दिखता नहीं, पर घातक है: जीवन के हर कण में समाता माइक्रो प्लास्टिक
दिखता नहीं, पर घातक है: जीवन के हर कण में समाता माइक्रो प्लास्टिक

दिखता नहीं, पर घातक है: जीवन के हर कण में समाता माइक्रो प्लास्टिक

प्लास्टिक प्रकृति, जीवन और भविष्य-तीनों का दुश्मन

सुनील कुमार महला

प्लास्टिक पर्यावरण का मौन ज़हर है। यह हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित करता है, मनुष्य के शरीर में घुसकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है, जीव-जंतुओं की जान लेता है और मिट्टी की उर्वरता घटाकर वनस्पतियों को कमजोर करता है। वास्तव में प्लास्टिक प्रकृति, जीवन और भविष्य-तीनों का दुश्मन है।

सच तो यह है कि इसी प्लास्टिक के कारण आज मनुष्य की सेहत लगातार खतरे में है। हाल ही में कोलकात्ता के प्रमुख पर्यावरण संस्थानों के वैज्ञानिकों ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है कि सब्जियों में माइक्रो प्लास्टिक पाया गया है। यह माइक्रो प्लास्टिक हमारी आधुनिक जीवनशैली की एक अदृश्य लेकिन एक बहुत ही गंभीर समस्या है।

दरअसल, हाल ही में एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक में प्रकाशित एक खबर के हवाले से यह सामने आया है कि गार्बेज डंपिंग ग्राउंड से डाइनिंग टेबल तक यह माइक्रोप्लास्टिक पहुंच रहा है।

पाठकों को बताता चलूं कि इस माइक्रोप्लास्टिक में क्रमशः पॉलीइथिलीन (बैग, बॉटल पाइप व पैकेजिंग के कचरे से आया), पॉलीइथिलीन टेरिफ्थेलेट(पानी/सोडा बॉटल, जार और पॉलिएस्टर कपड़े से आया), पॉलिप्रोपिलीन ( फूड कंटेनर, फर्नीचर, कार पार्ट्स के कचरे से), पॉलीस्टाइरीन(डिस्पोजेबल प्लेट, थर्माकोल पैकिंग आदि के कचरे से) तथा पॉलीविनाइल क्लोराइड( पाइप,वायर कवर, और फ्लोरिंग के कचरे से) जैसे प्लास्टिक शामिल हैं।

वास्तव में यह बहुत ही गंभीर और संवेदनशील है कि जो मिर्च हम खा रहे हैं,उसके हर ग्राम में माइक्रो प्लास्टिक के 19 कण, एक ग्राम पत्ता गोभी में 10, और बैंगन,पालक व टमाटर में 15 कण तक हो सकते हैं। वास्तव में सच तो यह है कि आज माइक्रो प्लास्टिक हमारी खेती पर बहुत ही हानिकारक असर डाल रहा है।

यहां पाठकों को बताता चलूं कि माइक्रो प्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार 5 मिलीमीटर से कम होता है। ये कण बड़े प्लास्टिक पदार्थों के टूटने-फूटने से बनते हैं या कुछ उत्पादों में पहले से ही सूक्ष्म रूप में मौजूद रहते हैं। माइक्रो प्लास्टिक पानी, हवा, मिट्टी और भोजन के माध्यम से हमारे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

शोध बताते हैं कि ये कण पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ मानव स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। हाल फिलहाल,जो रिपोर्ट आई है, यह रिपोर्ट कलकत्ता व जादवपुर विश्वविद्यालयों के पर्यावरण विज्ञानियों व परमाणु ऊर्जा विभाग के संस्थानों ने तैयार की है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार कोलकाता की धापा डंपिंग साइट के आसपास मौजूद खेतों की वैज्ञानिकों ने ग्रिडिंग की और 25 खेतों से पत्ता गोभी, मिर्च, बैंगन, पालक, टमाटर जैसी सब्जियों व मिट्टी के नमूने लिए और इन सभी नमूनों में माइक्रो-प्लास्टिक मिला। आज जयपुर सहित ज्यादातर बड़े शहरों में डंपिंग ग्राउंड के आसपास सब्जियों की खेती की जा रही है।

