बिहार के वे जिले जो बाढ़ के लिए कुख्यात हैं
पंकज चतुर्वेदी
इस साल तो आषाढ़ से बादल बरसने शुरू हुए तो आश्विन माह में भी चैन नहीं ले रहे । बिहार के वे जिले जो बाढ़ के लिए कुख्यात हैं और बीते कुछ हफ्तों से उफनती नदियों से बेहाल थे, आज सूखी नदियों को देख कर आने वाले आठ महीने के भयावह प्यासे दिनों की कल्पना से सिहर जा रहे हैं । इस आशंका से देश की राजधानी दिल्ली सहित बहुत से नदी किनारे बसे शहर आशंकित हैं ।
कुछ तो जलवायु परिवर्तन की मार है और उससे अधिक मानव-जन्य कारक, नदियों में जहां पानी होना चाहिए, वहां गाद भर गई और फिर समाज के लिए नदी पानी सहेजने के स्थान से अधिक बालू निकालने की खान हो गई । इसके कारण उथली हो गई नदी प्रकृति की अनुपम देन वर्षा को अपने में समेट ही नहीं पाई ।
तपती धरती के लिए बारिश अकेले पानी की बूंदों से महज ठंडक ही नहीं ले कर आती हैं, यह समृद्धि, संपन्नता की दस्तक भी होती है। लेकिन यह भी हमारे लिए चेतावनी है कि यदि बरसात वास्तव में औसत से छह फीसदी ज्यादा हो जाती है तो हमारी नदिया में इतनी जगह नहीं है कि वह उफान को सहेज पाए, नतीजतन बाढ और तबाही के मंजर दिखते हैं ।
बिहार में यह पिछले साल भी हुआ था लेकिन इस बार इसकी गति बहुत तेज है – यहाँ नदियों में पानी ठहर नहीं रहा, उनका जलस्तर तेजी से नीचे चला जा रहा है। नदियाँ लबालब तो होती है लेकिन दो से तीन दिन में पानी गायब हो जाता है। यह सभी जानते हैं कि नेपाल में होने वाली बरसात से बिहार में नदियों में पानी की आवक प्रभावित होती हैं ।
कुछ दिनों पहले ही गंगा , कोसी, गंडक आदि आधा दर्जन नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही थीं , लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से सारी नदियों का पानी दो-तीन दिनों में ही अचानक नीचे चला जाता है। फल्गू नदी में जल आगम के इस साल कई दशकों के रिकॉर्ड टूट गए, बड़ी तबाही हुई और कई तटबंध टूट गए, लेकिन तीन दिनों में ही नदी से पानी गायब हो गया।
यह बिहार और झारखण्ड के लिए जीवन-मरण का सवाल है कि जो पानी साल भर यहाँ के जीवन का आधार है वह शरद ऋतु में ही लुप्त हो गया । असल में हो यह रहा है कि बिहार की उफनती नदियों के पानी की बड़ी मात्रा गंगा के रास्ते बंगाल की खाड़ी में जा कर बेकार हो रहा है । यही हाल उत्तर व दक्षिण बिहार की सभी नदियों का है जिनका मिलन गंगा नदी में होता है यह राज्य के जल संसाधन विभाग का आंकडा है कि हर दिन पांच से दस लाख क्यूसेक पानी गंगा होते हुए बंगाल की खाड़ी में जा रहा है ।
इसके चलते एकबारगी तो गंगा का जल स्तर बढ़ता है लेकिन कुछ हे समय में यह नीचे आ जाता है । अकेले बिहार ही नहीं देश एक बहुत से हिस्सों में हर साल दर्जनों नदियों को गाद लील जाती है । गाद के चलते पहले नदी की धारा मंथर होती हैं फिर सूखे बहाव क्षेत्र को कचरा घर बना दिया जाता है और फिर कोई खेती करता है तो कोई बस्ती बसा लेता है ।
नदी का पानी कैसे लुप्त होता है उसके बानगी है समस्तीपुर में कोई 60 किलोमीटर बहने वाली जमुआरी नदी, साठ साल पहले इसकी चौड़ाई डेढ़ सौ मीटर थी । गाद के चलते पहले इसकी धारा मद्धम हुई, इसके उदगम स्थल पर स्लूइस गेट लगा दिया गया और वह भी गाद से जाम हो गया । इस तरह अब नदी में पानी हफ्ते भर नहीं दीखता क्योंकि उसकी गहराई ही नहीं हैं । एक दुविधा नदियों के साथ हैं कि असम , बिहार, झारखण्ड और बंगाल में बाढ़ से बचने के लिए जहां-तहां ढेर सारे तटबंध बनाये गए ।
