वेटलैंड: जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध धरती की अंतिम प्राकृतिक ढाल
वेटलैंड: जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध धरती की अंतिम प्राकृतिक ढाल

वेटलैंड: जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध धरती की अंतिम प्राकृतिक ढाल

यदि धरती को जलवायु परिवर्तन से बचाना है, तो वेटलैंड बचाना अनिवार्य है

अजय सहाय

वेटलैंड—जिन्हें धरती के “किडनी”, “कार्बन-सिंक” और “प्राकृतिक जल-टैंक” के रूप में जाना जाता है—आज जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की सबसे बड़ी चुनौतियों जैसे ग्लोबल वार्मिंग, अनियमित मानसून, सूखा-बाढ़ चक्र, तापमान वृद्धि, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, और जैव विविधता संकट को नियंत्रित करने में विश्व की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल बन चुकी हैं ।

वैज्ञानिक अध्ययनों (IPCC AR6, Ramsar Convention Global Wetland Outlook 2021, UNEP 2023, ISRO-NRSC 2020 Wetland Atlas, MoEFCC Wetland Rules 2017) के अनुसार दुनिया के मात्र 6% स्थल क्षेत्र में फैले वेटलैंड पृथ्वी का 35% जैव विविधता, 40% freshwater species, लगभग 20–30% प्राकृतिक कार्बन-सिंक क्षमता, और 500–600 बिलियन टन से अधिक कार्बन को स्थायी रूप से पकड़ने की क्षमता रखते हैं ।  

भारत में ISRO के Wetland Atlas 2021 के अनुसार 4.6 मिलियन हेक्टेयर (46 लाख ha) वेटलैंड फैले हैं, जो देश के कुल क्षेत्रफल का मात्र 1.5% है, लेकिन जलवायु-नियमन में इनका योगदान लगभग 10–12 गुना अधिक दर्ज होता है ।

क्योंकि ये वर्षा जल को संग्रहित करके बाढ़ और सूखे के दोहरे संकट को नियंत्रित करते हैं, तापमान को स्थिर करते हैं, कार्बन को अवशोषित करते हैं, मीथेन-नाइट्रस ऑक्साइड चक्र को संतुलित करते हैं, भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) बढ़ाते हैं, और कृषि-पेयजल-पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाते हैं ।

वैज्ञानिक रूप से वेटलैंड की मिट्टी (Anaerobic Soil) में ऑक्सीजन कम होने के कारण कार्बनिक पदार्थ धीरे-धीरे विघटित होते हैं, जिससे कार्बन लम्बे समय तक सुरक्षित रहता है—इसे Blue Carbon कहा जाता है—और इसी कारण Mangrove, Peatland, Marshes और Freshwater Wetlands पृथ्वी के सबसे शक्तिशाली कार्बन-सिंक माने जाते हैं ।

UNEP 2022 के अनुसार Mangrove प्रति हेक्टेयर 1,000 टन CO₂, Peatland 2,000–3,000 टन CO₂, जबकि Salt Marsh लगभग 900–1,200 टन CO₂ स्टोर करते हैं, वहीं भारत के Sundarbans अकेले सालाना 4.5 मिलियन टन CO₂ अवशोषित कर रहे हैं ।  

वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार यदि विश्व के वर्तमान वेटलैंड का 1% क्षेत्र भी नष्ट हुआ तो वातावरण में लगभग 0.5–1 बिलियन टन CO₂ वापस मुक्त हो सकता है, जो वैश्विक तापमान वृद्धि को 15–20 वर्षों तक तेज कर सकता है—यही कारण है कि वेटलैंड संरक्षण Paris Agreement (2015) के NDC लक्ष्यों का सबसे बड़ा जैविक हथियार है ।

भारत के संदर्भ में ISRO-NRSC की अध्ययन रिपोर्ट कहती है कि भारत में हर वर्ष लगभग 2–3% वेटलैंड सिकुड़ते जा रहे हैं, जबकि FAO के अनुसार विश्व ने पिछले 300 वर्षों में अपने 35% वेटलैंड खो दिए; IPBES कहता है कि वेटलैंड Earth पर सबसे तेज नष्ट होने वाला ecosystem है ।

जंगलों की तुलना में 3 गुना तेजी से नष्ट हो रहा है; परंतु जब ये सुरक्षित होते हैं, तो जलवायु परिवर्तन के 10 बड़े संकटों को एक साथ नियंत्रित करते हैं—

(1) CO₂ अवशोषण,

(2) तापमान नियमन,

(3) वर्षा चक्र स्थिरीकरण,

(4) बादलों का निर्माण बढ़ाना (Evapotranspiration),

(5) बाढ़ में 30–60% तक जल रोकना,

(6) सूखे में जल उपलब्ध कराना,

(7) भूजल को 25–40% तक recharge करना,

(8) जैव विविधता को बढ़ाना,

(9) स्थानीय माइक्रो-क्लाइमेट को स्थिर करना,

(10) प्रदूषण नियंत्रण; वैज्ञानिक डेटा बताते हैं कि एक स्वस्थ वेटलैंड 1 हेक्टेयर में 10–20 लाख लीटर वर्षा जल थाम सकता है, जबकि बड़े वेटलैंड 5–50 करोड़ लीटर तक जल संग्रह कर सकते हैं ।

भारत में बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश के वेटलैंड मानसून rainfall को स्थिर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वाष्पीकरण (Evaporation) से उठी नमी स्थानीय मानसूनी बादलों को feed करती है—इसे Moisture Recycling कहा जाता है, जो कुल rainfall का लगभग 10–15% योगदान देता है ।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार घने वेटलैंड बेल्ट वाले क्षेत्रों में cloud formation 5–12% अधिक और बारिश 3–7% अधिक होती है; भारत के Wetland-based districts जैसे—Muzaffarpur (Manikamaun), Katihar (Gogabil), Vaishali (Baraila), Samastipur, Begusarai (Kanwar Lake), West Champaran (Sarotar Wetland), Jamui (Nagi-Nakti Bird Sanctuary).

