आस्था से जल संरक्षण तक भारत के धार्मिक स्थलों पर जल पुनर्भरण और रीसायक्लिंग की वैज्ञानिक क्रांति
आस्था से जल संरक्षण तक भारत के धार्मिक स्थलों पर जल पुनर्भरण और रीसायक्लिंग की वैज्ञानिक क्रांति

आस्था से जल संरक्षण तक

भारत के धार्मिक स्थलों पर जल पुनर्भरण और रीसायक्लिंग की वैज्ञानिक क्रांति

अजय सहाय

भारत के धार्मिक स्थलों पर जल का उपयोग एक पवित्र अनुष्ठान के रूप में होता है, जिसमें हाथ धोना, स्नान करना, मूर्तियों को स्नान कराना (अभिषेक), पुष्प अर्पण, जल अर्पण, चरणामृत वितरण, दीप प्रज्वलन के पूर्व जल का छिड़काव, व भगवान को भोग अर्पण से पूर्व जल से पवित्रिकरण जैसी परंपराएं शामिल हैं, और यह परंपराएं देशभर के करोड़ों मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों व अन्य धार्मिक स्थलों पर प्रतिदिन दोहराई जाती हैं, जिससे प्रतिदिन औसतन 500 से 700 लीटर पानी प्रति धार्मिक स्थल उपयोग होता है ।

यदि हम देश के लगभग 10 लाख प्रमुख धार्मिक स्थलों (जिनमें से 80% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं) को ध्यान में रखें तो यह दैनिक जल उपयोग 60 से 70 करोड़ लीटर तक पहुँचता है, जो कि वार्षिक स्तर पर 2190 से 2555 करोड़ लीटर (21.9 से 25.5 करोड़ क्यूबिक मीटर) के बीच होता है ।

 इस विशाल मात्रा में जल उपयोग का यदि हम विज्ञान-आधारित रीसाइक्लिंग और रेन वाटर हार्वेस्टिंग (RWH) के संयोजन से प्रबंधन करें तो देश के जल संकट को कम करने में यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, उदाहरण के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर (आंध्र प्रदेश) जैसे धार्मिक स्थलों ने पहले से रीसायकल जल का प्रयोग चरणामृत धोने व मूर्ति अभिषेक में करना आरंभ किया है ।

 वहीं अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालुओं के स्नान व लंगर में उपयोग किए गए जल को नवीनतम बायो-रीसायक्लिंग तकनीक से साफ कर पुनः उपयोग हेतु संग्रहित किया जा रहा है, जिससे प्रतिदिन 4-5 लाख लीटर जल बचत हो रही है, इसी प्रकार वाराणसी, प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक, अयोध्या, पुरी, मदुरै, कोल्लम, कांचीपुरम, त्रिवेंद्रम जैसे तीर्थ स्थानों पर नदी व सरोवर स्नान की परंपरा के चलते भारी मात्रा में जल का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोहन होता है ।

उदाहरणस्वरूप कुंभ मेले के दौरान प्रयागराज में एक दिन में गंगा स्नान करने वाले लोगों की संख्या 1.5 से 2 करोड़ तक पहुँचती है, जिसमें लगभग प्रति व्यक्ति 15 लीटर जल उपयोग (स्नान, हाथ धोना, वस्त्र धोना) मानें तो केवल एक दिन में ही 30 करोड़ लीटर जल उपयोग हो जाता है, यदि ऐसे अवसरों पर गंगा तटों पर वॉटर ट्रीटमेंट यूनिट्स, ग्रेविटी बेस्ड माइक्रो ट्रीटमेंट सिस्टम, या फ्लोटिंग बायोफिल्टर यंत्रों को तैनात किया जाए तो उस जल का 60% तक पुनर्चक्रण संभव है ।

इससे न केवल गंगा की स्वच्छता बनी रहेगी बल्कि यह प्रत्येक कुंभ में लगभग 1000 करोड़ लीटर जल बचत में सहायक होगा, इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत के मंदिरों में जैसे कि मीनाक्षी मंदिर (मदुरै), पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल), वेंकटेश्वर मंदिर (तिरुपति), व वेल्लोर गोल्डन टेम्पल में जल आधारित अनुष्ठानों (पंचामृत अभिषेक, जलधारा, आदि) में प्रतिदिन 5 से 10 हजार लीटर जल उपयोग होता है, वहीं यदि इस जल को संग्रहित कर ड्रिप सिंचाई, वाटर टैंक साफ़ सफाई व औषधीय पौधों की सिंचाई में उपयोग किया जाए तो प्रतिदिन लाखों लीटर जल बचाया जा सकता है ।

