अरावली मां के स्तन काटकर बेचने वाले अपराधी हैं
अरावली मां के स्तन काटकर बेचने वाले अपराधी हैं

अरावली मां के स्तन काटकर बेचने वाले अपराधी हैं

मां तो हमारा पोषण करती है, हमें जीवन विद्या देकर जीने योग्य बनाती है। लालची बनकर माई से कमाई करने वालों को छोड़कर, अरावली बचाने में सभी जुड़ें।

जलपुरुष राजेंद्र सिंह

“समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥“

यह श्लोक सिद्ध करता है कि, पर्वतमाला हमारी मां के स्तन हैं। यही हमें पालती-पोषित करती हैं, इसलिए इनको बचाना जरूरी है। अरावली में खनन हमारी मां के स्तन काटने जैसा अपराध है।

अरावली के अंगों को बड़ी-बड़ी मशीनों से खनन करके, काटकर बेचने वालों से डरे नहीं बल्कि उन्हें लड़कर रोकें। चोरों के पैर कमजोर होते हैं। ये मां के चोर, मां के टुकड़े-टुकड़े बनाकर बेच रहे हैं; इन्हें रोकें। अरावली मां के अंगों को काटकर बेचने वालों से बचें नहीं, उनको समझाएं और उन्हें रोकने के लिए उनसे टकराएं।

मां तो हमारा पोषण करती है, हमें जीवन विद्या देकर जीने योग्य बनाती है। लालची बनकर माई से कमाई करने वालों को छोड़कर, अरावली बचाने में सभी जुड़ें।

अरावली में खनन मां के स्तन काटने जैसा अपराध है। अरावली का सस्टेनेबल खनन हमारी बोली भाषा, माटी, बादलों, धरती का रंग भी बदल देगी। अरावली राजस्थान की तिरछा कवच बनकर, मरुस्थल की बोली भाषा को अपने में समाय रखती है। यहां के वर्षा जल को अपने अंदर सहेजकर मीठा जल में बदल देती है। इसने मरुस्थल की तप-तपस्या में अपने को कवच के रूप में बनाकर मरुस्थल, अधो मरुस्थल को सहारा दिया है।

इसी की रुकावट ने दूर बंगाल की खाड़ी से आने वाले अधो खाली बादलों को यह अरावली अपने ऊपर निचोड़ने के लिए मजबूर कर देती है। यही अपने पास के पड़ोसी अरब सागर के बादलों को तो संपूर्ण रूप से अपने ऊपर ही बरसाती है। यह ज्यादातर गुरु शिखर ‘माउंट आबू’ में खाली हो जाते हैं। जो शेष बचते हैं वे अजमेर, जयपुर, अलवर के ऊपर खाली होते हैं। इन क्षेत्रों में बंगाल की खाड़ी से आने वाले बादल अपने को बिल्कुल खाली करके हवाओं में निबट जाते हैं।

अरावली के मेघ अपनी आर्द्रता खनन से खो देते है। दक्षिण-पश्चिम से तिरछी अरावली सिरोही क्षेत्र में बादलों को अपने समांतर  चलाती है। इसलिए गुरु शिखर में शेष अरावली की वर्षा से तीन गुना अधिक वर्षा हो जाती है। दोनों दिशाओं से आने वाले बादलों की गति और दशा अरावली में बदलती ही रहती है।

वायुमंडल में अरावली की भूगोल कृतियां वर्षा चक्र में संतुलन बनाकर रखती हैं। इनके ऊपर की घास, जंगल तथा इनकी घाटियों की खेती की हरियाली वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड की जहरीली गैसों को सोखती रहती है।

यहां के आदिवासी बादलों और हवाओं के प्रवाह को जानकर वर्षा और ताप की पहचान कर लेते हैं। हवा, वर्षा इन्हें सूरज और चंदा मामा भी बताते हैं। अरावली के मूल आदिज्ञान की भाषा-बोली को यहां के आदिवासी पहचानते, जानते और अपनी बातचीत में बोलते हैं। माई से कमाई करने वाले इस सब से दूर हैं।

खनन तो अरावली वासियों की माटी, बोली, भाषा, बादलों के वेग, क्रम, जल मात्रा को नष्ट कर देगा। बदलेगा नहीं, सब कुछ नष्ट होगा। पहाड़ तो नष्ट होगा और यहां की जीवन विद्या भी आरोग्य, रक्षण, आहार, विहार, आचार-विचार सभी कुछ नष्ट होगा। खनन प्रकृति-संस्कृति को नष्ट करके मानवता को भी नष्ट कर देता है।

1991 में 35 वर्ष पूर्व जब अरावली में सरिस्का के जंगल, फिर अलवर, गुड़गांव, फरीदाबाद, नूह, मेवात में खनन बंद होने के बाद संपूर्ण अरावली में खनन बंद हुआ तो अरावली पुनः हरी-भरी बनने लगी थी। हरित अरावली परियोजना भी सरकार ने शुरू करी थी। तब अरावली के लोगों में आशा की किरण जगी थी।

पिछले 10-15 वर्षों में बड़ी तेजी से फिर खनन ने जोर पकड़ा है। वैध-अवैध दोनों तरह का खनन हुआ तो फिर अरावली के आंसू पोंछने वाले सो गए। अरावली माई रोती रही, सरकार हंसती रही। माई से कमाई करने वाले सरकारों को भी हिस्सा पहुंचा रहे थे। ऐसे में अरावली की सुनने वालों के कानों में आवाज पहुंचने का रास्ता भी रुक गया था और बड़ी हानि हुई।

अरावली माई की पर्वत श्रृंखला तो हमारी मां के स्तन हैं।