क्या नदी, नहर, तालाब झील आदि पानी के स्त्रोत ?
पंकज चतुर्वेदी
हाल ही में एक समाचार देखा जिसमें बिहार के एक जिला मुख्यालय में स्थित जिला अस्पताल में घुटनों पानी भरा था, अस्पताल परिसर लबालब था । जिस पर कहा जा रहा था कि बरसात के डर से मरीज परेशान हैं, हकीकत तो यह है कि इस घटना ने अस्पताल परिसर का निर्माण करने वाले इंजीनियरों के तकनीकी ज्ञान पर सवाल खड़े किये थे ।
जरा ध्यान दें जहां भी जल भराव हो रहा है, उनमें से अधिकाँश स्थान वे हैं जहां के नदी-तालाब पर समाज ने कब्जा कर रखा था, विनाश कर दिया, नष्ट कर दिया, उजाड़ दिया, बर्बाद कर दिया, बीते महीने से भारत के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर उस बात के लिए ये नफरतें घंटों, पन्नों में उकेरी जा रही हैं जिसके संरक्षण के लिए सरकार-समाज चिंतित है और उसके सहेजने के लिए पूरी ताकत लगाई जा रही है।
असल में पानी को लेकर हमारी सोच प्रारंभ से ही त्रुटिपूर्ण है- हमें पढ़ा दिया गया कि नदी, नहर, तालाब झील आदि पानी के स्त्रोत हैं, हकीकत में हमारे देश में पानी का स्त्रोत केवल मानसून ही हैं, नदी-दरिया आदि तो उसको सहेजने का स्थान मात्र हैं। मानसून की हम कदर नहीं करते और उसकी नियामत को सहेजने के स्थान हमने खुद उजाड़ दिए ।
गंगा-यमुना के उद्गम स्थल से छोटी नदियों के गांव-कस्बे तक बस यही हल्ला है कि बरसात ने खेत-गांव सब कुछ उजाड़ दिया । यह भी सच है कि अभी मानसून विदा होते ही उन सभी इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए मारा-मारी होगी और लोग पीने के एक गिलास पानी को आधा भर कर जल-संरक्षण के प्रवचन देते और जल जीवन का आधार जैसे नारे दीवारों पर पोतते दिखेंगे ।
यह हम सभी जानते हैं कि भारत के लोक-जीवन, अर्थ व्यवस्था, पर्व-त्योहार का मूल आधार बरसात या मानसून का मिजाज ही है । कमजोर मानसून पूरे देश को सूना कर देता है । कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि मानसून भारत के अस्तित्व की धुरी है । जो महानगर- शहर पूरे साल वायु प्रदूषण के कारण हल्कान रहते हैं, इसी मौसम में वहां के लोगों को सांस लेने को साफ हवा मिलती है ।
खेती-हरियाली और साल भर के जल की जुगाड़ इसी बरसात पर निर्भर है । इसके बावजूद जब प्रकृति अपना आशीष इन बूंदों के रूप में देती है तो समाज व सरकार इसे बड़े खलनायक के रूप में पेश करने लगते हैं । इसका असल कारण यह है कि हमारे देश में मानसून का सम्मान करने की परंपरा समाप्त होती जा रही है – कारण भी है , तेजी से हो रहा शहरों की ओर पलायन व गांवों का शहरीकरण ।
भारतीय मानसून का संबंध मुख्यता गरमी के दिनों में होने वाली वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन से है । गरमी की शुरूआत होने से सूर्य उत्तरायण हो जाता है। सूर्य के उत्तरायण के साथ-साथ अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र का भी उत्तरायण होना प्रारंभ हो जाता है इसके प्रभाव से पश्चिमी जेट स्ट्रीम हिमालय के उत्तर में प्रवाहित होने लगती है ।
इस तरह तापमान बढने से निम्न वायु दाब निर्मित होता है । दक्षिण में हिंद महासागर में मेडागास्कर द्वीप के समीप उच्च वायु दाब का विकास होता है इसी उच्च वायु दाब के केंद्र से दक्षिण पश्चिम मानसून की उत्पत्ति होती है । जान लें तापमान बढ़ने के कारण एशिया पर न्यून वायु दाब बन जाता है। इसके विपरीत दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल के कारण दक्षिण हिंद महासागर तथा उत्तर-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पास उच्च दाब विकसित हो जाता है ।
