वैज्ञानिक कारण, भूगर्भीय सच्चाई और आँकड़ों पर आधारित विश्लेषण
अजय सहाय
भूस्खलन (Landslides) एक ऐसी भू-आकृतिक प्रक्रिया है जिसमें पर्वतीय ढलानों से मिट्टी, चट्टानें, गाद, पेड़-पौधे और अन्य अवसाद अचानक खिसककर नीचे घाटियों या नालों की ओर गिरते हैं और भारी तबाही मचाते हैं, तथा यह घटना पर्वतीय पारिस्थितिकी की नाजुकता को सबसे प्रत्यक्ष रूप में दर्शाती है ।
वैज्ञानिक दृष्टि से भूस्खलन तब होता है जब किसी ढलान पर गुरुत्वाकर्षण बल (gravitational force) मिट्टी और चट्टानों को थामे रखने वाले प्रतिरोधी बल (shear strength, cohesion, frictional resistance) से अधिक हो जाता है, इस संतुलन के बिगड़ने के पीछे कई कारण होते हैं ।
भूगर्भीय संरचना (geological structure), अत्यधिक वर्षा, भूकंप, वनों की कटाई, सड़क-खुदाई, खनन और जलवायु परिवर्तन; भारत के संदर्भ में देखें तो यह एक बहुत गंभीर समस्या है क्योंकि देश का लगभग 15% क्षेत्र (लगभग 0.42 मिलियन वर्ग किमी) भूस्खलन प्रवण (landslide-prone) क्षेत्र में आता है, जिसमें हिमालय, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट और नीलगिरि पर्वतमाला शामिल हैं; राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि 1998 से 2022 तक भारत में भूस्खलन की वजह से औसतन हर साल 400 से अधिक लोगों की मौत हुई और लगभग 30,000 हेक्टेयर कृषि भूमि प्रभावित हुई ।
केवल 2010–2020 के बीच उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में 6500 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए; भूगर्भीय दृष्टि से हिमालय दुनिया का सबसे युवा पर्वत है जो अभी भी भूकंपीय और भू-गर्भीय रूप से सक्रिय है, इसकी औसत ऊँचाई 6000 मीटर से अधिक और ढलानों का कोण 35°–45° है, इस कारण इसकी चट्टानें अभी पूर्ण रूप से स्थिर नहीं हुई हैं और मौसमजनित अपक्षय (weathering) इन्हें और कमजोर करता है ।
जब ऊपर से अत्यधिक वर्षा होती है तो मिट्टी और चट्टानों की shear strength घट जाती है और slope failure हो जाता है; उदाहरण के तौर पर 2023 में हिमाचल प्रदेश में मानसून के दौरान 113 से अधिक भूस्खलन घटनाएँ हुईं जिनमें 250 से अधिक लोगों की मौत हुई और राज्य को 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ ।
इसी प्रकार, 2013 की केदारनाथ आपदा के दौरान बादल फटने और चरम वर्षा ने चट्टानों और मलबे को नीचे की ओर धकेल दिया जिससे हजारों लोग मारे गए; वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जब वर्षा 100 मिमी से अधिक 24 घंटे में होती है तो slope failure की संभावना दोगुनी हो जाती है और जब cumulative rainfall 300 मिमी से अधिक 72 घंटे में होती है तो भूस्खलन लगभग निश्चित हो जाता है; ISRO और NRSC के उपग्रह डाटा के अनुसार केवल उत्तराखंड में ही 2020–2025 के बीच 12,000 से अधिक भूस्खलन हॉटस्पॉट चिन्हित किए गए हैं ।
भूगर्भीय कारणों में एक और तथ्य है—हिमालयी क्षेत्र की चट्टानें मुख्यतः शेल (shale), सैंडस्टोन और स्लेट जैसी कमजोर परतों से बनी हैं जिनकी जल-अवशोषण क्षमता अधिक है, ये परतें पानी सोखकर फुल जाती हैं और cohesion कम हो जाता है, जिससे slope sliding शुरू हो जाती है; साथ ही, tectonic activity यानी भूकंप भी slope failure का बड़ा कारण है—2005 का कश्मीर भूकंप और 2015 का नेपाल भूकंप बड़े पैमाने पर भूस्खलनों को ट्रिगर कर चुके हैं ।
