हिमालय की चेतावनी: नदी-नालों से दूरी बनाएँ, जीवन बचाएँ क्लाउडबर्स्ट, जल प्रवाह और आपदा प्रबंधन पर वैज्ञानिक और नीतिगत विश्लेषण
हिमालय की चेतावनी: नदी-नालों से दूरी बनाएँ, जीवन बचाएँ क्लाउडबर्स्ट, जल प्रवाह और आपदा प्रबंधन पर वैज्ञानिक और नीतिगत विश्लेषण

हिमालय की चेतावनी: नदी-नालों से दूरी बनाएँ, जीवन बचाएँ

क्लाउडबर्स्ट, जल प्रवाह और आपदा प्रबंधन पर वैज्ञानिक और नीतिगत विश्लेषण

अजय सहाय

भारत के हिमालयी, अरावली, नीलगिरी, पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में बसे हिल स्टेशन — जैसे कि उत्तराखंड का केदारनाथ, हिमाचल प्रदेश का मनाली, शिमला, किन्नौर, जम्मू-कश्मीर का पहलगाम, सोनमर्ग, या सिक्किम और दार्जिलिंग जैसे क्षेत्र — प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पर्यटकों और स्थानीय निवासियों के आकर्षण का केंद्र हैं, लेकिन हाल के वर्षों में यहां प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति में जिस तीव्रता से वृद्धि हुई है ।

विशेष रूप से क्लाउडबर्स्ट (मौसमी जलप्रलय), लैंडस्लाइड (भूस्खलन), और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं में, उसने यह संकेत स्पष्ट कर दिया है कि पर्वतीय जलवायु और स्थलाकृति को लेकर मानवीय गतिविधियाँ और निवास संरचनाएं नीतिगत और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुनर्विचारित करने की आवश्यकता है।

क्लाउडबर्स्ट, जिसे भारतीय मौसम विभाग (IMD) तकनीकी रूप से एक ऐसी घटना के रूप में परिभाषित करता है जिसमें किसी सीमित क्षेत्र में एक घंटे के भीतर 100 मिमी से अधिक वर्षा होती है, पहाड़ी इलाकों में भयंकर आपदा ला सकती है, क्योंकि पानी को अवशोषित करने या संचित करने की क्षमता न तो मिट्टी की होती है और न ही वहां की जल निकासी प्रणाली की।

परिणामस्वरूप यह जल तीव्र गति से ढलानों के सहारे बहते हुए नीचे स्थित गांव, बस्तियों, होटल, कॉलोनियों और सड़कों को बहाकर ले जाता है। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, जब क्लाउडबर्स्ट होता है और वह पर्वतीय ढलानों से नीचे उतरता है, तो उसकी प्रवाह गति 15 से 35 मीटर प्रति सेकंड (54 से 126 किमी प्रति घंटा) तक हो सकती है, और यदि ढलान की तीव्रता और जल की मात्रा अधिक हो, तो यह गति 50 मीटर/सेकंड से भी अधिक पाई गई है, जिससे हजारों से लाखों क्यूबिक मीटर पानी कुछ ही मिनटों में घाटियों और नालों में आ जाता है, जो विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लेता है।

उदाहरण स्वरूप, 2023 में केदारनाथ क्षेत्र में क्लाउडबर्स्ट के कारण अनुमानित 5 लाख घन मीटर जल कुछ ही घंटों में नीचे की ओर बहा था, जिससे ना केवल सड़कों का अस्तित्व मिट गया, बल्कि दर्जनों होटल, दुकानें, आवासीय क्षेत्र नदी में समा गए और सैकड़ों जानें गईं।

ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकारें नदी और नालों के किनारे बनी हर तरह की बस्तियों, कॉलोनियों, होटलों, रेस्ट हाउसों, निजी घरों व अन्य निर्माणों के लिए एक कठोर और वैज्ञानिक गाइडलाइन जारी करें, ताकि भविष्य में ऐसी आपदाओं की हानि को रोका जा सके। सबसे पहले तो यह समझना जरूरी है कि पर्वतीय जल निकायों जैसे नदियों और नालों की गतिक ऊर्जा (kinetic energy) और जल दबाव (hydraulic pressure) तब कई गुना बढ़ जाता है ।

जब उसके स्रोत पर क्लाउडबर्स्ट होता है, और मानव निर्मित अतिक्रमण जैसे कि नदी किनारे की सीधी पक्की दीवारें, रिसोर्ट, पार्किंग स्थल, सीवरेज लाइन, अतिक्रमित पुलिया, आदि जल प्रवाह के स्वाभाविक मार्ग को रोककर दबाव उत्पन्न करते हैं, जिससे जल उच्च वेग के साथ भयंकर विनाश करता है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्राधिकरणों द्वारा समय-समय पर दिशा-निर्देश तो जारी किए गए हैं, परंतु स्थानीय नगर निकायों, पर्यटन विकास प्राधिकरणों और ग्राम पंचायतों में इनका पालन नहीं होता, जिससे हिमाचल के कुल्लू, किन्नौर, मंडी, शिमला, उत्तराखंड के चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग, नैनीताल, और सिक्किम तथा दार्जिलिंग में बाढ़ और भूस्खलन की त्रासदी दोहराई जाती रही है। उदाहरण के तौर पर, हिमाचल प्रदेश में 2023-24 में मानसून काल के दौरान 80 से अधिक स्थानों पर क्लाउडबर्स्ट की सूचना दर्ज की गई, जिनमें शिमला, मंडी, सिरमौर और किन्नौर प्रमुख रहे, और लगभग 1100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ जबकि 400 से अधिक लोगों की मृत्यु की पुष्टि हुई।

