‘ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ को लेकर स्थानीय ‘निकोबारी जनजातीय परिषद’ ने मोर्चा खोला
पंकज चतुर्वेदी
हिंद महासागर के नीले पानी के बीच स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप समूह आज एक ऐसी जंग का मैदान बना हुआ है, जहां एक तरफ आधुनिक भारत की विशाल रणनीतिक आकांक्षाएं हैं और दूसरी तरफ एक प्राचीन सभ्यता के अस्तित्व की पुकार।
केंद्र सरकार की ₹72,000 करोड़ की ‘ग्रेट निकोबार होलिस्टिक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ को लेकर स्थानीय ‘निकोबारी जनजातीय परिषद’ ने जो मोर्चा खोला है, वह केवल पर्यावरण बचाने की मुहिम नहीं है, बल्कि अपनी पहचान, संस्कृति और कानूनी अधिकारों को बचाने की अंतिम लड़ाई है।
यह स्थान समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीवों की एक असाधारण विविधता का घर है। सरकार के अनुसार, यह दुनिया में सबसे अच्छी तरह से संरक्षित उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में से एक है। यहाँ धरती की सबसे पुरने आदिवासी आबादी रहती है। क्या विकास का नया मॉडल इन सभी नैसर्गिक उपहारों का दुश्मन बन जाएगा ?
भूमि से दूर हिंद महासागर के बंगाल की खाड़ी के दक्षिण पूर्वी भाग में स्थित 572 द्वीपों का समूह अंडमान निकोबार इन दिनों ऐसे ही द्वन्द से गुजर रहा है है। ये द्वीप इंडोनेशिया और थाईलैंड के निकट स्थित हैं। 2013 में इसे यूनेस्को के जैवमंडल कार्यक्रम (ह्यूमन एंड बायोस्पियर प्रोग्राम) में शामिल किया गया था। आज वहां कंक्रीट के साथ बाहरी लोगों को बसाने की योजना तैयार की जा रही है, वह भी पर्यावरणीय कानूनों की अनदेखी कर रहे हैं ।
निकोबारी आदिवासियों के विरोध का सबसे बुनियादी और भावुक मुद्दा उनकी पैतृक भूमि है। 2004 की सुनामी ने निकोबार के भूगोल और समाज को पूरी तरह बदल दिया था। उस समय सुरक्षा कारणों से प्रशासन ने तटीय गांवों—विशेष रूप से चिनगेनह (Chingenh), पुलो बाहा (Pulo Baha), और कोकेओन(Kokeon)—के निवासियों को अस्थायी शिविरों और पुनर्वास बस्तियों (जैसे कैंपबेल बे) में भेज दिया था।
ग्रेट निकोबार के जनजातीय परिषदाध्यक्षों का आरोप है कि उन्हें द्वीप के पश्चिमी तट पर अपने पुश्तैनी ज़मीनें छोड़ देने के प्रमाण-पत्रों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया, ताकि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना के विकास को अनुमति दी जा सके।
22 जनवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में द्वीप पर जनजातीय समितियों के प्रमुखों की तरफ से श्री बरनबास मंजु ने बताया कि जिला प्रशासन ने उन्हें 7 जनवरी को एक बैठक के लिए बुलाया और फिर द्वीप के विकास के समर्थन के रूप में दिखाने के लिए उन्हें सरेंडर प्रमाण-पत्रों पर हस्ताक्षर करने को कहा गया, जिसका वे 2022 से विरोध कर रहे हैं।
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना में एक ट्रांसशिपमेंट कंटेनर पोर्ट, एक बड़ा टाउनशिप, एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, तथा गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र का निर्माण शामिल है, जिसकी लागत ₹81,000 करोड़ (₹810 अरब) बताई गई है।
यह भूमि 2004 के सुनामी तक 27 गांवों में निकोबारी लोगों द्वारा आबाद थी, जिसके बाद उन्हें फिर से बसाया गया और कैंपबेल बे के निकट ऊपरी पूर्वी तट पर राजीव नगर और न्यू चिंगेनह बस्तियों में स्थानांतरित किया गया। “जब हमें पुनर्वासित किया गया था, तो हमें वादा किया गया था कि हम वापस आ सकेंगे।”
निकोबारी जनजातीय परिषद का तर्क है कि दो दशकों से वे अपनी इन पैतृक जमीनों पर वापस लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके लिए ये जमीनें केवल मिट्टी का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की समाधियां, उनके पवित्र नारियल के बागान और उनकी सांस्कृतिक विरासत हैं। सरकार की नई योजना के तहत, इन्ही जमीनों पर अब ‘कंटेनर टर्मिनल’ और ‘हवाई पट्टी’ प्रस्तावित है। परिषद का आरोप है कि उन्हें अपनी ही जमीन से हमेशा के लिए बेदखल करने की साजिश रची जा रही है।
हाल ही में विरोध तब और उग्र हो गया जब यह बात सामने आई कि स्थानीय प्रशासन आदिवासियों से उनकी पैतृक भूमि के अधिकार छोड़ने के लिए ‘सरेंडर सर्टिफिकेट’ पर हस्ताक्षर करने का दबाव बना रहा है।
जनजातीय परिषद ने स्पष्ट किया है कि सुनामी के बाद उन्हें केवल ‘सुरक्षा’ के लिए हटाया गया था, न कि उन्होंने अपनी जमीन का मालिकाना हक सरकार को सौंप दिया था। परिषद का कहना है कि प्रशासन यह भ्रम पैदा कर रहा है कि आदिवासी अपनी मर्जी से जमीन छोड़ रहे हैं, जबकि हकीकत में उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है या विकास का झूठा लालच दिया जा रहा है।
