आर्द्रभूमियाँ-प्रकृति का कवच और मानव अस्तित्व की कुंजी 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस (वर्ल्ड वैटलैंड्स डे)आर्द्रभूमियाँ-प्रकृति का कवच और मानव अस्तित्व की कुंजी 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस (वर्ल्ड वैटलैंड्स डे)

2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस (वर्ल्ड वैटलैंड्स डे)

सुनील कुमार महला

हर वर्ष 2 फरवरी को विश्व आर्द्रभूमि दिवस (वर्ल्ड वैटलैंड्स डे) मनाया जाता है। वास्तव में, यह दिवस 1971 में ईरान के रामसर शहर में हुए ‘रामसर कन्वेंशन ऑन वेटलैंड्स’ के हस्ताक्षर की स्मृति में मनाया जाता है। इस कन्वेंशन का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर की आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) का संरक्षण और उनका विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना है।

यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि आर्द्रभूमियाँ (वैटलैंड्स) धरती के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं। ये वे क्षेत्र होते हैं जहाँ पानी और मिट्टी आपस में मिलते हैं, और जहाँ पूरे वर्ष या वर्ष के कुछ महीनों तक जलभराव रहता है, जैसे कि झीलें, तालाब, दलदल, मैंग्रोव, नदियों के किनारे के क्षेत्र आदि।

आर्द्रभूमियों को ‘धरती के गुर्दे’ कहा जाता है, क्योंकि ये पानी को स्वच्छ करने का काम करती हैं। ये जल में मौजूद प्रदूषकों, तलछट और अतिरिक्त पोषक तत्वों को सोख लेती हैं, जिससे भूजल साफ और सुरक्षित रहता है। इन्हें ‘जैविक सुपरमार्केट’ भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ अत्यंत विस्तृत खाद्य जाल (फूड वेब) पाया जाता है।

आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि पृथ्वी की लगभग 40% जैव विविधता आर्द्रभूमियों पर निर्भर है, जबकि ये पृथ्वी की सतह के केवल 6% क्षेत्र में ही फैली हुई हैं। आर्द्रभूमियाँ स्पंज की तरह कार्य करती हैं। बारिश के समय ये अतिरिक्त पानी को अपने अंदर समाहित कर लेती हैं और इस तरह बाढ़ की तीव्रता को कम करती हैं।

साथ ही, ये कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर मिट्टी में जमा करती हैं, और कई बार जंगलों से भी अधिक प्रभावी ढंग से ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद करती हैं। इसी कारण इन्हें ‘कार्बन सिंक’ भी कहा जाता है।विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

इसके साथ ही, इनके संरक्षण और सतत प्रबंधन को बढ़ावा देना, ताकि ये प्राकृतिक प्रणालियाँ लंबे समय तक बनी रहें। इस दिवस का एक और महत्वपूर्ण उद्देश्य स्थानीय समुदायों और नीति निर्माताओं को जोड़ना है, ताकि आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकें।हर वर्ष इस दिवस के लिए एक विशेष थीम निर्धारित की जाती है।

2025 की थीम थी-‘हमारे साझा भविष्य के लिए आर्द्रभूमि का संरक्षण।’ इस वर्ष यानी कि 2026 की थीम है-‘आर्द्रभूमियाँ और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का उत्सव।’ वास्तव में, यह थीम यह दर्शाती है कि पारंपरिक और स्थानीय समुदायों का ज्ञान आर्द्रभूमियों के संरक्षण और प्रबंधन में हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है और आज भी उनकी संस्कृति व जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

यदि हम यहां पर आर्द्रभूमियों के महत्व की बात करें तो ये पानी का नियमन और शुद्धिकरण करती हैं,जैव विविधता का घर हैं, आजीविका का स्रोत हैं (मछली पकड़ना, कृषि, पर्यटन और रोजगार),तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक हैं।

बहरहाल, यदि वैश्विक आँकड़ों पर नज़र डालें, तो विश्व में कुल 2,520 रामसर साइट्स हैं, जो लगभग 2.53 करोड़ हेक्टेयर (25.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर) क्षेत्र में फैली हुई हैं तथा अब तक 172 से अधिक देशों ने रामसर कन्वेंशन को अपनाया है, और यह दुनिया का सबसे बड़ा संरक्षित पारिस्थितिक तंत्र नेटवर्क माना जाता है। भारत की बात करें तो यहाँ 98 रामसर साइट्स हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के रूप में मान्यता मिली है।

हाल ही में पटना बर्ड सैंक्चुअरी और छारी-धंध बर्ड सैंक्चुअरी को इस सूची में जोड़ा गया है। ये सभी मिलकर लगभग 13.60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करती हैं। उल्लेखनीय है कि रामसर साइट्स की संख्या के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर और एशिया में पहले स्थान पर है।

