1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में संचालित पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit) में ‘एजेंडा 21’ शीर्षक के तहत 178 से अधिक देशों द्वारा अपनाई गई 21वीं सदी की घोषणा, मानव गतिविधियों के कारण होने वाले पर्यावरण (Environment) और पारिस्थितिकी (Ecology) के विनाश का मुकाबला करने का एक निर्णायक कदम माना जा सकता है।उसी सम्मेलन ने जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर एक सम्मेलन की मेजबानी की, जिसे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) के रूप में जाना जाता है।
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छोटी नदियों को हड़पने से डूबते हैं शहर
छोटी नदियां अक्सर गाँव, कस्बों में बहुत कम दूरी में बहती हैं । कई बार एक ही नदी के अलग अलग गाँव में अलग-अलग नाम होते हैं । बहुत नदियों का तो रिकार्ड भी नहीं है । हमारे लोक समाज और प्राचीन मान्यता नदियों और जल को ले कर बहुत अलग थी, बड़ी नदियों से दूर घर-बस्ती हो ।
Read moreहिंदू कालेज में एक पेड़ मां के नाम अभियान
एक पेड़ मां के नाम ऐसा अभियान है जिसमें इन दोनों से एक साथ जुड़ाव महसूस होता है। हिंदू कालेज में अभियान का शुभारंभ करते हुए प्राचार्य प्रो अंजू श्रीवास्तव ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना की महाविद्यालय इकाई ने इस अभियान से जुड़कर पर्यावरण और प्रकृति के क्षेत्र में प्रशंसनीय कार्य किया है।
Read moreकार्यपालिका के सामने लाचार-असहाय न्यायपालिका
छतरपुर के तालाबों को अतिक्रमण मुक्त करने के लिये मप्र जबलपुर उच्च न्यायालय ने दायर जनहित याचिका क्रमांक 6373/2011 में सुनवाई बाद तब के मुख्य न्यायाधीश श्री ए एम खानवेलकर की डिवीजन बेंच ने छतरपुर जिले के सभी तालाबों से अतिक्रमण हटाने का 7 अक्टूबर 2014 को आदेश दिया था।
Read moreमानसून को जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा
मानसून शब्द असल में अरबी शब्द ‘मौसिम’ से आया है, जिसका अर्थ होता है मौसम। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरबी मल्लाह इस षब्द का इस्तेमाल करते थे।
Read moreभारत की लुप्त हो गई छोटी नदियों का नागरिक सर्वेक्षण
नदियों का सर्वे गूगल फॉर्मhttps://forms.gle/rYuipfCrxFTdx4a1A
Read moreस्थानीय पर्यावरणीय समस्याएँ और सकारात्मक कार्य
स्थानीय पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान केवल सरकार और बड़े संगठनों की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
Read moreमानसून में मन के आंसू
क्या जल बिना जीवन संभव है? क्या जंगल बिना मंगल संभव है? और क्या समाज की संपन्नता के बिना व्यक्ति की संपन्नता संभव है? सत्ता को समाज के आंसू दिखते भी हैं या नहीं? समाज को अपने आंसू पोछना सीखना होगा।
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