वर्तमान समय में भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS), रिमोट सेंसिंग, LIDAR डेटा और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग का उपयोग करते हुए पर्वतीय क्षेत्रों की नदियों, जल निकासी संरचना और संभावित जल प्रवाह मार्गों की पहचान की जा सकती है, जिससे यह निर्धारित किया जा सके कि क्लाउडबर्स्ट जैसी घटनाओं के दौरान जल का प्राकृतिक मार्ग क्या रहेगा, और किस क्षेत्र को रेड जोन (अत्यधिक संवेदनशील), येलो जोन (संवेदनशील), और ग्रीन जोन (कम खतरे वाला) घोषित किया जाए।

इन आंकड़ों के आधार पर ही किसी निर्माण को स्वीकृति दी जानी चाहिए और पुराने निर्माणों को चरणबद्ध ढंग से हटाने की कार्ययोजना बनानी चाहिए। NDMA ने 2020 में एक ड्राफ्ट हिल एरिया डेवलपमेंट गाइडलाइन तैयार की थी, जिसमें स्पष्ट रूप से यह उल्लेख है कि किसी भी नदी या नाले के दोनों ओर कम से कम 30 से 100 मीटर तक निर्माण निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया जाए, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां ढलान 30 डिग्री से अधिक हो और भूमि की जल अवशोषण क्षमता 20% से कम हो।

इसके साथ ही, पर्यटकीय विकास के नाम पर जल स्रोतों के आसपास बेतरतीब रिसॉर्ट निर्माण, सीवरेज आउटलेट्स को नालों में डालना, सड़क चौड़ीकरण के नाम पर ढलानों की कटाई, बिना रेन वाटर ड्रेन प्लानिंग के टाउनशिप डेवलपमेंट जैसी गतिविधियाँ आपदा को आमंत्रण देती हैं।

यूनाइटेड नेशंस ऑफिस फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन (UNDRR) और IPCC रिपोर्ट 2023 के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में वायुमंडलीय नमी की मात्रा बढ़ गई है, जिससे क्लाउडबर्स्ट की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि हो रही है। साथ ही, ग्लेशियर पिघलने के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भी क्लाउडबर्स्ट से उत्पन्न जल मात्रा बढ़ रही है, जिससे जल प्रवाह और अधिक तीव्र हो रहा है।

पर्वतीय नदियों की जल वहन क्षमता (carrying capacity) आमतौर पर बहुत सीमित होती है क्योंकि वे वर्षा आधारित नदियाँ होती हैं, जिनका प्रवाह मानसून या क्लाउडबर्स्ट पर निर्भर करता है। जैसे, मंणिकर्ण घाटी की पार्वती नदी, या उत्तराखंड की ऋषिगंगा, जिनमें सामान्यतः 30 से 50 क्यूसेक पानी बहता है, परंतु क्लाउडबर्स्ट के समय वह क्षमता 2000 से 3000 क्यूसेक तक हो जाती है — यानी प्रति सेकंड 85,000 लीटर से अधिक पानी। इस स्थिति में यदि नाले के आसपास होटल, पार्किंग, हाउसिंग कॉलोनी बसी हो तो उनकी सुरक्षा असंभव है।

यह भी देखा गया है कि पर्यटन के दबाव के कारण स्थानीय प्रशासन द्वारा इन संरचनाओं को अनदेखा किया जाता है, जबकि उन्हें डिजास्टर इम्पैक्ट असेसमेंट (DIA), हाइड्रोलॉजिकल इम्पैक्ट असेसमेंट (HIA), और slope stability analysis जैसे वैज्ञानिक मूल्यांकन के बिना अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के सहयोग से एक हाई रिस्क जोन मैपिंग और पुनर्वास नीति बनानी चाहिए, जिसमें उन सभी बस्तियों, कॉलोनियों, होटलों और गांवों की सूची बने जो नदी-नालों के किनारे बसे हैं और जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर हटाकर सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वासित किया जाए।

इसके अतिरिक्त, हर साल पर्वतीय नगरों में प्री-मानसून ऑडिट किया जाना चाहिए, जिसमें सभी जल निकासी मार्ग, पुल, जलधाराएं, जलस्रोत, सड़क किनारे के सीवरेज मार्ग, चेकडैम, रिटेनिंग वॉल, और slope drains का निरीक्षण और मरम्मत की जाए, और क्लाउडबर्स्ट की संभावना वाले क्षेत्रों में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (AWS) और कम्युनिटी अलर्ट नेटवर्क स्थापित किए जाएं।

अंततः, यह कहा जा सकता है कि प्राकृतिक संकेतों की अनदेखी करना और नदी-नालों के किनारे निर्माण करना न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अनुचित है, बल्कि यह सीधे जीवन के अधिकार का उल्लंघन है, इसलिए “प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, समन्वय” का मंत्र अपनाते हुए सरकारों को नई निर्माण नीति, बस्तियों के स्थान परिवर्तन, डिजिटल मानचित्रण, और आपदा शिक्षा जैसे बहुआयामी उपाय करने चाहिए ताकि पर्वतीय इलाकों में लाखों नागरिकों का जीवन सुरक्षित हो सके, और भविष्य में किसी भी केदारनाथ, जोशीमठ, कुल्लू, किन्नौर जैसी आपदा को दोहराया न जाए।

यह नीतिगत, वैज्ञानिक और नैतिक आवश्यकता है कि नदी-नालों से कम से कम 100 मीटर की दूरी तक किसी भी निर्माण की अनुमति न दी जाए और जहां दिया गया है, वहां चरणबद्ध रूप से हटाया जाए, क्योंकि हिमालय स्वयं संकेत दे रहा है: “दूरी बनाओ, जीवन बचाओ ।”