जलवायु परिवर्तन से गहरा गया है हिमालय का भूस्खलन
जलवायु परिवर्तन से गहरा गया है हिमालय का भूस्खलन

जलवायु परिवर्तन  से  गहरा गया है हिमालय का भूस्खलन

उत्तराखंड के पहाड़ों के रौद्र रूप ने वहाँ जीवन थाम दिया है

पंकज चतुर्वेदी

अभी तो बरसात शुरू हुई है और उत्तराखंड के पहाड़ों के रौद्र रूप ने वहाँ जीवन थाम दिया है । चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, नैनीताल, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग जिले में बरसात के साथ पहाड़ लुढ़क रहे हैं । चार धाम यात्रा का मार्ग  बार बार पत्थर-पहाड़ गिरने से बाधित हो रहा है । जोशीमठ  जैसे कस्बों पर धँसने का संकट नए सिरे से खड़ा हो गया है ।  सरकार की चिंता है कि भू वैज्ञानिकों ने जिन इलाकों में नए भू स्खलन संभावित क्षेत्र अंकित किए हैं, वहाँ  सड़क, बिजली, रेल जैसी परियोजनाओं पर काम चल रहा हैं । चारधाम यात्रा रूट पर भूस्खलन जोन सिरदर्द बनते जा रहे हैं। 

वहीं ऋषिकेश से बदरीनाथ यात्रा रूट पर कुल 54 लैंडस्लाइड जोन हैं।  जिसमें से ऋषिकेश से श्रीनगर के बीच 17 लैंडस्लाइड जोन चिन्हित किए गए हैं।  रुद्रप्रयाग से जोशीमठ के बीच 32 लैंडस्लाइड जोन चिन्हित किया गया है। जोशीमठ से बदरीनाथ के बीच पाँच , गौरीकुंड से केदारनाथ मार्ग पर चार से पाँच जगहों को संभावित भूस्खलन जोन बताया गया है । यहाँ पहले भी कई बार भूस्खलन की घटना हो चुकी हैं। ऊखीमठ क्षेत्र में दो और सोनप्रयाग से गौरीकुंड के बीच करीब तीन भूस्खलन संभावित क्षेत्र हैं। बेहतर सड़क और सुविधाओं के कारण यहाँ  भीड़ आ रही है और स्वयं में यह और बढ़ेगी ।

एक तरफ प्रधानमंत्री का “10 सूत्रीय डिजास्टर  रिस्क रिडक्शन” अर्थात आपदा में न्यूनतम जोखिम कार्यक्रम है तो दूसरी तरफ दुनिया के सबसे युवा और बढ़ते पहाड़ हिमालय की गोद में बसे प्रदेशों में मूलभूत संरचना का निर्माण । उत्तराखंड राज्य की आबादी मात्र सवा करोड़ है लेकिन यहाँ तीर्थ और पर्यटन के लिए आने वालों की संख्या सालाना दस गुना है। फिर यह चीन जैसे धूर्त शत्रु देश से लगी सीमा का प्रांत है । ऐसे में बेहतर सड़क और यातायात तंत्र अनिवार्य है लेकिन जब ऐसे विकास के कारण प्रकृति पर ही संकट खड़ा हो जाए तो ऐसे विकास के प्रतिमान पर पुनर्विचार तो करना ही होगा ।

इस बात को सरकार और समाज दोनों को गंभीरता से लेना होगा कि जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक और तीखा असर उत्तराखंड के हिमालय पर्वत पर है और इसी के चलते  यह राज्य विकट चुनौतियों का सामना कर रहा है  । संवेदनशील  पारिस्थितिकी तंत्र, अप्रत्याशित मौसम और बादल फटना , भूस्खलन, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर  लैक आउटबर्स्ट (जीएलओएफ) की बढ़ती घटनाएं  इस राज्य को अत्यधिक असुरक्षित बना रही है। बाढ़, भूस्खलन, अतिवृष्टि व वनाग्नि जैसी प्राकृतिक आपदाओं से राज्य को हर साल जन-धन की काफी हानि हो रही है । हर साल राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा आपदाओं से नष्ट हुई संरचनाओं को दुरुस्त करने में ही व्यर्थ जाता है । 