इसके अलावा, झारखंड में उधवा झील, तमिलनाडु में तीरतंगल और सक्काराकोट्टई, तथा सिक्किम में खेचियोपलरी को भी नवीन रामसर स्थलों की सूची में शामिल किया गया है। ये झारखंड और सिक्किम के पहले रामसर स्थल हैं।इसके साथ ही, भारत में रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 89 भी बताई गई है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार तमिलनाडु में सबसे अधिक 20 रामसर स्थल हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 10 स्थल हैं।भारत के प्रमुख वेटलैंड्स में क्रमशः चिल्का झील (ओडिशा), केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान), सांभर साल्ट लेक (राजस्थान), लोकटक झील (मणिपुर) और सुंदरबन मैंग्रोव (पश्चिम बंगाल) प्रमुख हैं।

आज विश्व और भारत में आर्द्रभूमियाँ अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं। हालिया अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 20% से अधिक आर्द्रभूमियाँ पिछले दशकों में नष्ट हो चुकी हैं।भूमि उपयोग में बदलाव, प्रदूषण, कृषि विस्तार, औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन इसके प्रमुख कारण हैं। आर्द्रभूमियों के लिए सबसे बड़ा खतरा औद्योगिक और मानवीय अपशिष्ट से उत्पन्न प्रदूषण है।

यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत सरकार ने जून 2023 में ‘अमृत धरोहर पहल’ की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य रामसर स्थलों का संरक्षण करना है। यह पहल चार प्रमुख क्षेत्रों प्रजाति और आवास संरक्षण, प्रकृति पर्यटन,आर्द्रभूमि आधारित आजीविका तथा आर्द्रभूमि कार्बन पर केंद्रित है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि वेटलैंड्स को बचाना केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की रक्षा है। बाढ़ और सूखे से सुरक्षा, भूजल रिचार्ज, जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से लड़ाई, खाद्य और आजीविका सुरक्षा-इन सबके लिए आर्द्रभूमियाँ अनिवार्य हैं।आर्द्रभूमियों को बचाने के लिए अतिक्रमण पर सख़्त रोक लगानी होगी, झीलों, तालाबों, दलदलों और मैंग्रोव क्षेत्रों में अवैध निर्माण व भराव पर कार्रवाई करनी होगी।

इतना ही नहीं, आर्द्रभूमियों का स्पष्ट सीमांकन (डिमार्केशन) करना आवश्यक है।इसके साथ ही, घरेलू सीवेज, औद्योगिक कचरा और प्लास्टिक को आर्द्रभूमियों में जाने से रोकना होगा। नालों के पानी को ट्रीटमेंट प्लांट में शोधन के बाद ही छोड़ा जाना चाहिए। पूजा सामग्री और मूर्ति विसर्जन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी होगी। आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए प्राकृतिक जल प्रवाह बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।

नदियों, नालों और झरनों का वेटलैंड्स से प्राकृतिक जुड़ाव बना रहना चाहिए। अनावश्यक बाँधों, सड़कों और तटबंधों से जल मार्ग अवरुद्ध नहीं होने चाहिए।स्थानीय समुदायों की भागीदारी आर्द्रभूमि संरक्षण में सबसे महत्वपूर्ण है। मछुआरों, किसानों और ग्रामीणों को संरक्षण का साझेदार बनाना होगा तथा पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय तरीकों का उपयोग करना होगा।इसके साथ ही जैव विविधता का संरक्षण,पक्षियों, मछलियों और जलीय पौधों की रक्षा,बाहरी और आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण, मैंग्रोव और जलीय वनस्पतियों का पुनरोपण आवश्यक है।

साथ ही साथ, कानून और नीतियों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। वेटलैंड्स (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम–2017 को प्रभावी रूप से लागू करना, सभी रामसर स्थलों के लिए विशेष प्रबंधन योजना बनाना और पर्यावरण प्रभाव आकलन को अनिवार्य करना बेहद जरूरी है।सबसे अंत में, जन-जागरूकता और शिक्षा सबसे प्रभावी हथियार है।

स्कूलों और कॉलेजों में वेटलैंड शिक्षा, 2 फरवरी को जागरूकता अभियान, मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी फैलाकर आर्द्रभूमियों को बचाया जा सकता है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या और विकास के इस दौर में हमें प्रकृति-संवेदनशील शहरी विकास अपनाना होगा। वास्तव में, आज हमें कंक्रीट नहीं, कनेक्टिविटी का सिद्धांत अपनाना होगा।

स्मार्ट सिटी योजनाओं में ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देकर आर्द्रभूमियों को सुरक्षित रखा जा सकता है।यह बात हमें अपने जेहन में रखनी चाहिए कि आर्द्रभूमियाँ हमारे जीवन का आधार हैं तथा इन्हें बचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी और कर्तव्य है।

फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।

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