRSC के सैटेलाइट डेटा बताते हैं कि हिमालयी ग्लेशियरों में 1990 के बाद से द्रव्यमान ह्रास (Mass Loss) की दर दोगुनी हो चुकी है, और गंगोत्री, पिंडारी, मिलम जैसे हिमनद प्रति वर्ष औसतन 15–25 मीटर पीछे हट रहे हैं; जब ग्लेशियरों के सामने बनी अस्थायी झीलें टूटती हैं तो GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) जैसी घटनाएँ होती हैं, और यदि नीचे फ्लड प्लेन पर निर्माण हो तो यह आपदा सीधे मानव बस्तियों पर टूट पड़ती है।
Flood Plain Zoning Act 2012 इसीलिए केवल एक प्रशासनिक कानून नहीं बल्कि वैज्ञानिक सुरक्षा ढाल है; यह कानून यह स्वीकार करता है कि नदी को फैलने की जगह देना, ढलानों को प्राकृतिक रूप में बनाए रखना और मानव बसावट को सुरक्षित ऊँचाइयों पर स्थानांतरित करना ही दीर्घकालिक समाधान है ।
NDMA की रिपोर्ट के अनुसार हिमालय में घटित लगभग 65 प्रतिशत आपदाएँ “Human-Amplified Disasters” की श्रेणी में आती हैं, अर्थात् प्राकृतिक घटना तो होती है, पर मानव हस्तक्षेप उसे विनाशकारी बना देता है।
वनों की कटाई भी इस संकट को गहरा करती है; Forest Survey of India के अनुसार हिमालयी राज्यों में पिछले दो दशकों में घने वनों का बड़ा हिस्सा नष्ट हुआ है, जबकि देवदार, ओक और भोजपत्र जैसे वृक्ष ढलानों को स्थिर रखने और वर्षा जल को धीरे-धीरे नदी में छोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।
पहले लोग इन वनों को “जल-रक्षक” मानते थे, आज सड़क और परियोजना के लिए इन्हें हटा दिया गया, जिससे तेज़ अपवाह बढ़ा और बाढ़ की तीव्रता कई गुना हो गई।
Flood Plain Zoning Act 2012 का दूरदर्शी उद्देश्य यही है कि हम आपदा के बाद राहत नहीं, आपदा से पहले रोकथाम पर ध्यान दें; यह अधिनियम हमें यह याद दिलाता है कि विकास का अर्थ प्रकृति पर विजय नहीं बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य है ।
यदि हिमालय में इस कानून को सख्ती से लागू किया जाए, फ्लड प्लेन से अतिक्रमण हटाया जाए, नई बसावट को ढलानों और सुरक्षित क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जाए, और पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ा जाए, तो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित हिमालय मिल सकता है।
अंततः हिमालय आज मानवता को चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने नदी, बाढ़ मैदान और ढलानों के प्राकृतिक नियमों को नहीं समझा, तो आपदाएँ और अधिक भयावह होंगी; Flood Plain Zoning Act 2012 इसी चेतावनी का कानूनी रूप है—यह कानून विकास का विरोध नहीं करता, बल्कि विनाशकारी विकास को रोकने का मार्ग दिखाता है, और Vision 2047 के सुरक्षित भारत के लिए यही सबसे आवश्यक दिशा है।