वैज्ञानिक आधार, डेटा रिकॉर्ड और 2047 के जल आत्मनिर्भर भारत का विज़न
अजय सहाय
भारत की नदियाँ केवल बहता हुआ जल नहीं बल्कि देश की सभ्यता, संस्कृति, कृषि, अर्थव्यवस्था और जैव-विविधता की जीवनदायिनी धमनियाँ हैं, परंतु बीते पाँच से सात दशकों में अनियंत्रित शहरीकरण, भूजल दोहन, अपशिष्टजल प्रवाह, सतही भंडारण में गिरावट, वनों की कटाई, नदी–वेटलैंड–नाला संपर्क का टूट जाना और जलवायु परिवर्तन—इन सबने मिलकर भारतीय नदियों को संकट की कगार पर पहुँचा दिया है ।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार वर्ष 2023–24 में भारत की 311 से अधिक नदियों में से 65 प्रतिशत नदियों में घुलनशील ऑक्सीजन मानक से कम, 45 प्रतिशत में जैव रासायनिक ऑक्सीजन माँग (बीओडी) सुरक्षित मानक से अधिक, तथा 120 से अधिक नदी स्थलों में अमोनिया की मात्रा चिंताजनक स्तर पर पाई गई, जबकि नीति आयोग की “भारत जल भविष्य रिपोर्ट 2022” के अनुसार देश के 70 प्रतिशत सतही जल स्रोत प्रदूषित श्रेणी में हैं ।
इसके अलावा देश में प्रति वर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर वर्षा होती है जिसमें से केवल लगभग 690–720 अरब घन मीटर ही नदियों के रूप में उपयोगी सतही प्रवाह बन पाता है और 3200 अरब घन मीटर से अधिक पानी या तो वाष्पित हो जाता है या बिना किसी उपयोग के बहकर समुद्र में चला जाता है, जिसके कारण नदी घाटियों में जल उपलब्धता का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है।
इस विशाल संकट के बीच “नदी पुनर्जीवन मॉडल” भारत के लिए एक वैज्ञानिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और भविष्य-दर्शी समाधान प्रस्तुत करता है, जिसका मुख्य सिद्धांत यह है कि नदी कोई पाइपलाइन नहीं बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र (लिविंग इकोसिस्टम) है और इसका पुनर्जीवन केवल नाले बंद करने या सफाई करने भर से नहीं बल्कि संपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र (कैचमेंट), भूजल–सतही जल संतुलन, वेटलैंड–नदी संपर्क, वनस्पति, नदी मार्ग, बाढ़ क्षेत्र, प्रवाह (फ्लो), तलछट, नदी जैव-विविधता और सामुदायिक भागीदारी ।
इन सबके समन्वित एवं एकीकृत सुधार से ही संभव है। वैज्ञानिक रूप से नदी पुनर्जीवन का प्रथम स्तंभ है पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) यानी नदी में न्यूनतम जीवंत प्रवाह बनाए रखना; गंगा, यमुना, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी, घाघरा, सोन, साबरमती आदि नदियों पर किए गए अध्ययनों के अनुसार 40–60 प्रतिशत नदी प्रवाह सुरक्षित ई-फ्लो के लिए आवश्यक माना गया है परंतु आज कई नदियों में गर्मियों में यह प्रवाह 5–10 प्रतिशत तक गिर जाता है, जिसका सीधा प्रभाव प्रदूषण, तलछट रुकावट, जीव-जंतुओं के विलुप्त होने और नदी के सूखने के रूप में सामने आता है।
