हिमालय बचाइए तो देश बचेगा
हिमालय बचाइए तो देश बचेगा

हिमालय बचाइए तो देश बचेगा

प्रकृति ही नहीं जलवायु परिवर्तन के जिम्मेदार हम मनुष्य भी हैं।

शिवचरण चौहान

इस साल पहाड़ों पर बहुत अधिक बरसात हुई है। बहुत अधिक भूस्खलन हुआ है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने से बहुत तबाही हुई है जनधन की हानि हुई है। जलवायु परिवर्तन के कारण इस वर्ष बहुत अधिक दुष्प्रभाव पर्यावरण पर देखने को मिल रहे हैं। कई बार लगता है की प्रकृति ही नहीं इसके जिम्मेदार हम मनुष्य भी हैं। जो पहाड़ों का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं शोषण कर रहे हैं। हिमालय कच्चा पहाड़ है और इसके क्षतिग्रस्त होने की बहुत अधिक संभावना है।

हिमालय, सतपुड़ा, अरावली और विंध्याचल अगर हमें अपना पर्यावरण बचाना है तो हमें हिमालय बचाना होगा। सभी पहाड़ बचाने होंगे तभी हमारा पर्यावरण बचेगा। पर्यावरण रहेगा तो हम भी जिंदा रहेंगे। वरना मनुष्य का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। हिमालय में पेड़ पौधे और दुर्लभ जड़ी बूटियों का खजाना है। जलवायु परिवर्तन में हिमालय की महत्वपूर्ण भूमिका है।

पर्यावरण की अत्यधिक भूमिका है। आज जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतराज हिमालय पर गहरा संकट खड़ा हो गया है। पर्यावरण पर बहुत बड़ा संकट आ गया है। वन माफियाओं ने  अंधाधुंध पेड़ काटे हैं। पहाड़ काटकर बस्तियां बसाई हैं। नदियों में बांध बनाए हैं। इस कारण हिमालय भरभरा कर गिर रहा है और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के कारण ग्लेशियर गल रहे हैं।

सरकार और पहाड़ों के निवासियों को हिमालय बचाओ अभियान चलाना पड़ेगा। वरना बहुत गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे। राजस्थान में कई पहाड़ियां काटकर गायब कर दी गई है। पहाड़ काटकर कंक्रीट के घर बना दिए गए हैं सड़के बना ली गई हैं।

टेनिकल एंड जुलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में पेड़ सबसे ज्यादा अब भी हिमालय में पाए जाते हैं जो हमारे पर्यावरण को नियंत्रित रखते हैं। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को रोकते हैं।

‘नेशनल ब्यूरो ऑफ जैनेटिक रिसोर्सेज’ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में अब तक खोजी गयी 20 हजार मत्स्य प्रजातियों में से 2200 भारत में पायी जाती हैं। इसी प्रकार फूलों की 15 हजार प्रजातियां भी भारत में पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों ने भारत को 10 जैव भौगोलिक क्षेत्रों और 26 जैविक प्रान्तों में बांटा है। जैविक संपदा की दृष्टि से कश्मीर से अरुणाचल तक ढाई हजार किलोमीटर लम्बा और 250 से 300 किलोमीटर चौड़ाई में फैला हिमालय  देश के अन्य हिस्सों की अपेक्षा कहीं ज्यादा प्राक़तिक संपदा की दृष्टि से सम्पन्न है।

जनसंख्या वृद्धि में हम चीन से आगे हो गए हैं। दुनिया में सबसे आगे हो गए हैं।  जनसंख्या वृद्धि तथा निरन्तर खनन, प्रकतिक संपदा दोहन के कारण वनों पर बढ़ रहे दबाव से वनों का क्षेत्रफल और वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास तेजी से सिकुड़ रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि जीव- जन्तुओं की एक हजार और पेड़-पौधों की 20 हजार प्रजातियां संकटग्रस्त घोषित कर दी गयी हैं। अनेक तो विलुप्त हो गई हैं।

केवल वन और वन्यजीव ही इस संकट की चपेट में नहीं हैं बल्कि कई जलचर भी इस खतरे से जूझ रहे हैं। नेशनल ब्यूरो आफ जेनेटिक रिसोर्सेज की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल 39 मत्स्य प्रजातियां संकटग्रस्त और विलुप्त प्रायः की श्रेणी में सूची बंद्ध की गयी हैं। मछलियों की  चार प्रजातियां विलुप्त घोषित कर दी गयी हैं। बोटिनिकल एंड जुलाजिकल सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि पशुओं की 175 , पक्षियों की डेढ़ सौ, रेंगने वाले जीवों की 25 प्रजातियां अब विलुप्त हो चुकी हैं ।

फूलों की 1500 प्रजातियां संकटग्रस्त घोषित की जा चुकी हैं। इन रिपोर्टों से यह स्पष्ट है कि प्रकृति की यह अनमोल धरोहरें एक के बाद एक विलुप्त होने की ओर बढ़ रही है। इस खतरे से कैसे निपटा जाए और जैविक सम्पदा को हो रहे नुकसान की नेशनल ब्यूरो आफ जेनेटिक भरपाई कैसे करें? यह सवाल नीति नियामकों और पर्यावरण प्रेमियों को सोचना होगा?

