जैव विविधता संकट पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र का टूटता संतुलन और मानव सभ्यता पर बढ़ता अस्तित्व संकट
जैव विविधता संकट पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र का टूटता संतुलन और मानव सभ्यता पर बढ़ता अस्तित्व संकट

जैव विविधता संकट

पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र का टूटता संतुलन और मानव सभ्यता पर बढ़ता अस्तित्व संकट

अजय सहाय

जलवायु परिवर्तन, अंधाधुंध वनों की कटाई, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, नदियों और समुद्रों में मानव-जनित कचरे का प्रवाह, भूजल का अत्यधिक दोहन, आक्रामक वनस्पतियों और जीवों का फैलाव, भूमि उपयोग में तीव्र परिवर्तन, समुद्री अम्लीकरण, झीलों-तालाबों का समाप्त होना ।

आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना, पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क कटान, खनन, बाँध निर्माण और अत्यधिक मानवीय दबाव जैसे कारणों ने पृथ्वी की जैव विविधता को अब तक के सबसे बड़े संकट यानी “छठे सामूहिक विलुप्ति काल” की ओर धकेल दिया है, जहाँ पृथ्वी पर विद्यमान ज्ञात-अज्ञात लगभग साढ़े आठ लाख प्रजातियों में से दस लाख प्रजातियाँ आगामी दशकों में समाप्ति के कगार पर पहुँच सकती हैं ।

वैश्विक वैज्ञानिक मंचों द्वारा निरंतर चेतावनी दी गई है कि पृथ्वी पर प्रजातियों के समाप्त होने की दर अब प्राकृतिक दर से हजार गुना अधिक हो चुकी है, जिसका अर्थ है कि मानव गतिविधियों ने पारिस्थितिकी तंत्र के उस संतुलन को तोड़ दिया है जो करोड़ों वर्ष में विकसित हुआ था ।

जैव विविधता का अर्थ केवल जीवों की संख्या नहीं है बल्कि वनस्पतियों, पक्षियों, जीव-जंतुओं, सूक्ष्मजीवों, मिट्टी में उपस्थित अदृश्य जीवों, परागण करने वाले कीटों, समुद्री जीवों, पर्वतीय जीवों, नदी-सरिता तंत्र में पाए जाने वाले जीवों और इनके बीच की परस्पर क्रियाओं का विशाल जाल है जिसे पारिस्थितिकी जाल कहा जाता है।

यदि इस जाल की एक भी कड़ी टूटती है तो इसका प्रभाव संपूर्ण प्रकृति, कृषि, भोजन, जल, जलवायु, वर्षा, रोग-प्रतिरोधक क्षमता, मानव स्वास्थ्य तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसी संदर्भ में हाल के वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि तापमान में वृद्धि, ऋतु चक्र में गड़बड़ी और वर्षा के असामान्य पैटर्न की वजह से परागण करने वाले जीव—विशेषकर मधुमक्खियाँ, तितलियाँ, भौंरे, पक्षी और चमगादड़—तेजी से संकट में आ रहे हैं।

विश्व के खाद्यान्न उत्पादन का लगभग पचहत्तर प्रतिशत परागण पर निर्भर है और यदि परागण करने वालों की संख्या घटती है तो पौधों का प्रजनन चक्र टूट जाता है, फल-फूल कम होते हैं, बीजों का निर्माण कम होता है, जिससे मानव खाद्य सुरक्षा पर भारी खतरा उत्पन्न हो सकता है।

भारत के वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा किए गए अध्ययन बताते हैं कि बीते बीस वर्षों में देश की स्थानीय मधुमक्खी प्रजातियों में पचपन से साठ प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। तापमान में मात्र एक डिग्री की वृद्धि से मधुमक्खियों की सक्रियता में पंद्रह से पच्चीस प्रतिशत तक कमी पाई गई है, फूलों के खिलने के समय में बारह से बीस दिनों तक परिवर्तन देखा गया है, तथा परागण का समय और फूलों का समय मेल नहीं खाता ।

इसे वैज्ञानिक भाषा में “ऋतु असंगति” कहा जाता है। इससे सरसों, सूरजमुखी, सब्जियों, फलों और नकदी फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है और किसानों की आय कम होती है।

विश्व स्तर पर वन्य जीव जनसंख्या में पिछले पचास वर्षों में लगभग सत्तर प्रतिशत तक गिरावट दर्ज हुई है। मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी की भूमि का पचहत्तर प्रतिशत और समुद्री क्षेत्र का दो तिहाई हिस्सा अत्यधिक दबाव में आ चुका है। पर्वतीय क्षेत्रों में औसत तापमान बढ़ने से हिमालयी क्षेत्र में रहने वाली प्रजातियों के आवास तेजी से सिकुड़ रहे हैं।