 इसके लिए वेटलैंड माइक्रो बायोफिल्टर, नेचुरल सैंड फिल्ट्रेशन, ग्रीवेल आधारित रिसाइकल टैंक, तथा जैविक ग्रे-वॉटर सिस्टम जैसे नवाचार लागू किए जा सकते हैं, इसके अतिरिक्त देश के 5 लाख मस्जिदों में वुज़ू (ablution) की प्रक्रिया में भी प्रति व्यक्ति औसतन 2-3 लीटर जल खर्च होता है, यदि एक मस्जिद में औसतन 200 लोग नमाज पढ़ते हैं तो एक मस्जिद में प्रतिदिन 500-600 लीटर जल उपयोग होता है ।

यह मात्रा पूरे भारत के लिए जोड़ने पर 25 से 30 करोड़ लीटर प्रतिदिन तक पहुँचती है, इसे वुज़ू वाटर रीसायकल यूनिट्स के माध्यम से संग्रहित कर आसपास के पौधों की सिंचाई, टॉयलेट फ्लशिंग, या कूलर व धुलाई के पानी में प्रयोग किया जा सकता है, इसी प्रकार गुरुद्वारों में लंगर संचालन व पवित्र सरोवर स्नान में प्रतिदिन 3 से 5 लाख लीटर जल उपयोग होता है (स्वर्ण मंदिर इसका प्रमुख उदाहरण है), यदि गुरुद्वारों में बोरे होल आधारित भूजल दोहन की जगह रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अनिवार्य किया जाए तो बारिश के मौसम में प्रति गुरुद्वारा औसतन 10 से 15 लाख लीटर जल संग्रहण संभव है ।

वहीं चर्चों में भी बपतिस्मा (Baptism) व शुद्धिकरण अनुष्ठानों में जल का उपयोग होता है जिसे वॉटर रीसायकल चैम्बर्स के ज़रिए पुनः प्रयोग में लाया जा सकता है, यदि हम इन धार्मिक स्थलों की जल-उपयोग संरचना को सार्वजनिक जल नीति (National Water Policy) 2020 के तहत “धार्मिक जल संरक्षण कार्यक्रम (Religious Water Sustainability Programme)” में सम्मिलित करें और राज्य स्तर पर “धार्मिक जल नियमन अधिनियम” लाया जाए ।

 जिसमें प्रत्येक धार्मिक स्थल को जल उपयोग रजिस्ट्रेशन, जल संरक्षण तकनीकी रिपोर्ट, व जल-पुनः उपयोग मॉडल लागू करना अनिवार्य किया जाए तो इससे पूरे भारत में धार्मिक स्थलों से लगभग 1500 से 2000 करोड़ लीटर जल प्रतिवर्ष बचाया जा सकता है, जो कि 25 से 30 बड़े शहरों की वार्षिक जल आवश्यकता पूरी करने के बराबर होगा, इसके अतिरिक्त इन स्थलों पर बारिश का जल भी पर्याप्त मात्रा में गिरता है ।

यदि हर धार्मिक स्थल पर 100 वर्गमीटर का रेन वॉटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर स्थापित किया जाए जो औसतन 1.2 से 1.5 लाख लीटर प्रति वर्ष संग्रहण करे तो 10 लाख धार्मिक स्थलों से 1200 करोड़ लीटर जल संग्रहण संभव है, इन सभी उपायों को जल शक्ति मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय, व NITI Aayog द्वारा समन्वित योजना के अंतर्गत लागू किया जाए तो भारत 2047 तक धार्मिक स्थलों को जल आत्मनिर्भर बना सकता है ।

यह पहल न केवल जल संकट के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी बल्कि स्वच्छ भारत मिशन, नमामि गंगे, अमृत 2.0, व Catch the Rain अभियान को भी व्यापक जन सहभागिता के साथ मजबूती प्रदान करेगी, साथ ही इससे श्रद्धालुओं में जल संरक्षण के प्रति चेतना जागृत होगी और धार्मिक आस्था जल संरक्षण से जुड़ जाएगी, जो कि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक धरोहर को वैज्ञानिक प्रबंधन और सतत विकास के साथ जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा, और इससे जल संरक्षण की ऐसी क्रांति संभव होगी जिसमें आस्था और विज्ञान दोनों का समन्वय होगा।