परिणामस्वरूप उच्च दाब वाले क्षेत्रों से अर्थात् महासागरीय भागों से निम्न दाब वाले स्थलीय भागों की ओर हवाएँ चलने लगती हैं । सागरों के ऊपर से आने के कारण नमी से लदी ये हवाएँ पर्याप्त वृष्टि प्रदान करती हैं । जब निम्न दाब का क्षेत्र अधिक सक्रिय हो जाता है तो दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवा भी भूमध्य रेखा को पार करके मानसूनी हवाओं से मिल जाती है । इसे दक्षिण-पश्चिमी मानसून अथवा भारतीय मानसून भी कहा जाता है ।
इस प्रकार एशिया में मानसून की दो शाखाएँ हो जाती हैं-भारत में भी दक्षिण-पश्चिम मानसून की दो शाखाएँ हो जाती हैं-बंगाल की खाड़ी और अरब सागर की शाखा। जलवायु परिवर्तन का गहरा असर भारत में अब दिखने लगा है, इसके साथ ही ठंड के दिनों में अलनीनो और दीगर मौसम में ला नीना का असर हमारे मानसून-तंत्र को प्रभावित कर रहा है ।
विडंबना यह है कि हम अपनी जरूरतों के कुछ लीटर पानी को घटाने को तो राजी हैं लेकिन मानसून से मिले जल को संरक्षित करने के मार्ग में खुद ही रोड़ा अटकाते हैं । जबकि मानसून को सहेजने वाली नदियों में पानी सुरक्षित रखने के बनिस्बत रेत निकालने पर ज्यादा ध्यान देते हैं । हम यह भूल जाते हैं कि नदी की अपनी याददाश्त होती है, वह दो सौ साल तक अपने इलाके को भूलती नहीं ।
गौर से देखें तो आज जिन इलाकों में नदी से तबाही पर विलाप हो रहा है, वे सभी किसी नदी के बीते दो सदी के रास्ते में यह सोच कर बसा लिए गए कि अब तो नदी दूसरे रास्ते बह रही है, खाली जगह पर बस्ती बसा ली जाए । दूर क्यों जाएं, दिल्ली में ही अक्षरधाम मंदिर से ले कर खेलगांव तक को लें, अदालती दस्तावेजों में खुड़पेंच कर यमुना के जल ग्रहण क्षेत्र में बसा ली गईं ।
दिल्ली के पुराने खादर बीते पांच दशक में ओखला-जामिया नगर से ले कर गीता कालोनी, बुराड़ी जैसी घनी कॉलोनियों में बस गए और अब सरकार यमुना का पानी अपने घर में रोकने के लिए खादर बनाने की बात कर रही है ।
बिहार राज्य में ही उन्नीसवीं सदी तक हिमालय से चल कर कोई छह हजार नदियां यहां तक आती थीं जो संख्या आज घट कर बमुश्किल 600 रह गई है । मधुबनी-सुपौल में बहने वाली नदी तिलयुगा भी कुछ दशक पहले तक कोसी से भी बड़ी कहलाती थी, आज यह कोसी की सहायक नदी बन गई है। मध्यप्रदेश में नर्मदा, बेतबा, काली सिंध आदि में लगातार पानी की गहराई घट रही है । दुखद है कि जब खेती, उद्योग और पेयजल की बढ़ती मांग के कारण जल संकट भयावह हो रहा है वहीं जल को सहेज कर शुद्ध रखने वाली नदियां उथली, गंदी और जल-हीन हो रही हैं ।
असल में हम अपने मानसून के मिजाज, बदलते मौसम में बदलती बरसात, बरसात के जल को सहेज कर रखने के प्राकृतिक खजानों की रक्षा के प्रति ना तो गंभीर हैं और ना ही कुछ नया सीखना चाहते हैं । पूरा जल तंत्र महज भूजल पर टिका है जबकि यह सर्वविदित तथ्य है कि भूजल पेयजल का सुरक्षित साधन नहीं है। हर घर तक नल से जल पहुंचाने की योजना का सफल क्रियान्वयन केवल मानसून को सम्मान देने से ही संभव होगा ।
मानसून अब केवल भूगोल या मौसम विज्ञान नहीं हैं- इससे इंजीनियरिंग, सेनिटेशन, खेती-किसानी, ड्रेनेज सहित बहुत कुछ जुड़ा है । मानसून-प्रबंधन का गहन अध्ययन हमारे स्कूलों से ले कर इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में हो, जिसके तहत केवल मानसून से पानी ही नहीं, उससे जुड़ी फसलों, सड़कों, शहरों में बरसाती पानी के निकासी के माकूल प्रबंधों व संरक्षण जैसे अध्याय हों ।