नई परिभाषा ने तो अरावली की जमीन को ही हड़पने का षड्यंत्र किया है।
जलपुरुष राजेन्द्र सिंह
उच्चतम न्यायालय से भारत सरकार को नए खनन पट्टे नहीं देने का आदेश मिला है। इस आदेश के बाद भारत सरकार ने यही आदेश चारों राज्यों को दिया है। इस आदेश के बाद भी राजस्थान सरकार ने नए खनन पट्टे दिए हैं। यह केवल न्यायालय की अवमानना ही नहीं बल्कि देश की जनता के साथ धोखा है, षड्यंत्र है, पाप है।
राजस्थान सरकार ने न्यायालय के आदेश की अवहेलना में नए खनन पट्टे नहीं देने के आदेश को खूब प्रचार-प्रसार किया है, लेकिन 2 से 18 दिसंबर 2025 तक अरावली के अलवर में 20, जयपुर में 6, कोटपुतली में 7, तिजारा में 2, राजसमंद में 2, दौसा में 1, भीलवाड़ा में 6, सिरोही में 5, झुंझनू में 1, खदानों के नए पट्टे उच्चतम् न्यायालय के निर्णय में पाबंद होने के बाद भी राजस्थान सरकार ने अरावली में 50 नए खानों के पट्टे दे दिए हैं और यह किसी को नहीं बताया है।
जबकि उच्चतम् न्यायालय ने अपने अगले निर्णय खनन प्लान से पूर्व किसी भी प्रकार की खनन लीज पर रोक लगा के रखी है, फिर भी नए पट्टे दिए जा रहे है। अब ‘अरावली विरासत जन अभियान’ को अंदर ही अंदर चल रहे अरावली हत्या, सरकारी षड्यंत्र और अरावली की वास्तविक स्थिति को मौके पर जाकर जनता को बताने की जरूरत है। ‘अरावली सिंहनाद’ अब शुरू होगा।
20 नवंबर 2025 को अरावली की जमीन पर कब्जा करने वाला निर्णय उच्चतम न्यायालय से जैसे कराया गया है, वैसा ही चारों राज्य सरकारों को अरावली में नई खनन लीज न देने का आदेश भेजा गया है। यह हमारे ‘अरावली विरासत जन अभियान’ का लक्ष्य नहीं है। हमारा लक्ष्य है कि ‘अरावली खनन मुक्त-हरी भरी बने’। यह तभी संभव होगा जब अरावली की जमीन अरावली को मिलेगी। भारत सरकार यदि अरावली विरासत को खनन, नए शहरी विस्तार और भ्रष्टाचार से मुक्त करेंगी, तभी अरावली जैसी आज है वैसी ही उसकी जमीन मिल पाएगी।
नई परिभाषा ने तो अरावली की जमीन को ही हड़पने का षड्यंत्र किया है। सबसे पहले इसकी पहचान को बदलकर खत्म करना, फिर इसकी जमीन पर किसी एक-दो या कुछ उद्योगपतियों की संपत्ति बन जाना, और उसके बाद वे जो चाहें वह कर सकें, यही 20 नवंबर का निर्णय अरावली की जमीन छिनने वाला है।
यह निर्णय उच्चतम न्यायालय से पाने हेतु सरकार ने रिकॉर्ड ठीक से प्रस्तुत नहीं किए होंगे। क्यों नहीं किए होंगे, यह तो समझ आता है। लेकिन न्यायालय का काम होता है सभी रिकॉर्ड प्राप्त करने की कोशिश करना या अरावली को बचाने वालों को बुलाकर उन्हें भी सुनना। इस बार न्यायालय ने इस निर्णय को सुनाने से पहले ऐसा नहीं किया। इसी अदालत ने 1990 से लेकर अब तक दर्जनों निर्णय अरावली के जंगल और जंगली जीवों को बचाने के लिए दिए हैं।
उनमें से किसी एक को भी इस निर्णय में नहीं सुना गया, न ही किसी को बुलाया गया। मुझे भी नहीं बुलाया गया। मैं तो 1980 से सीधे तौर पर अरावली को बचाने एवं पुनर्जीवन हेतु काम कर रहा हूं। अरावली आज जो कुछ भी बची है, उसका एक प्रमुख कारण अरावली में खनन बंद कराना और जिनकी जमीन थी उन्हें उनकी जमीन वापस दिलाना रहा है। किसानों की जमीन किसानों को दिलाई है, गोचर की जमीन खाली कराई है।