निकोबारी परिषद के विरोध का सबसे मजबूत कानूनी आधार ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’ है।
कानून के अनुसार, किसी भी विकास कार्य के लिए ग्राम सभा की ‘स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति’ (Free, Prior and Informed Consent) अनिवार्य है।परिषद ने केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय को लिखे पत्रों में आरोप लगाया है कि प्रशासन ने फर्जी तरीके से यह रिपोर्ट दी कि आदिवासियों के अधिकारों का निपटारा कर दिया गया है।
परिषद का कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत और सामुदायिक वनाधिकारों के लिए। हालाँकि निकोबारी परिषद मुख्य रूप से निकोबारी समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन वे ‘शोम्पेन’ (Shompen) जनजाति के अधिकारों के लिए भी सबसे मुखर आवाज बनकर उभरे हैं। शोम्पेन एक ‘विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह’ (PVTG) हैं।
समझना होगा कि शोम्पेनजनजाति बाहरी दुनिया से संपर्क नहीं रखते। परिषद का कहना है कि सरकार जिस ‘होल्लिस्टिक डेवलपमेंट’ की बात कर रही है, वह शोम्पेन के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर देगा।
आदिवासियों को यह भी भी है कि वे अपने ही घरों में अल्पसंख्यक हो जाएंगे । वर्तमान में द्वीप की आबादी मात्र 8,000 के करीब है। परियोजना के तहत इसे बढ़ाकर 6.5 लाख करने की योजना है। इतनी बड़ी संख्या में बाहरी लोगों का आना शोम्पेन की संस्कृति और स्वास्थ्य के लिए ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ जैसा होगा।
सरकार का यह तर्क बहुत अतार्किक है कि है कि जो 130 वर्ग किलोमीटर जंगल काटा जाएगा, उसकी भरपाई हरियाणा या मध्य प्रदेश में पेड़ लगाकर की जाएगी। निकोबारी परिषद का कहना है कि निकोबार के वर्षावनवहां की प्रजातियों और समुदायों के साथ लाखों वर्षों के सह-अस्तित्व का परिणाम हैं।
हरियाणा का जंगल निकोबार के आदिवासियों को न तो पंडानसका फल दे सकता है और न ही उनके पारंपरिक देवताओं का वास स्थान बन सकता है।
सरकार इस परियोजना को चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने और हिंद महासागर में भारत की शक्ति बढ़ाने के लिए ‘अति-महत्वपूर्ण’मानती है। लेकिन जनजातीय परिषद का प्रश्न सीधा है: “क्या राष्ट्रीय सुरक्षा अपने ही नागरिकों के विनाश की कीमत पर हासिल की जानी चाहिए?”
परिषद ने सुझाव दिया है कि विकास की योजनाओं को उन क्षेत्रों तक सीमित रखा जाए जो जनजातीय रिजर्व से बाहर हैं, लेकिन मेगा-प्रोजेक्ट के वर्तमान डिजाइन में आदिवासियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई है।
निकोबारी जनजातीय परिषद का यह विरोध अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है। यह वैश्विक स्तर पर स्वदेशी लोगों के अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। यदि सरकार ने बलपूर्वक इस परियोजना को आगे बढ़ाया, तो यह न केवल अंतरराष्ट्रीय संधियों (जैसे संयुक्त राष्ट्र का मूल निवासियों के अधिकार हेतु घोषणा पत्र ) का उल्लंघन होगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर भी एक दाग होगा।
समाधान केवल ‘मुआवजे’ में नहीं, बल्कि ‘सम्मान’ में है। जब तक निकोबार के आदिवासियों को इस विकास प्रक्रिया में समान भागीदार नहीं बनाया जाता और उनकी पैतृक भूमि की पवित्रता को स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक गैलाथिया की लहरों पर उठने वाला यह विरोध शांत नहीं होगा।
यदि सरकार आदिवासियों की इन मांगों को अनसुना करती है, तो यह मेगा-प्रोजेक्ट केवल कंक्रीट का एक जंगल बनकर रह जाएगा, जिसकी कीमत वहां की प्राचीन आत्मा ने चुकाई होगी। सच्ची प्रगति वही है जिसमें सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज को सबसे ऊंचा स्थान मिले।
| मुद्दा | परिषद की मांग | प्रशासनिक योजना |
| भूमि अधिकार | पैतृक गांवों पर वापसी का अधिकार। | भूमि को ‘शून्य’ मानकर परियोजना हेतु आवंटन। |
| एफआर ए 2006 | ग्राम सभा की सहमति नहीं ली गई। | प्रक्रिया पूरी होने का दावा। |
| जनसंख्या | बाहरी लोगों के बसने से पहचान को खतरा। | आर्थिक विकास और रोजगार का तर्क। |
| सरेंडर सर्टिफिकेट | दबाव में लिए जा रहे हस्ताक्षर। | स्वैच्छिक भूमि त्याग का दावा। |
तथ्यात्मक सार
परियोजना लागत: ₹72,000 करोड़+
प्रभावित वन क्षेत्र: ~130-166 वर्ग किमी
अनुमानित वृक्ष कटाई: 8.5 लाख से 1 करोड़ तक।
लक्ष्य जनसंख्या वृद्धि: 8,000 से 6,50,000।
मुख्य प्रभावित जनजातियाँ: निकोबारी (पुनर्वासित) और शोम्पेन (PVTG)।