जलवायु परिवर्तन: पिघलते ग्लेशियर व बारिश ने 11,113 नदियों को बनाया खतरनाक एशिया की जीवनरेखा पर संकट
जलवायु परिवर्तन: पिघलते ग्लेशियर व बारिश ने 11,113 नदियों को बनाया खतरनाक एशिया की जीवनरेखा पर संकट

जलवायु परिवर्तन: पिघलते ग्लेशियर व बारिश ने 11,113 नदियों को बनाया खतरनाक

एशिया की जीवनरेखा पर संकट

हिमालय, तिब्बत और पामीर क्षेत्र की 11,113 नदियों में जल प्रवाह तेजी से बढ़ा है। अध्ययन में पाया गया कि ग्लेशियर पिघलने से नदियों की धार तेज हुई है, जिससे भारत-नेपाल में जलविद्युत परियोजनाओं पर दबाव बढ़ रहा है। टर्बाइनों में रुकावट और बांधों की क्षति का खतरा गहराया है।

एशिया के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र हिमालय, काराकोरम, हिंदूकुश, तिब्बती पठार और पामीर को थर्ड पोल कहा जाता है, क्योंकि यहां अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के बाद सबसे ज्यादा बर्फ जमा है। लेकिन अब यही इलाका जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी चेतावनी बनता जा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स अम्हर्स्ट के नेतृत्व में किए गए अध्ययन ने खुलासा किया है कि पिछले 15 वर्षों में इस क्षेत्र की 11,113 नदियों के जल प्रवाह में खतरनाक वृद्धि हुई है।

यह बदलाव भारत, चीन, नेपाल, पाकिस्तान समेत कई देशों की जीवनरेखा कही जाने वाली नदियों को प्रभावित कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने 2004 से 2019 के बीच उपग्रह डाटा और कंप्यूटर मॉडल की मदद से 1,14,000 नदियों का प्रवाह ट्रैक किया। नतीजे बताते हैं कि करीब 10% नदियों (11,113) में जल प्रवाह बहुत तेजी के साथ बढ़ा है। औसतन 2.7% प्रतिवर्ष पानी की मात्रा में वृद्धि हुई। इसमें से 2.2% हिस्सा ग्लेशियरों के पिघलने से आया। खासकर ऊंचाई वाले हिस्सों और छोटी नदियों पर असर ज्यादा पड़ा।

जलविद्युत परियोजनाओं पर बढ़ता दबाव

नेपाल और भारत जैसे देशों में, जहां नदियों पर आधारित हाइड्रोपावर प्रमुख ऊर्जा स्रोत है, यह बदलाव नई चुनौतियां ला रहा है। बढ़ते प्रवाह से गाद और पत्थर बांधों की ओर बहने लगे हैं। टर्बाइनों में रुकावट और जलाशयों की क्षमता घट रही है। प्रमुख शोधकर्ता जोनाथन फ्लोरेस के अनुसार तेज प्रवाह से नदियों की शक्ति बढ़ती है, जिससे बांधों और टर्बाइनों पर भारी दबाव पड़ता है।

भारत और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी की चुनौतियां

भारत के लिए यह अध्ययन खास मायने रखता है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना बेसिन में हिमालय के कुछ हिस्सों और गंगा के निचले क्षेत्रों में जल प्रवाह कम हुआ है। दूसरी ओर दक्षिण-पश्चिमी गैर-हिमनद क्षेत्रों में प्रवाह तेजी से बढ़ा है। इसका असर उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ रहा है, जहां ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियां स्थानीय कृषि, पेयजल और सिंचाई के लिए जीवनरेखा हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ग्लेशियर पिघलने की यही रफ्तार रही तो आने वाले दशकों में गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में मौसमी प्रवाह असंतुलित हो सकता है, जिससे बाढ़ और सूखे की आवृत्ति बढ़ेगी।

बचत खाते की तरह ग्लेशियर

वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर और बारिश की तुलना बैंकिंग से की है। बारिश, तनख्वाह की तरह नियमित जरूरतों को पूरा करती है। जबकि ग्लेशियर, बचत खाते की तरह धीरे-धीरे ब्याज की तरह पानी देते हैं।लेकिन मौजूदा हालात में ग्लेशियरों से जरूरत से ज्यादा पानी आ रहा है। इसका मतलब है कि बचत खाते का मूलधन खर्च हो रहा है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो भविष्य में पानी की कमी गंभीर हो सकती है।

(अमर उजाला से साभार )