देश के कुल क्षेत्रफल 4.3 , देश में कुल 27 मत्स्य प्रतिशत अर्थात् 1 लाख 40 हजार 675 वर्ग किमी. क्षेत्र को जैव विविधता की प्रजातियां संकटग्रस्त हैं और इन्हें संरक्षण के लिए संरक्षित किया गया है। विलुप्त प्राय की श्रेणी में सूची जैविक सम्मंदा की दृष्टि से देश के अन्य भागों की तुलना में हिमालय के अधिक  सूची बद्ध की गयी हैं।

संरक्षित क्षेत्र की प्रजातियां विलुप्त घोषित होने वाली प्रजातियां हिमालय में सर्वाधिक हैं। देश के हिमालयी क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 4 लाख 23 हजार 021 वर्ग किमी है। हिमालय के 27,120 वर्ग किमी क्षेत्र को इस मकसद से संरक्षित किया गया है। इसमें 17 से अधिक नेशनल पार्क, 62 वन्यजीव अभयारण्य बनाये गये हैं जो हिमालय के कुल क्षेत्रफल का 6.4 प्रतिशत हैं।

हिमालय क्षेत्र में 33 नेशनल पार्क और 88 वन्यजीव अभयारण्य प्रस्तावित हैं। इनके अस्तित्व में आ जाने के बाद संरक्षित क्षेत्रों का क्षेत्रफल बढ़ कर 59 हजार 552 वर्ग किमी हो जायेगा जो उत्तराखंड राज्य के क्षेत्रफल से कुछ ज्यादा और भारतीय हिमालय का 11.6 प्रतिशत होगा। हिमालय के अन्य भागों की तुलना में उत्तराखंड में ऐसे संरक्षित क्षेत्रों का क्षेत्रफल अत्यधिक है।

राज्य के कुल क्षेत्रफल 53,485 वर्ग किमी, के करीब 21 प्रतिशत से अधिक (11709 वर्ग किमी) भूभाग में 6 नेशनल पार्क और 6 वन्यजीव अभयारण्य हैं। जिम कार्बेट नेशनल पार्क उत्तराखंड का सबसे पहला पार्क है जो 1936 में अस्तित्व में आया। संयुक्त प्रांत के तत्कालीन गवर्नर मैल्कम हैली के नाम पर इसे हैली पार्क नाम दिया गया।

पार्को में यूनेस्को के बायोस्फेयर रिजर्व कार्यक्रम के तहत विश्व धरोहर के रूप में संरक्षित नंदादेवी बायोस्फेयर रिजर्व भी शामिल है। नंदा देवी बायोस्फेयर के अलावा एक और रिजर्व उत्तराखंड बायोस्फेयर रिजर्व के नाम से यहां प्रस्तावित था। उत्तराखंड जैविक संपदा को बचाने की विश्व व्यापी मुहिम में देश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में अग्रिम पंक्ति में हैं। हालांकि वनों पर बढ़ते दबाव, वन्यजीवों का अंधाधुन्ध शिकार, नदियों में बढ़ते प्रदूषण से जीवों के लिए उत्पन्न संकट के कारण या परिस्थितिकी का ह्रास यहां की गंभीर सबसे गंभीर समस्या है।

इसके बावजूद उत्तराखंड में जैविक सम्पदा अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक प्राकृतिक स्वरूप में बची हुई है। इसलिए प्रकृति के संरक्षण की इस विश्व व्यापी मुहिम में उत्तराखंड का स्थान आने वाले लंबे समय तक सर्वोपरि बना रहेगा, लेकिन संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के लोगों ,समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया में शामिल किये बिना यह असंभव कार्य है। अतः एकाकी संरक्षण के स्थान पर समग्र संरक्षण की ओर दृष्टि जानी चाहिए।

हिमालय में आए दिन ग्लेशियर खिसकते और पिघलते रहते हैं । नंदा देवी में फिलहाल ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। कभी बादल फटना कभी अधिक बरसात हो ना कभी अधिक गर्मी के कारण ग्लेशियर का खिसकना यह सब बातें पर्यावरण के लिए गंभीर संकट हैं। हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर तिब्बत अरुणाचल प्रदेश सभी जगह पर्यावरण के लिए गंभीर संकट खड़े हो गए हैं। समुद्र में सुनामी आना, वनों और बागों में समय पर फल ना आना ।  ऋतु चक्र  में परिवर्तन होना यह सब साधारण बातें नहीं है और जलवायु परिवर्तन के लिए गंभीर संकेत दे रही हैं ।

अगर अब हम नहीं सुधरे तो जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया की आबादी को गंभीर संकट पैदा हो जाएगा। कोरोना जैसी बीमारियां महामारिया आए दिन आती रहेंगी। समुद्री तूफान, हिम तूफान आंधियां आने लगेंगे जो पिछले करीब 10 साल से ज्यादा आ रहे हैं और मानव जीवन पर भयंकर संकट आ जाएगा। महानगरों की हवा भी विषैली हो गई है पानी दूषित हो गया है और सड़कें चलने लायक नहीं रही  हैं ।

गांव गांव तक ऑक्सीजन की कमी महसूस की जा रही है। हजारों लोग ऑक्सीजन की कमी के चलते सांस नहीं ले पाते  हैं और असमय काल के गाल में समा जाते हैं। जितना विकास हुआ है विनाश के रास्ते उतने अधिक खुलते जा रहे हैं। विकास के अलावा हमें जलवायु, पर्यावरण, ऋतु चक्र के परिवर्तन पर भी विशेष ध्यान देना होगा वरना एक दिन दुनिया से जीवो का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और हम मंगल आदि ग्रहों में मानव का अस्तित्व खोजते रह जाएंगे।

लेखक बाल साहित्यकार ,स्वतंत्र विचारक, पर्यावरणविद और वरिष्ठ पत्रकार हैं ।