राज्य में जुलाई, अगस्त और सितंबर में मानसून के कारण हुए नुकसान को लेकर एसडीसी फाउंडेशन ने उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव (उदय) रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि राज्य में हर साल नए भूस्खलन जोन यानी लैंडस्लाइड जोन विकसित हो रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के डाटा के अनुसार 1988 से 2023 के बीच उत्तराखंड में भूस्खलन की 12,319 घटनाएं हुईं। सन 2018 में प्रदेश में भूस्खलन की 216 घटनाएं हुई थीं जबकि 2023 में यह संख्या पांच गुना बढ़कर 1100 पहुंच गई। 2022 की तुलना में भी 2023 में करीब साढ़े चार गुना की वृद्धि भूस्खलन की घटनाओं में देखी गई है। पिछले साल  अगस्त -24 तक बरसात के दौरान भूस्खलन की 2946 घटनाएं  दर्ज की गई  जिसमें 82 लोग मारे गए  थे ।

इस मानसून सीजन में 500 नए भूस्खलन जोन चिन्हित किए गए। उत्तराखंड सरकार के  आपदा प्रबंधन विभाग और  विश्व  बैंक ने सन 2018 में एक अध्ययन करवाया था जिसके अनुसार  छोटे से उत्तराखंड  में 6300 से अधिक स्थान  भूस्खलन ज़ोन के रूप में चिन्हित किये गये। रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हज़ारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ों को काट कर या जंगल उजाड़ कर ही बन रही हैं और इसी से भूस्खलन ज़ोन की संख्या में इजाफा हो रहा है।

समझना होगा कि भूस्खलन का प्रभाव क्षेत्र बढ़ने का असल  कारण इंडियन प्लेट्स लगातार गतिमान होना है ।  इस  हलचल से चट्टानों में मौजूद दरार भी सक्रिय हो जाती है और यही भूस्खलन के रूप में नीचे खिसकते हैं । बरसात के दिनों में मिट्टी की पकड़ ढीली होने पर यह भूवैज्ञानिक  गतिविधि और  तेज हो जाती है ।  सनद रहे पहाड़ों पर हरियाली कम होने स् मिट्टी की पकड़ भी कमजोर हो रही हैं , ऊपर से  मौसमी बदलाव के चलते अचानक ही बहुत अधिक बरसात होना और फिर तत्काल बाद तेज धूप  आ जाने  से भूस्खलन  की प्रक्रिया को  बल मिलता है ।

यह बात स्वीकार करना होगा कि पहाड़ के भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण किये बगैर बन रही परियोजनाओं के लिए हो रहे धमाकों व तोड़ फोड़ से शांत – धीर गंभीर रहने वाले जीवित हिम- पर्वत नाखुश  हैं। जान कर आश्चर्य होगा कि जिस  परियोजना के लिए सिल्कियारा सुरंग बनाई जा रही है , उसके पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की अनिवार्यता से बचने के लिए उसे छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ कर दिखाया गया .

सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं। यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है। जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है। ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है।

जब पहाड़ पर तोड़फोड या धमाके होते हैं, जब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाउ होती है तो दिल्ली  तक भूकंप के खतरे तो बढ़ते ही हैं , यमुना में कम पानी का संकट भी खड़ा होता है। पहले उत्तराखंड में भूस्खलन की तीन चौथाई  घटनाएँ  बरसात के कारण होती थीं लेकिन अब बरसात के बाद भी यह आपदा नहीं रुक रही । पिछले साल  जाड़े में और इस साल गर्मी में  भी  कईं बड़े भूस्खलन हुए । ऐसे में देवभूमि, विकास में पर्यावरण संरक्षण, नैसर्गिक विकास और आस्था में सुख को त्याज्य करने की भावना विकसित करने के लिए आमंत्रित भी कर रही है और चेता भी रही हैं।