वैज्ञानिक आधार और पर्यावरणीय समाधान
अजय सहाय
जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) वह वैज्ञानिक, पारिस्थितिक और सामाजिक क्षमता है जिसके माध्यम से कोई समाज, पारिस्थितिकी तंत्र या राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के झटकों—जैसे तापमान वृद्धि, अनिश्चित मानसून, सूखा, बाढ़, चक्रवात, हिमनद पिघलाव, समुद्री स्तर वृद्धि और हीटवेव—को सहन, अनुकूलित और पुनर्स्थापित करने की शक्ति विकसित करता है ।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में इसकी आवश्यकता इसलिए अत्यंत बढ़ गई है क्योंकि औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1°C बढ़ चुका है (IPCC AR6 रिपोर्ट), जिसके कारण वर्षा पैटर्न में अस्थिरता, चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि तथा पारिस्थितिकी तंत्रों की संवेदनशीलता बढ़ी है।
भारत जैसे मानसूनी देश में लगभग 4000 अरब घन मीटर (BCM) वार्षिक वर्षा होती है, परंतु वैज्ञानिक आकलन दर्शाते हैं कि लगभग 60–65% जल बिना संग्रहण समुद्र में बह जाता है, जिससे सूखे और बाढ़ का चक्र तीव्र होता है ।
अतः जलवायु सहनशीलता का प्रथम स्तंभ जल-संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और कैचमेंट प्रबंधन है, क्योंकि भारत का कुल नवीकरणीय जल संसाधन लगभग 1869 BCM आँका गया है, जिसमें से उपयोग योग्य जल लगभग 1123 BCM है, जबकि केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board) के अनुसार देश के कई ब्लॉकों में भूजल स्तर 0.5–1 मीटर प्रतिवर्ष की दर से गिर रहा है, जिससे जल सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा दोनों पर खतरा उत्पन्न होता है।
जलवायु सहनशीलता के वैज्ञानिक आधार में कार्बन चक्र, जल चक्र और ऊर्जा संतुलन की परस्पर क्रिया शामिल है, जहाँ वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 420 ppm के आसपास पहुँच चुकी है, जो औद्योगिक युग से पहले लगभग 280 ppm थी, और इसके कारण ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़कर ग्लोबल वार्मिंग को प्रेरित कर रहा है ।
वन पारिस्थितिकी तंत्र इस संदर्भ में कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं—एक परिपक्व वन प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष 6–10 टन CO₂ अवशोषित कर सकता है, जबकि आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) अपने क्षेत्रफल के अनुपात में वनों से भी अधिक कार्बन संग्रहण क्षमता रखती हैं, और भारत में लगभग 4.6% भौगोलिक क्षेत्र आर्द्रभूमियों के अंतर्गत आता है (ISRO-NRSC वेटलैंड एटलस), जो बाढ़ नियंत्रण, भूजल रिचार्ज, जल शुद्धिकरण और जैव विविधता संरक्षण के माध्यम से जलवायु सहनशीलता को सुदृढ़ करते हैं ।
हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से अधिक दर्ज की गई है, और ICIMOD के अध्ययनों के अनुसार 2100 तक हिमालयी हिमनदों का 30–50% भाग पिघल सकता है यदि उत्सर्जन नियंत्रण नहीं हुआ, जिससे गंगा-ब्रह्मपुत्र-इंडस बेसिन में रहने वाली लगभग 1.3 अरब आबादी की जल उपलब्धता प्रभावित होगी।
समुद्र स्तर वृद्धि की दर लगभग 3.3 मिमी/वर्ष आंकी गई है (NASA उपग्रह डेटा), जो तटीय क्षेत्रों में लवणीयता बढ़ाकर कृषि भूमि को अनुपयोगी बना सकती है; जलवायु सहनशीलता की पर्यावरणीय रणनीतियों में प्राकृतिक-आधारित समाधान (Nature-based Solutions) प्रमुख हैं—जैसे मैंग्रोव पुनर्स्थापन, जो चक्रवातीय तूफानों की ऊर्जा को 30–40% तक कम कर सकते हैं ।
शहरी क्षेत्रों में हरित आवरण और शीतल छत (Cool Roof) तकनीक, जो हीट आइलैंड प्रभाव को 2–4°C तक घटा सकती है; वर्षा जल संचयन संरचनाएँ, जो प्रति 1000 वर्गमीटर छत क्षेत्र से औसतन 6–8 लाख लीटर जल संग्रह कर सकती हैं; और सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप/स्प्रिंकलर) प्रणाली, जो 30–50% जल बचत करती है ।
कृषि क्षेत्र में जलवायु सहनशीलता हेतु सूखा-सहिष्णु बीज, फसल विविधीकरण, मृदा जैविक कार्बन वृद्धि (प्रति 1% SOC वृद्धि से जल धारण क्षमता 1.5–2 गुना बढ़ सकती है) तथा एग्रोफोरेस्ट्री मॉडल महत्वपूर्ण हैं; ऊर्जा क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार—भारत ने 2025 तक 175 GW और 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म क्षमता का लक्ष्य रखा है—ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाकर दीर्घकालिक सहनशीलता को मजबूत करता है ।
आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) भी जलवायु सहनशीलता का अंग है, जहाँ पूर्व चेतावनी प्रणाली बाढ़/चक्रवात से होने वाली मृत्यु दर को 70–80% तक कम कर सकती है; शहरी जल निकासी पुनर्रचना, स्पंज सिटी मॉडल, बायो-स्वेल और परकोलेशन टैंक वर्षा जल को अवशोषित कर फ्लैश फ्लड की तीव्रता घटाते हैं ।
सामाजिक दृष्टि से जलवायु सहनशीलता सामुदायिक भागीदारी, स्थानीय जल बजट, विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार (DEWATS), महिला और युवा नेतृत्व, तथा पारंपरिक ज्ञान—जैसे नौला-धारा, आहर-पइन, जोहड़ प्रणाली—को पुनर्जीवित करने से सुदृढ़ होती है; स्वास्थ्य क्षेत्र में ताप-कार्य योजना (Heat Action Plan) हीटवेव से होने वाली मृत्यु दर को उल्लेखनीय रूप से घटाती है ।
वैज्ञानिक रूप से जलवायु सहनशीलता का मूल्यांकन अनुकूलन सूचकांकों, कार्बन फुटप्रिंट, जल उपलब्धता अनुपात, जैव विविधता सूचकांक और आपदा प्रत्यास्थता स्कोर के माध्यम से किया जाता है; आर्थिक विश्लेषण दर्शाते हैं कि अनुकूलन पर प्रत्येक 1 डॉलर निवेश से 4–10 डॉलर तक की क्षति बचाई जा सकती है ।
अंततः जलवायु सहनशीलता केवल पर्यावरण संरक्षण का विचार नहीं बल्कि जल, भोजन, ऊर्जा और जैव विविधता की समेकित सुरक्षा का बहु-आयामी ढाँचा है, जो विज्ञान-आधारित नीतियों, सामुदायिक सहभागिता, हरित अवसंरचना, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और निम्न-कार्बन विकास पथ के माध्यम से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए स्थायी, सुरक्षित और अनुकूल भविष्य सुनिश्चित करता है।