रिपोर्ट ने चेताया है कि कूड़े के ढेर के पास पालक आदि सब्जियां उगाने से प्लास्टिक पेट में पहुंचा सकता है। डंप हो रहे कचरे से प्लास्टिक अलग करना भी जरूरी है, वरना यह नदी-नालों व बारिश के पानी से दूर मौजूद बहाव क्षेत्र के पास बने खेतों में भी पहुंच सकता है। बैग, बॉटल आदि के टूटने से प्लास्टिक के 5 एमएम से छोटे कण मिट्टी, पानी, हवा व खाने में आते हैं और सूजन, हार्मोन, प्रजनन, कैंसर, दिल की बीमारी व इम्यून सिस्टम कमजोर कर सकते हैं।

आज हमारे नीले ग्रह पर हर कहीं प्लास्टिक का बोलबाला है और शायद ही कोई जगह बची हो, जहां प्लास्टिक या माइक्रो प्लास्टिक का आविर्भाव नहीं हो। मतलब यह है कि आज प्लास्टिक सभी जगहों पर मौजूद है।सच तो यह है कि माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी केवल समुद्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि भोजन, पानी, हवा और यहां तक कि मानव शरीर तक में दर्ज की गई है।

सब्जियों में ही नहीं, अब तक किए गए विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में यह सामने आ चुका है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल समुद्र या मिट्टी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की चीज़ों जैसे कि नमक, चीनी और पानी की बोतलों तक पहुँच चुका है।जल स्रोतों की बात करें तो माइक्रो प्लास्टिक समुद्र, नदियों, झीलों और भूजल में पाया जा रहा है। बोतलबंद पानी, नल का पानी और यहां तक कि वर्षा जल में भी इनके कण मिलने की पुष्टि हुई है।

समुद्र में मौजूद ये कण मछलियों और अन्य जलीय जीवों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं, जिससे खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है। गौरतलब है कि समुद्री नमक में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी इसलिए पाई गई क्योंकि समुद्र में बहने वाला प्लास्टिक टूटकर बहुत छोटे कणों में बदल जाता है और वही कण नमक बनाने की प्रक्रिया के दौरान उसमें मिल जाते हैं। इसी तरह चीनी और अन्य खाद्य पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक कारखानों की हवा, प्लास्टिक पैकेजिंग और प्रसंस्करण के दौरान मिल सकता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो खाद्य पदार्थों में माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी बहुत ही चिंताजनक है। नमक (खासकर समुद्री नमक), चीनी, शहद, दूध, चावल, समुद्री भोजन और विभिन्न पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में इसके अंश पाए गए हैं। वास्तव में प्लास्टिक पैकेजिंग, प्रसंस्करण और भंडारण के दौरान ये कण भोजन या खाद्य पदार्थों में मिल जाते हैं,जो मनुष्य के लिए बहुत ही हानिकारक सिद्ध होते हैं।

बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक का स्रोत अक्सर खुद प्लास्टिक की बोतल और ढक्कन होते हैं, जिनसे रगड़ और तापमान के कारण सूक्ष्म कण पानी में घुल जाते हैं। आज हमारा पर्यावरण काफ़ी हद तक प्रदूषित हो चुका है और कुछ समय पहले राजधानी दिल्ली की हवा में माइक्रो प्लास्टिक कणों की मौजूदगी कुछ क्षेत्रों में देखने को मिली थी।

कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में वायु और धूल के कणों के माध्यम से भी माइक्रो प्लास्टिक मानव शरीर तक पहुंच रहा है। सिंथेटिक कपड़ों से निकलने वाले रेशे, टायर घिसने से बनने वाले कण और प्लास्टिक कचरे का टूटना-ये सभी हवा में माइक्रो प्लास्टिक बढ़ाते हैं और सांस के जरिए ये हमारे फेफड़ों में प्रवेश कर सकते हैं।