वनों की कटाई भी पर्वतीय पारिस्थितिकी को नाजुक बना रही है क्योंकि पेड़ों की जड़ें slope stabilization का काम करती हैं—IIT रुड़की के अध्ययन (2021) के अनुसार जिन ढलानों पर 50% से अधिक वनस्पति आवरण है वहाँ भूस्खलन की संभावना 40% कम होती है जबकि बंजर ढलानों पर यह तीन गुना बढ़ जाती है ।
जलवायु परिवर्तन ने इसमें नई चुनौती जोड़ी है क्योंकि अब मानसून की जगह छोटे-छोटे intense rainfall events बढ़ रहे हैं—IMD के डेटा से स्पष्ट है कि 1950 की तुलना में 2020 तक हिमालयी राज्यों में heavy rainfall events में 15–20% की वृद्धि हुई है; उदाहरण के लिए 2022 में उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में 48 घंटों में 230 मिमी वर्षा हुई जिससे 30 से अधिक बड़े भूस्खलन हुए ।
पश्चिमी घाट भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं—2018 में केरल बाढ़ के दौरान इडुक्की और वायनाड जिलों में 400 से अधिक भूस्खलन हुए ,आर्थिक दृष्टि से देखें तो भारत में प्रतिवर्ष भूस्खलन से औसतन 3,000–4,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है और हर साल लगभग 10 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं ।
वैज्ञानिक समाधान में सबसे पहले slope stabilization जरूरी है—retaining wall, rock bolting, bio-engineering (जैसे घास और पेड़-पौधों का रोपण), drainage control और check dam बनाना आवश्यक है; इसके अलावा, ISRO और Geological Survey of India (GSI) ने landslide early warning system विकसित किया है जो rainfall threshold data और satellite imagery के आधार पर high risk क्षेत्रों में अलर्ट भेजता है; 2022 में गुवाहाटी और शिलांग के बीच landslide early warning system लागू किया गया जिससे कई हादसों को टाला गया ।
पर्वतीय पारिस्थितिकी की नाजुकता का कारण केवल भौगोलिक नहीं बल्कि मानवीय हस्तक्षेप भी है—सड़क चौड़ीकरण, सुरंग निर्माण, अनियंत्रित पर्यटन, अवैज्ञानिक निर्माण, mining और hydropower projects slope instability को बढ़ाते हैं; रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2010–2020 के बीच उत्तराखंड में बने 40% hydropower projects ने आसपास के क्षेत्रों में landslide घटनाओं की आवृत्ति को दोगुना कर दिया ।
इस प्रकार भूस्खलन पर्वतीय पारिस्थितिकी की नाजुकता का सबसे स्पष्ट प्रतीक है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह समझना जरूरी है कि हिमालय जैसे युवा पर्वत को उसकी क्षमता से अधिक बोझ देने का अर्थ है आपदा को न्योता देना; यदि हमें 2047 तक जल आत्मनिर्भरता और सुरक्षित पारिस्थितिकी का लक्ष्य पाना है तो पर्वतीय ढलानों पर अतिक्रमण रोकना, afforestation बढ़ाना, community-based monitoring लागू करना, floodplain zoning करना और early warning systems का विस्तार करना होगा ।
अन्यथा हर वर्ष बढ़ते भूस्खलन हजारों जानें लेंगे और अरबों की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाएँगे; अतः वैज्ञानिक व भूगर्भीय डेटा यही कहते हैं कि पर्वतीय पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है और इसका संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि स्थानीय समुदाय, वैज्ञानिक संस्थानों और आम नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी है।