भारत में नदी पुनर्जीवन का वैज्ञानिक आधार यह मानता है कि नदी को पुनर्जीवित करने के लिए नदी की मूल जल-शृंखला (River Continuum) को पुनर्स्थापित करना अनिवार्य है—इसमें पर्वतीय स्रोतों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक प्रवाह, वेटलैंड, नाले, घाट, कृषि-क्षेत्र, भूजल, जलागम, वर्षाजल, वनस्पति और जैव विविधता—सब आपस में जुड़े रहते हैं। यदि इस शृंखला का एक भी कड़ी टूट जाती है, जैसे वेटलैंड सूख जाए, नाले पक्के कर दिए जाएँ, वर्षाजल खेतों में न घुसे, भूजल गिर जाए, तो नदी की पारिस्थितिकी टूटने लगती है।
नदी पुनर्जीवन मॉडल का दूसरा स्तंभ है नदी–वेटलैंड–भूजल संबंध को पुनर्जीवित करना, क्योंकि वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार भारत के 60 प्रतिशत से अधिक वेटलैंड या तो भर दिए गए हैं या अतिक्रमण में आ गए हैं, जबकि एक स्वस्थ वेटलैंड प्रति हेक्टेयर 6 से 12 लाख लीटर तक जल संग्रहित कर सकता है और नदी प्रवाह को 4–7 महीने तक स्थिर बनाए रख सकता है ।
बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और असम के कई जिलों में किए गए अध्ययनों में पाया गया कि जिन क्षेत्रों में वेटलैंड संरक्षित हैं वहाँ नदियाँ गर्मियों में भी 20–40 प्रतिशत अधिक प्रवाह बनाए रखती हैं क्योंकि वेटलैंड धीरे-धीरे नदी में जल छोड़ते रहते हैं। इसलिए नदी पुनर्जीवन का पहला चरण यह बनता है कि नदी से जुड़े हर वेटलैंड, झील, तालाब और नाले को फिर से जोड़ा जाए, 50–500 मीटर तक बफर ज़ोन बनाकर अतिक्रमण हटाया जाए, घास, सरकंडा, टाइफ़ा, फिकस, जलकुंभी नियंत्रण, पखाल जैसे पौधों से प्राकृतिक शोधन क्षमता बढ़ाई जाए, और वेटलैंड को “जीवित जल स्पंज” बनाया जाए।
तीसरा स्तंभ है भूजल पुनर्भरण, क्योंकि नदी का स्थायी प्रवाह (बेस फ्लो) केवल भूजल से आता है; वैज्ञानिक तथ्य यह है कि गर्मियों में नदी के प्रवाह का 60–80 प्रतिशत हिस्सा भूजल द्वारा ही दिया जाता है। यदि भूजल नीचे गिर रहा है (और भारत में हर वर्ष औसतन 40–120 सेंटीमीटर गिर रहा है), तो नदी में पानी अपने आप कम हो जाएगा चाहे हम सतही सफाई कितनी भी कर लें।
नदी पुनर्जीवन मॉडल इसलिए भूजल पुनर्भरण को नदी प्रबंधन का मुख्य अंग मानता है—इसके लिए नदी के 5–10 किलोमीटर दायरे में पुनर्भरण कुण्ड, पुनर्भरण नाली, खेत तालाब, चेक डैम, परकोलेशन टैंक, वर्षाजल संचयन संरचनाएँ, नदी तट वृक्षारोपण, और भूजल नक्शों के आधार पर पुनर्भरण क्षेत्र घोषित किए जाते हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और बिहार के कई जिलों में यह पाया गया कि यदि नदी के दोनों ओर 2–4 किलोमीटर के दायरे में पुनर्भरण आयतन 20–40 प्रतिशत बढ़ा दिया जाए तो 3–5 वर्षों में नदी प्रवाह दो से तीन गुना तक सुधर जाता है।
चौथा स्तंभ है नदी शोधन (रिवर क्लीनिंग) का वैज्ञानिक मॉडल, जिसमें केवल सीवर बंद करना ही समाधान नहीं बल्कि निम्न 7 तकनीकें एक साथ लागू करनी होती हैं—
1) संपूर्ण घरों और बसावटों को शुद्धिकरण संयंत्रों से जोड़ना,
2) विकेन्द्रीकृत अपशिष्टजल प्रबंधन,
3) जैव-शोधन वेटलैंड,
4) नालों के मुहाने पर जैविक फिल्टर चैंबर,
5) फाइटोरिमेडिएशन पौधों का उपयोग,
6) नदी में फोम और रसायनिक प्रवाह रोकने के लिए प्राकृतिक घास पट्टी,