वैज्ञानिक अनुमान बताते हैं कि इक्कीसवीं सदी के अंत तक हिमालय की लगभग चौथाई प्रजातियाँ अपने मूल आवास खो सकती हैं। समुद्री जल के तापमान में वृद्धि के कारण प्रवाल भित्तियों का तीव्र रंगहीन होना एक गंभीर संकेत है।

प्रवाल समुद्री जैव विविधता का पच्चीस प्रतिशत सहारा देते हैं, और इनके नष्ट होने से हजारों समुद्री प्रजातियों का जीवन संकट में पड़ सकता है। दुनिया की कई प्रसिद्ध प्रवाल भित्तियाँ लगातार रंगहीन हो रही हैं और 2024 तक वैश्विक स्तर पर लगभग एक तिहाई से अधिक प्रवाल दबाव में आ चुके हैं।

प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव भी जैव विविधता पर अत्यंत घातक है। प्रतिवर्ष करोड़ों टन प्लास्टिक समुद्रों में पहुँचता है, जिससे सात सौ से अधिक समुद्री प्रजातियाँ प्रभावित होती हैं। प्लास्टिक के सूक्ष्म कण हवा, पानी, वर्षा और भोजन तक में पाए जा रहे हैं और वैज्ञानिक अध्ययनों ने मानव रक्त, फेफड़ों तथा नवजात शिशुओं के गर्भनाल में भी इन सूक्ष्म कणों का पता लगाया है।

भूमि प्रदूषण और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की जैव विविधता गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुई है; लाभकारी जीवाणु, कृतक, केंचुए और फफूंद में चालीस से साठ प्रतिशत तक कमी पाई गई है, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी की उपज क्षमता कम होती है, पानी धारण करने की क्षमता घटती है और फसलें सूखे व बाढ़ जैसी स्थितियों में अधिक प्रभावित होती हैं।

आक्रामक वनस्पतियों और जीवों का फैलाव भी एक बड़ा कारण है। लैंटाना, कुटकी, जलकुंभी, पर्नाला जैसी विदेशी आक्रामक वनस्पतियों ने भारत के कई जलस्रोतों और वन क्षेत्रों में स्थानीय प्रजातियों को पीछे धकेल दिया है। भारत में एक सौ से अधिक आक्रामक पौधे लगभग चालीस प्रतिशत प्राकृतिक आवासों को प्रभावित कर रहे हैं।

इसके कारण स्थानीय वनस्पतियाँ नष्ट होती हैं, मृदा की गुणवत्ता गिरती है और जलस्रोतों की स्वच्छता पर असर पड़ता है। समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण सुंदरबन के मैंग्रोव वन प्रति वर्ष लगभग दो प्रतिशत की दर से सिकुड़ रहे हैं, जिससे दुर्लभ बंगाल बाघ सहित अनेक जीवों का प्राकृतिक आवास संकट में है।

भूजल दोहन के कारण तालाब, झीलें, नहरें, झरने और आर्द्रभूमियाँ सूख रही हैं, जिसके कारण मीठे पानी की मछलियों की लगभग अट्ठाईस प्रतिशत प्रजातियाँ संकटग्रस्त श्रेणी में पहुँच चुकी हैं। उभयचर जीवों—जैसे मेंढक और सलामेंडर—में तीस प्रतिशत तक गिरावट पाई गई है, जो पारिस्थितिकी तंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि वे कीट नियंत्रण, पोषक तत्व चक्रण और जल गुणवत्ता में सुधार लाते हैं।

नदियों में बढ़ते रासायनिक प्रदूषक—जैसे भारी धातुएँ, गाद, नाइट्रेट, फॉस्फेट और जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग—जलचरों को गंभीर खतरे में डालते हैं। भारत की प्रमुख नदियों में कई स्थानों पर मछलियों, कछुओं, डॉल्फ़िनों और जलपक्षियों की संख्या तेजी से घट रही है।

नदी तटों पर वृक्षों की कटाई से नदी का तापीय संतुलन बिगड़ता है, जल का ताप बढ़ता है, और इससे कई ताप-संवेदनशील जलचर प्रजातियाँ विलुप्ति के करीब पहुँच जाती हैं। आर्द्रभूमियों का विनाश जैव विविधता के लिए अत्यंत नुकसानदायक है क्योंकि ये क्षेत्र पक्षियों के प्रवास, मछलियों के प्रजनन और अनेक पौधों के जीवन चक्र के लिए अनिवार्य होते हैं।