आज अरावली की जमीन पर बड़े-बड़े उद्योगपतियों के कब्जे करने वाली साजिश कामयाब हो रही है। अरावली की जनजातियों, आदिवासियों और किसानों से अरावली को लेकर बड़ी सफारी, शहर, खनन उद्योग द्वारा अरावली माई से कमाई ही सरकार और कुछ बड़े औद्योगिक घरानों का लक्ष्य है।
यह इस नए आदेश से स्पष्ट नजर आ रहा है। इसलिए अब ‘अरावली विरासत जन अभियान’ को आंदोलन की तैयारी हेतु पूरी अरावली पहाड़ियों की परिक्रमा शुरू करनी होगी। परिक्रमा करके अपने रिकॉर्ड पर लाना ही होगा।
यह पहाड़ी परिक्रमा जब 1990 से 1993 तक मैंने की थी, तब भरतपुर, धौलपुर, सवाई माधोपुर, बूंदी, भीलवाड़ा, फुलवारी की नाल, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, मेवाड़, पाली, मारवाड़ के हिस्से की अरावली में अलग-अलग कुल 18 दलों ने यात्रा की थी और गुरु शिखर, माउंट आबू में सभी दल मिले थे। यहां आयोजित सम्मेलन के बाद संपूर्ण अरावली के मध्य मार्ग पर यात्रा निकालनी थी, जिसे ‘अरावली का सिंहनाद’ कहा गया। इस यात्रा ने अरावली अधिसूचना को क्रियान्वित कराने हेतु चालू खनन को प्रत्यक्ष मौके पर जाकर बंद कराया था।
अरावली की जमीन जानने हेतु प्रत्यक्ष अरावली की जमीनी परिक्रमा होनी चाहिए। सरकार और न्यायालय को अरावली की लोक शक्ति से मिलाने हेतु एक सीधी यात्रा आयोजित करनी चाहिए। अभी समय है, किसानों के पास भी समय है। मीडिया भी अरावली की जानकार बनने हेतु इच्छुक दिखाई दे रही है।
यात्रा अरावली की सच्चाई बताएगी। अरावली यात्रा में पांचों प्रकार के लोगों का होना आवश्यक है। अरावली का भूविज्ञान समझने वाले साथी;
अरावली की सीमाओं को राजस्व रिकॉर्ड और पुरानी-नई जीटी शीट व गूगल शीट में अंतर ढूंढने वाले साथी;
अरावली के दर्द से पीड़ित लोग, जो अपनी पीड़ा को अरावली के दर्द से जोड़कर लोगों का दिल, दिमाग और हाथ अरावली से जोड़ने का काम करें; सभी प्रकार के मीडिया साथी;
तथा परिक्रमा क्षेत्र की सरकारी संस्थाओं के विद्यार्थी और शिक्षक से संपर्क रखने, कार्यक्रम करने में सक्षम साथी, जो जनप्रतिनिधियों को भी इस सीधी यात्रा में मां अरावली की पीड़ा से जोड़ सकें।
सरकार एक तरफ खनन पट्टे देने से इनकार कर रही है, दूसरी तरफ उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद भी 50 खनन पट्टे दे दिए हैं। ऐसे सभी स्थानों पर चल रही चालबाजियों का पता लगाने में सक्षम साथी अरावली पुकार यात्रा में साथ-साथ रहें। चलने वालों की संख्या ज्यादा न हो, व्यवस्थाओं का बोझ न बढ़े। ऐसे में स्थानीय लोग यात्रा में ज्यादा रहें। उनका इस यात्रा में अधिक रहना यात्रा को सफल बनाएगा। यात्रा की साध्य-सिद्धि लोक शक्ति से यह सुनिश्चित करना है कि अरावली की जमीन अरावली की ही रहे, उसके अनुकूल वातावरण निर्माण करके अरावली समाज में ‘अरावली अपनत्व’ बढ़ाया जाए।
अब अरावली की गूंज प्रत्येक के कानों में जाकर मन, मस्तिष्क, हाथों और मुख से यात्रा में ‘अरावली का सिंहनाद’ बाहर आना चाहिए। यात्रा का साध्य स्पष्ट है, यात्रा करने वालों की यात्रा साधना बन जाए। साधन भी यात्रा के लिए स्वतः मिलते जाएंगे।
यात्रा के साध्य की सिद्धि का यही रास्ता है। अभी यात्रा के लिए अत्यंत अनुकूल समय है। समय पर किए गए काम का आधा परिणाम तो आरंभ में ही मिलता है, शेष सब रास्ते में मिल जाता है। यात्रा संपन्न होने से पूर्व ही साध्य सिद्धि हो जाती है।