नदियों के साथ बह कर आता गाद इन्हीं तटबंधों पर सालों से जमता गया और नदियों की जल ग्रहण क्षमता कम होती गई । समझना होगा कि पहले नदियों के साथ आने वाली गाद नदी के कछार क्षेत्र में फ़ैल जाती थी और वह खेतों के लिए उर्वरा का काम करती थी , जबकि तटबंध नदी के नैसर्गिक प्रवाह को बाधित कर रहे हैं और इससे नदी की गहराई में कीचड जमा हो गया । इसी के चलते बरसात से आया पानी इसमें टिकता नहीं ।
विदित हो बिहार राज्य में पानी के लिए सर्वाधिक खून बहता है और जो पानी बाढ़ के कारण राज्य की अर्थ व्यवस्था को पीछे धकेल देता है ,वही पानी नदियों में समा नहीं पा रहा है । बिहार में तो उथली हो रही नदी में गंगा सहित 29 नदियों का दर्द है । जो नदियाँ तेज बहाव से आ ही हैं , उनके साथ आये मलवे से भूमि कटाव भी हो रहा है, कई एक जगह नदी के बीच टापू बन गए हैं ।
अकेले फरक्का से होकर गंगा नदी पर हर साल 73.6 करोड़ टन गाद आती है जिसमें से 32.8 करोड़ टन गाद इस बराज के प्रतिप्रवाह में ठहर जाती है। झारखंड के साहिबगंज में गंगा, अपने पारंपरिक घाट से पांच किमी दूर चली गई है । 19वीं सदी में बिहार में (जिसमें आज का झारखण्ड भी है ) 6000 से अधिक नदियां बहती थीं, जो आज सिमट कर 600 रह गई है ।
बिहार का शोक कहलाने वाली कई नदियाँ जैसे गंडक, कोसी, बागमति, कमला, बलान, आदि नेपाल के उंचाई वाले क्षेत्रों से तेजी से लुढक कर राज्य के समतल पर लपकती हैं और इन सभी नदियों के दोनों किनारों पर बाढ़ से बचने के लिए हज़ारों किलोमीटर के पक्के तटबंध हैं । जाहिर है कि पहाड़ झड़ने से उपजा गाद किनारे जगह पाता और नदियों की तलहटी में बैठ कर उनकी धीमी मौत की इबादत लिखती हैं ।
झारखंड के साहिबगंज में फरक्का बराज गंगा में गाद का बड़ा कारक है और इसे नदी प्रवाह कई ठप्प है । साहिबगंज के रामपुर के पास कोसी का गंगा से मिलन होता है । कोसी वैसे ही अपने साथ ढेर मलवा लाती है और उसके आगे ही फरक्का बराज आ जाता है. तभी यहाँ गंगा गाद से सुस्त हो जाती है।
विदित हो सन 2016 में केंद्र सरकार द्वारा गठित चितले कमेटी ने साफ कहा था कि नदी में बढती गाद का एकमात्र निराकरण यही है कि नदी के पानी को फैलने का पर्याप्त स्थान मिले । गाद को बहने का रास्ता मिलना चाहिए । तटबंध और नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण न हो और अत्यधिक गाद वाली नदियों के संगम क्षेत्र से नियमित गाद निकालने का काम हो । जाहिर है कि ये सिफारिशे किसी ठंडे बस्ते में बंद हो गई.
बिहार की नदियाँ पूरे देश के लिए चेतावनी है कि यदि नदियों से गाद की सफाई करने, बहाव के साथ आने वाले गाद को सही मार्ग देने और नदियों की गहराई बरकरार रखने के लिए व्यापक योजना नहीं बनाई गई तो सभी बड़ी-छोटी नदियाँ बरसाती या मौसमी रह जाएँगी ।
दूर भारत की बात क्या की जाए, दिल्ली राजधानी में यमुना नदी टनों मलवा उड़ेल देने के कारण उथली हो गई है । एनजीटी ने दिल्ली मेट्रो सहित कई महकमों को चेताया भी इसके बावजूद निर्माण से निकली मिट्टी व मलवे को यमुना नदी में खपाना आम बात हो गई है।
नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े व बहुत सा खनिज बहा कर लाती हैं । पहाड़ी व नदियों के मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई, खनन, पहाड़ों को काटने, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थोड़ी सी बारिश में ही बहुत सा मलवा बह कर नदियों में गिर जाता है । परिणामस्वरूप नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा सा पानी आने पर ही वे बाढ़ का रूप ले लेती हैं।
दुर्भाग्य है कि विभिन्न कारणो से नदियों के उथला होने, उनकी जल-ग्रहण क्षमता कम होने और प्रदूशण बढ़ने से सामान्य बरसात का पानी भी उसमें समा नहीं रहा है और जो पानी जीवनदायी है, वह आम लोगों के लिए त्रासदी बन रहा है । यही नहीं एक महीने बाद ही ये लेग फिर पानी को तरसेंगें।