भारत में 1950 के दशक में लगभग बीस लाख हेक्टेयर आर्द्रभूमि थी जो घटकर लगभग बारह लाख हेक्टेयर रह गई है। इससे लगभग पाँच सौ पक्षी प्रजातियाँ प्रभावित हुई हैं।

यदि वैश्विक तापमान वृद्धि एक दशमलव पाँच डिग्री से ऊपर जाती है तो पृथ्वी की चौदह प्रतिशत स्थलीय प्रजातियाँ अपने आवास खो सकती हैं, और यदि तापमान दो डिग्री तक पहुँचता है तो लगभग बीस प्रतिशत प्रजातियाँ विलुप्त होने की उच्च जोखिम श्रेणी में आ जाएँगी।

वैज्ञानिक समुदाय ने चेताया है कि आगामी दशक “प्राकृतिक तंत्रों के निर्णायक बिंदुओं का दशक” होगा, जहाँ यदि अमेज़न वर्षावन, आर्कटिक हिमखंड, पश्चिम अंटार्कटिक बर्फ चादर, मानसूनी प्रणाली, प्रवाल भित्तियाँ और हिमालयी हिमनद अपने संतुलन बिंदु से आगे निकल जाते हैं तो उन्हें पुनः सामान्य अवस्था में लाना लगभग असंभव हो जाएगा।

जैव विविधता का आर्थिक महत्व अत्यंत विशाल है। प्रकृति द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं—जैसे हवा की शुद्धि, जल शुद्धि, परागण, मिट्टी निर्माण, कार्बन अवशोषण, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा, भोजन उत्पादन—का वैश्विक मूल्य विश्व की कुल वार्षिक आर्थिक उत्पादकता के लगभग दोगुने के बराबर आँका गया है। यदि जैव विविधता नष्ट होती है तो मानव जीवन, कृषि, उद्योग और स्वास्थ्य प्रणाली सब पर गहरा आघात होगा।

इसीलिए विश्वभर में प्रकृति पुनर्जीवन का दशक, तीस-तीस लक्ष्य (जिसमें वर्ष 2030 तक पृथ्वी के तीस प्रतिशत भूभाग और तीस प्रतिशत समुद्री क्षेत्र को संरक्षण में लेने का संकल्प है), पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन कार्यक्रम, प्रजाति संरक्षण अभियान, स्वच्छता अभियान, प्लास्टिक उन्मूलन, प्रदूषण नियंत्रण, वन विस्तार, आर्द्रभूमि पुनर्जीवन, समुदाय आधारित संरक्षण, विद्यालय आधारित प्रकृति शिक्षा और प्रकृति-आधारित समाधान लागू किए जा रहे हैं।

भारत में भी जीवन शैली परिवर्तन अभियान, राष्ट्रीय जैव विविधता मिशन, जल संरक्षण कार्यक्रम, वन महोत्सव, जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ, आर्द्रभूमि संरक्षण नियम, भूजल पुनर्भरण कार्यक्रम, नदी पुनर्जीवन अभियान तथा राज्य स्तरीय जल-वन संरक्षण योजनाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

आगे बढ़ते हुए, वर्ष 2047 का भारत तभी सुरक्षित, समृद्ध, जलवायु-लचीला और प्रकृति-संतुलित बनेगा जब जल, जंगल और जमीन के पारिस्थितिक संतुलन को राष्ट्रीय प्राथमिकता दी जाए, बच्चों और युवाओं को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाया जाए, गाँव-शहर में स्थानीय स्तर पर पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा को जनभागीदारी से जोड़ा जाए ।

वैज्ञानिक निगरानी व्यवस्था—जैसे उपग्रह आँकड़ों, स्थल सर्वेक्षण, समुदाय आधारित अवलोकन—को मजबूत किया जाए, वनों और आर्द्रभूमियों के विस्तार को बढ़ावा दिया जाए, नदी तटों को सुरक्षित किया जाए, प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए और मानव विकास को प्रकृति के अनुकूल बनाया जाए; क्योंकि जैव विविधता जितनी सुरक्षित होगी, मानव जीवन उतना ही सुरक्षित, स्थायी और समृद्ध होगा—और यही आने वाले भारत का सच्चा पर्यावरणीय विज़न है।