गंगा जल की वैज्ञानिक शुद्धता बैक्टीरियोफेज वायरसों की अद्वितीयता और आत्मशुद्धिकरण क्षमता का रहस्य
गंगा जल की वैज्ञानिक शुद्धता बैक्टीरियोफेज वायरसों की अद्वितीयता और आत्मशुद्धिकरण क्षमता का रहस्य

गंगा जल की वैज्ञानिक शुद्धता

बैक्टीरियोफेज वायरसों की अद्वितीयता और आत्मशुद्धिकरण क्षमता का रहस्य

अजय सहाय

गंगा नदी का जल धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ वैज्ञानिक रूप से भी अद्वितीय है, क्योंकि इसमें उपस्थित विशेष प्रकार के वायरस – बैक्टीरियोफेज – इसे आत्मशुद्धिकारी क्षमता से युक्त बनाते हैं, जो अन्य नदियों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली है।

वैज्ञानिक शोधों में यह प्रमाणित हुआ है कि गंगा जल में विशेष प्रकार के वायरस – कोलीफेज (Coliphage), एंटरोबैक्टीरियोफेज (Enterobacteriophage), स्ट्रेप्टोफेज (Streptophage), साल्मोनेलाफेज (Salmonellaphage), मायकोबैक्टीरियोफेज (Mycobacteriophage), शिगेल्लाफेज (Shigellaphage), और एरोमोनास फेज (Aeromonas phage) – बड़ी संख्या में मौजूद रहते हैं, जो ईशरीकिया कोलाई (Escherichia coli), साल्मोनेला (Salmonella), शिगेला (Shigella), एंटरोबैक्टर (Enterobacter), स्ट्रेप्टोकोकस (Streptococcus), मायकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्युलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) और एरोमोनास हाइड्रोफिला (Aeromonas hydrophila) जैसे खतरनाक रोगजनक बैक्टीरिया को मारकर जल को संक्रमणमुक्त बनाते हैं।

इन वायरसों की कार्यप्रणाली यह होती है कि वे रोगजनक बैक्टीरिया की कोशिका की पहचान कर उसमें अपना डीएनए/आरएनए प्रविष्ट कराते हैं, जिससे वह कोशिका फट जाती है – इस प्रक्रिया को लायटिक चक्र (Lytic Cycle) कहा जाता है, जिससे जल में रोगजनक समाप्त हो जाते हैं और जल दीर्घकाल तक ताजगी युक्त बना रहता है ।

उदाहरणस्वरूप, कोलीफेज वायरस ई. कोलाई को, जो मूत्र संक्रमण और पेट रोगों का कारण होता है, समाप्त करता है; एंटरोबैक्टीरियोफेज वायरस एंटरोबैक्टर को, जो गैस्ट्रोएन्टेराइटिस और मूत्र संक्रमण करता है, निष्क्रिय करता है; स्ट्रेप्टोफेज वायरस गले व त्वचा रोग फैलाने वाले स्ट्रेप्टोकोकस को, साल्मोनेलाफेज टाइफाइड के कारक साल्मोनेला को, मायकोबैक्टीरियोफेज टीबी फैलाने वाले मायकोबैक्टीरियम को, शिगेल्लाफेज पेचिश के लिए उत्तरदायी शिगेला को, और एरोमोनास फेज वायरस एरोमोनास को, जो जलजीवों और त्वचा रोगों का कारक है – सभी को नष्ट करता है ।

यही कारण है कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) और NEERI द्वारा किए गए शोध में पाया गया कि गंगा जल में प्रति मिलीलीटर 1 लाख से 10 लाख (10⁵–10⁶) तक बैक्टीरियोफेज पाए जाते हैं, जबकि यमुना, गोमती, साबरमती, नर्मदा, और कावेरी जैसी अन्य नदियों में यह संख्या केवल 100 से 10,000 (10²–10⁴) प्रति मिलीलीटर तक सीमित है – जैसे यमुना में 10³–10⁴, गोमती में 10²–5×10³, साबरमती में 10²–10³, नर्मदा में 10²–10⁴, और कावेरी में 10²–10³, जिससे स्पष्ट होता है कि गंगा जल की रोगनिरोधक क्षमता अन्य नदियों से 10 से 100 गुना अधिक है ।

इसके अलावा, IITR लखनऊ के अनुसार, गंगा जल में बैक्टीरियोफेज की उपस्थिति से ई. कोलाई जैसे बैक्टीरिया की वृद्धि दर 80% तक कम हो जाती है, जिससे जलजनित रोगों का खतरा न्यूनतम होता है; गंगा जल की यह विशिष्टता केवल वायरसों की उपस्थिति से ही नहीं बल्कि अन्य वैज्ञानिक कारकों से भी उत्पन्न होती है, जैसे – घुलनशील ऑक्सीजन (DO) का स्तर जो गंगा में 8–10 mg/L तक होता है, जबकि अन्य नदियों में यह 5–6 mg/L तक सीमित होता है; Biochemical Oxygen Demand (BOD) गंगा जल में 1.8–2.0 mg/L रहता है, जो कि <3 mg/L के स्वच्छ जल मानक से बेहतर है; इसके अलावा गंगोत्री क्षेत्र की चट्टानों से निकले रेडियोधर्मी तत्व, जो कि सूक्ष्म मात्रा में होते हैं ।

 जल में सूक्ष्मजीवों की अनियंत्रित वृद्धि को रोकते हैं – यह तथ्य Indian Journal of Radio & Space Physics में प्रकाशित हुआ है; इसके साथ ही गंगा जल में मौजूद बाइकार्बोनेट, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटेशियम जैसे प्राकृतिक खनिज जल की pH को 7.2 से 8.0 के बीच स्थिर रखते हैं, जो अम्लीय प्रदूषकों को निष्क्रिय करता है और रोगजनक बैक्टीरिया के विकास को रोकता है; ऊपरी गंगा घाटी में जल की पारदर्शिता अधिक होने से सूर्य की किरणें गहराई तक जाती हैं जिससे UV किरणों का प्रभाव सक्रिय रहता है और जीवाणु नष्ट होते हैं ।

इसके अतिरिक्त, गंगा जल में पाए जाने वाले Pseudomonas, Actinomycetes, Bacillus subtilis जैसे Antibacterial Microflora प्राकृतिक एंटीबायोटिक की तरह कार्य करते हैं, जो जल में संतुलन बनाए रखते हैं; ऐतिहासिक रूप से भी यह तथ्य स्थापित है – 1896 में अर्नेस्ट हेंकिन ने गंगा जल की जीवाणुनाशक शक्ति पहचानी और 1931 में डॉ. एफ. एच. हन्टर ने सिद्ध किया कि Vibrio cholerae गंगा जल में 3 घंटे में नष्ट हो गया, जबकि अन्य नदियों में 24 घंटे तक जीवित रहा ।

अतः निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि गंगा जल की आत्मशुद्धिकरण क्षमता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पूर्णतः वैज्ञानिक है, और यह गंगा को एक चलती हुई प्राकृतिक प्रयोगशाला बनाती है, जिसे संरक्षण की आवश्यकता श्रद्धा के साथ-साथ विज्ञान की दृष्टि से भी है, ताकि इसका यह चमत्कारी जल विज्ञान भविष्य की पीढ़ियों को लाभ दे सके।