7) वर्षा जल और भूजल आधारित जल शोधन। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार यदि किसी नदी में 10–20 प्रतिशत भी स्वच्छ जल लगातार छोड़ा जाए तो नदी 18–24 महीनों में स्वयं शोधन क्षमता वापस पा सकती है क्योंकि जैव विविधता लौटने लगती है—उदाहरण के लिए गंगा में वर्ष 2023 में कई स्थलों पर घुलनशील ऑक्सीजन में 8–10 प्रतिशत सुधार इसी कारण हुआ।
पाँचवाँ स्तंभ है नदी के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) को पुनः मुक्त करना, क्योंकि वैज्ञानिक रूप से नदी का वास्तविक विस्तार बाढ़ के समय का होता है; लेकिन आज अधिकांश नदियों के दोनों किनारों पर 500–2000 मीटर के अंदर अतिक्रमण, निर्माण, आवास, उद्योग, कॉलोनी, सड़कें और पक्के ढाँचे बन गए हैं जिसके कारण नदी का प्राकृतिक मार्ग (रिवर करिडोर) सिकुड़ गया है और नदी का बहाव जाम हो गया है।
नदी पुनर्जीवन मॉडल कहता है कि नदी–नाला–वेटलैंड–फ्लडप्लेन को 500 मीटर, 1000 मीटर या भू-वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार मुक्त किया जाए, वहाँ केवल वृक्षारोपण, चारागाह, वेटलैंड, बांस-पट्टियाँ, प्राकृतिक घास, ओक–देवदार–अरहर–फिकस जैसे पौधे लगाए जाएँ ताकि नदी का प्राकृतिक मार्ग बहाल हो और बाढ़ के समय नदी बिना बाधा के फैल सके।
छठा स्तंभ है नदी आधारित जैव विविधता संरक्षण, क्योंकि स्वस्थ नदी वही होती है जिसमें मछलियाँ, कछुए, मेंढक, जलीय पौधे, शैवाल, कीट, पक्षी, माइक्रोब—इन सबका संतुलित तंत्र मौजूद हो। भारत में 20–30 प्रतिशत नदी आधारित प्रजातियाँ या तो लुप्तप्राय हो चुकी हैं या तेजी से घट रही हैं।
गंगा डॉल्फिन, महसीर मछली, घड़ियाल, नदी टर्न, जल कबूतर, अनेक प्रजातियों के कछुए—ये सब नदी के स्वास्थ्य के संकेतक हैं। जहाँ नदी में जैव विविधता लौटती है, वहाँ नदी का पानी वर्षों में स्वतः शुद्ध, स्थिर और जीवंत हो जाता है। इसलिए नदी पुनर्जीवन में जैव विविधता कॉरिडोर, डॉल्फिन कॉरिडोर, मछली प्रवाह गलियारे, प्राकृतिक तलछट बहाव, नदी–वेटलैंड संपर्क और अवरोध मुक्त प्रवाह की व्यवस्था करनी होती है।
सातवाँ स्तंभ है नदी का डिजिटल और वैज्ञानिक निगरानी ढाँचा, जिसमें सैटेलाइट, ड्रोन, जीआईएस, आईओटी आधारित जल स्तर सेंसर, स्वचालित गुणवत्ता मापक, और नदी किनारे निगरानी स्टेशनों की स्थापना शामिल है।
वर्ष 2047 के लिए यह अनिवार्य है कि भारत की हर प्रमुख नदी के 20–30 किलोमीटर पर एक डिजिटल निगरानी स्टेशन हो जो प्रवाह, बीओडी, डीओ, घुलनशील ठोस, नाइट्रेट, फॉस्फेट, तात्कालिक प्रदूषण—सबका वास्तविक-समय डेटा दे। इससे बाढ़ पूर्वानुमान, प्रदूषण स्रोत नियंत्रण, हिमालयी नदियों में ग्लेशियर-फ्लो बदलाव, बरसात के दौरान नदी की गति, नाला–नदी–वेटलैंड संपर्क—सबका वैज्ञानिक प्रबंधन संभव हो सकेगा।
नदी पुनर्जीवन मॉडल का आठवाँ और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है जनभागीदारी, क्योंकि नदियाँ कागज़ी योजनाओं से नहीं बल्कि लोगों की भागीदारी से पुनर्जीवित होती हैं; नदी किनारे जल पंचायतें, स्कूल-स्तर पर नदी प्रहरी क्लब, युवाओं के नदी निगरानी दल, किसानों के नदी तट कृषि समूह, महिलाओं के जल समूह, नगर निकायों की नदी शपथ, गाँवों की नदी मैत्री अभियान—ये सब मिलकर नदी को पुनर्जीवित करते हैं।