इन क्षेत्रों में वर्षा के दौरान तापमान 1–2°C तक कम और आर्द्रता 10–20% तक अधिक रहती है, जिससे सूखे की तीव्रता कम होती है—यानी ये climate-cooling zones बनाते हैं; भूजल recharge के वैज्ञानिक अध्ययनों (CGWB 2023) के अनुसार वेटलैंड recharge contribution 70–200 mm per year तक होता है; कई जिलों में यह 25–30% वार्षिक recharge देता है ।

जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के पैटर्न में भारी बदलाव आया है—IMD के अनुसार Extreme Rainfall events 1950 की तुलना में 75% बढ़ चुके हैं, लेकिन वेटलैंड इन अत्यधिक वर्षाओं को स्पंज की तरह सोख लेते हैं—Kanwar Lake, Gogabil, Baraila, Kolleru, Chilika, Deepor Beel, Loktak जैसी झीलें बाढ़ के पानी को रोककर downstream क्षेत्रों को बचाती हैं ।

IPCC कहता है कि यदि Wetland Degradation रोक दी जाए और Restoration तेजी से की जाए, तो वैश्विक तापमान वृद्धि को 0.4°C तक कम किया जा सकता है—जो Paris Agreement को पूरा करने में दुनिया की सबसे सस्ती और प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solution: NbS) बन जाती है ।

वर्तमान परिदृश्य में Climate Change ने Wetland पर दोहरी चोट दी है—एक, बढ़ते तापमान से पानी तेजी से वाष्पित हो रहा है; दो, मानसूनी अनियमितता से recharge चक्र टूट रहा है; इसके अतिरिक्त urbanisation, illegal encroachment, जलभराव की भूमि को Real Estate में बदलना, औद्योगिक कचरा, sewage discharge, invasive species (जैसे जलकुंभी) ने वेटलैंड को कमजोर कर दिया है ।

ISRO के मानचित्रों के अनुसार भारत के लगभग 38% वेटलैंड 2000–2023 में degraded हो चुके हैं; इसी कारण भारत ने 2017 में Wetland Rules लाए, और अब तक 82 Ramsar Sites घोषित कर चुका है (विश्व में सबसे तेज गति से).

भारत की नई रणनीति “Amrit Dharohar, 2023” के अनुसार देश के बड़े वेटलैंड को Sustainable Livelihood, Blue Economy और Climate Resilient Zones के रूप में विकसित किया जा रहा है; बिहार में 50 से अधिक सक्रिय Wetland Campaigns (जैसे—Save Wetland Bihar, Manikamaun Restoration, Gogabil Ramsar Mission, Baraila Biodiversity Push, Kanwar Lake Revival) सामुदायिक भागीदारी से चल रहे हैं, जो जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सबसे बड़े grassroots मॉडल हैं ।  

MGNREGA की Natural Resource Management (NRM) वेटलैंड कैचमेंट में recharge trenches, soak pits, farm ponds, contour bunding, de-silting, inlet-outlet management कर रही है—जिससे स्थानीय जलवायु को स्थिर करने में बड़ी मदद मिलती है ।

वैज्ञानिक उदाहरण के अनुसार 1 हेक्टेयर वेटलैंड restoration से औसतन 0.3–0.8 टन CO₂/वर्ष लॉक होता है, 50–100 mm recharge बढ़ता है, 20–40% अधिक biodiversity आती है; भविष्य में 2047 तक भारत की Vision Document रिपोर्ट कहती है कि Wetland Restoration से देश का groundwater recharge 432 BCM से बढ़कर 500 BCM तक जा सकता है, और बाढ़-सूखा क्षति को 30–40% तक कम किया जा सकता है ।

जलवायु वैज्ञानिक कहते हैं कि यदि भारत अपने कुल वेटलैंड क्षेत्र का मात्र 10% भी regenerate कर दे, तो वह हर वर्ष 50–70 मिलियन टन CO₂ प्राकृतिक रूप से अवशोषित कर सकता है, जबकि Peatland Restoration से यह क्षमता 100–120 मिलियन टन CO₂ तक जा सकती है ।

वर्तमान परिदृश्य में बच्चों-युवा-सामुदायिक स्तर पर Wetland Education, River-Wetland Walk, Jal Prahari Clubs, स्कूलों में Wetland Monitoring, pH/DO/BOD टेस्टिंग, Bird Census, Climate Posters बच्चों का role बढ़ा रहे हैं—जो Vision 2047 की जलवायु रणनीति के लिए सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक capital है ।

सार रूप में, वेटलैंड धरती के जलवायु-संरक्षक हैं—ये कार्बन पकड़ते हैं, तापमान घटाते हैं, बारिश बढ़ाते हैं, बाढ़ को रोकते हैं, सूखे को कम करते हैं, मिट्टी की उर्वरता और biodiversity को बचाते हैं, और जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े Nature-Based Solution के रूप में भारत के जल, कृषि, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था को 2047 तक आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखते हैं ।

इसीलिए कहा जाता है, “यदि धरती को जलवायु परिवर्तन से बचाना है, तो वेटलैंड बचाना अनिवार्य है, क्योंकि वेटलैंड ही धरती की शीतल सांस हैं।”