इतना ही नहीं, घरेलू उपयोग की वस्तुएं भी इसका बहुत बड़ा स्रोत हैं। दरअसल, प्लास्टिक के बर्तन, चॉपिंग बोर्ड, बोतलें, पैकेजिंग सामग्री, टूथपेस्ट और कॉस्मेटिक्स में मौजूद माइक्रोबीड्स माइक्रो प्लास्टिक फैलाते हैं। कपड़े धोने पर सिंथेटिक फैब्रिक से निकलने वाले रेशे नालियों के जरिए विभिन्न जल स्रोतों में पहुंच जाते हैं और जल स्त्रोतों को प्रदूषित करते हैं और वहीं जल हम किसी न किसी रूप में काम में लेते हैं। सबसे बड़ी चिंताजनक बात तो यह है कि माइक्रो प्लास्टिक मानव शरीर में भी पाया गया है। कुछ अध्ययनों में यह सामने आया है कि मनुष्य रक्त, फेफड़ों, प्लेसेंटा और मल के नमूनों में माइक्रो प्लास्टिक के कण मिले हैं।

बहरहाल,यह एक कड़वा सच है कि माइक्रोप्लास्टिक आज पानी, भोजन और पर्यावरण के लगभग-लगभग हर हिस्से में पाया जा रहा है। शोध बताते हैं कि 93 प्रतिशत से अधिक बोतलबंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद है। पुराने अध्ययनों में, जो केवल अपेक्षाकृत बड़े कणों को मापते थे, एक लीटर बोतलबंद पानी में औसतन 10 से 325 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं।

लेकिन हाल के उन्नत अध्ययनों में, जिनमें नैनोप्लास्टिक (अत्यंत सूक्ष्म कण) भी शामिल किए गए, यह संख्या एक लीटर पानी में लगभग 2 से 3 लाख कणों तक पाई गई है। जैसा कि इस आलेख में ऊपर चर्चा कर चुका हूं कि नमक, चीनी और समुद्री भोजन में भी माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई है। क्या यह चिंताजनक बात नहीं है कि एक सामान्य व्यक्ति प्रति वर्ष 40,000 से 50,000 माइक्रोप्लास्टिक कण अनजाने में ग्रहण कर लेता है।

बोतलबंद पानी का अधिक उपयोग करने वालों में यह मात्रा और भी ज्यादा हो सकती है। ये सभी आंकड़े यह बखूबी दर्शाते हैं कि माइक्रोप्लास्टिक अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर वैश्विक समस्या बन चुका है।वैज्ञानिकों का यह मानना है कि लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक का सेवन मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, हालांकि इसके पूरे दुष्परिणामों पर अभी शोध जारी है।

गौरतलब है कि माइक्रोप्लास्टिक से होने वाली बीमारियाँ धीरे-धीरे सामने आती हैं और इसका असर पूरे शरीर पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर यह हार्मोन असंतुलन पैदा कर सकता है, जिससे थायरॉयड, प्रजनन क्षमता और बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। पाचन तंत्र में पहुँचकर यह पेट दर्द, सूजन और आंतों की कार्यप्रणाली को कमजोर करता है। सांस के साथ जाने पर फेफड़ों में सूजन, खांसी और दमा जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।

रक्त में पहुँचकर यह हृदय रोगों का खतरा बढ़ाता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करता है। लंबे समय तक माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में रहने से कोशिकाओं को नुकसान पहुँच सकता है, जिससे कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम भी बढ़ने की आशंका जताई जाती है।यही कारण है कि प्लास्टिक के अत्यधिक उपयोग पर नियंत्रण और सुरक्षित विकल्पों की ओर बढ़ना आज एक गंभीर आवश्यकता बन चुका है।

वास्तव में, आज जरूरत इस बात की है कि हम प्लास्टिक का सीमित उपयोग, पुनर्चक्रण(रि-साइकिल) और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनायें, क्यों कि यह आज हमारे समय की बहुत बड़ी आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में या संक्षेप में कहें तो माइक्रो प्लास्टिक हमारी जरूरत से ज्यादा प्लास्टिक इस्तेमाल करने की आदत का नतीजा है।

इससे बचने के लिए प्लास्टिक कम करना, उसे दोबारा इस्तेमाल और रिसाइकिल करना, तथा प्लास्टिक के विकल्प अपनाना जरूरी है। यह खतरा सिर्फ प्रकृति तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।

फ्रीलांस राइटर कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड ।