उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का दो दशक का पर्यावरणीय विश्लेषण
अजय सहाय
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में पिछले दो दशकों में पेड़ों के धरती को मजबूती से पकड़ने की क्षमता में आई कमी और उनके भुरभुराकर गिरने की घटनाओं का वैज्ञानिक, भू-आकृतिक और पारिस्थितिकीय विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि यह समस्या केवल एक कारण से नहीं, बल्कि कई परस्पर जुड़े कारकों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है।
पारंपरिक रूप से हिमालयी पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले देशी वृक्ष प्रजातियां—जैसे देवदार (Cedrus deodara), बुरांश (Rhododendron arboreum), तुन (Toona ciliata), खर्सू (Quercus leucotrichophora), अखरोट (Juglans regia) आदि—की जड़ संरचना गहरी, फैलावदार और मिट्टी को पकड़ने में अत्यधिक सक्षम होती थी, जिससे वे न केवल मिट्टी अपरदन (Soil Erosion) को रोकते थे बल्कि वर्षा जल को रिसाकर भूजल पुनर्भरण भी करते थे।
किंतु पिछले 20 वर्षों में इन क्षेत्रों में वनों की संरचना और गुणवत्ता में भारी बदलाव आया है, जिसका एक प्रमुख कारण वनस्पति विविधता का ह्रास और विदेशी वाणिज्यिक प्रजातियों (जैसे चीड़ – Pinus roxburghii, और यूकेलिप्टस – Eucalyptus spp.) का बड़े पैमाने पर रोपण है; चीड़ की सतही जड़ें गहरी पकड़ नहीं बना पातीं, उनकी पत्तियों से निकलने वाला रेजिन और जमीन पर गिरने वाली सुइयां (Pine Needles) पानी को मिट्टी में समाने से रोकती हैं, जिससे जल धारण क्षमता घटती है और भूस्खलन व मिट्टी खिसकने का खतरा बढ़ता है।
इसी प्रकार, यूकेलिप्टस अत्यधिक जल-शोषक वृक्ष है, जिसकी जड़ें स्थानीय जलस्तर को तेजी से कम करती हैं, परिणामस्वरूप मिट्टी सूखने लगती है और पेड़ों की पकड़ कमजोर हो जाती है; दूसरी बड़ी समस्या जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न और हिमनद (Glacier) पिघलाव में आई तीव्रता है—भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और Wadia Institute of Himalayan Geology के आंकड़ों के अनुसार 2001–2023 के बीच मानसून और पूर्व-मानसून ऋतु में अत्यधिक तीव्रता वाली वर्षा (Heavy Rainfall Events) में 67% वृद्धि हुई है, जिसमें 50–100 मिमी/घंटा तक की तीव्र वर्षा कई स्थानों पर दर्ज की गई।
इस प्रकार की अचानक भारी बारिश (Cloudburst) मिट्टी की ऊपरी परत को तेजी से संतृप्त कर देती है, जिससे ढलानों पर पेड़ों की जड़ें ढीली हो जाती हैं और पेड़ गिर जाते हैं; इसके अतिरिक्त, हिमनद झील विस्फोट (GLOF – Glacier Lake Outburst Flood) जैसी घटनाओं से तेज़ बहाव का दबाव ढलानों और नदी घाटियों के किनारे स्थित वृक्षों पर पड़ता है, जिससे मिट्टी का क्षरण और अधिक तेजी से होता है।
उत्तराखंड में 2021 के बाद से GLOF की घटनाओं में 23% की वृद्धि दर्ज हुई है, विशेषकर चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिलों में; भूगर्भीय दृष्टि से, हिमालयी क्षेत्र युवा पर्वत प्रणाली है, जहां चट्टानें अपेक्षाकृत नई और अस्थिर हैं, और इन पर निरंतर टेक्टोनिक गतिविधि (Plate Tectonics) होती रहती है, जिसके कारण भूकंपीय कंपन मिट्टी की पकड़ को कमजोर करते हैं, और जब इस पर अत्यधिक नमी का भार बढ़ता है, तो वृक्षों की पकड़ ढीली हो जाती है।
मानवजनित कारणों में सड़क निर्माण, सुरंग परियोजनाएं, हाइड्रोपावर डैम, होटल-रिसॉर्ट निर्माण, और ढलानों की कटाई जैसे कार्यों से वृक्षों की जड़ क्षेत्र (Root Zone) को क्षति पहुंचती है; BRO (Border Roads Organisation) और अन्य निर्माण एजेंसियों के डेटा के अनुसार 2005–2024 के बीच हिमाचल व उत्तराखंड में 14,500 किमी से अधिक सड़कों का निर्माण हुआ, जिसके लिए लाखों पेड़ काटे गए और लाखों घन मीटर मिट्टी हटाई गई; इन कार्यों में ढलानों पर सही ड्रेनेज सिस्टम और रिटेनिंग वॉल्स का अभाव मिट्टी को अस्थिर कर देता है।
इसके अलावा, वर्षा जल का असमान वितरण और बर्फबारी में कमी (IMD डेटा के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में हिमाचल प्रदेश में औसत बर्फबारी में 18% कमी) ने मिट्टी में नमी की स्थिरता को प्रभावित किया, जिससे जड़ें मौसम के अधिकांश हिस्से में सूखी मिट्टी में कमजोर पड़ने लगीं; कृषि विस्तार और चराई के दबाव (Overgrazing) से ढलानों पर वनस्पति आवरण घटा है, और सतही मिट्टी की परत (Topsoil) का क्षरण बढ़ा है।
इन सभी कारकों ने मिलकर वृक्षों की वह प्राकृतिक क्षमता, जो पानी को रोककर मिट्टी को मजबूती देती थी, को कम कर दिया है; पारंपरिक रूप से, गहरी जड़ों वाले पेड़ और विविध वनस्पति वाले जंगल, क्लाउडबर्स्ट और मृदा कटाव से होने वाले जलप्रवाह को अवशोषित और धीमा करने में सक्षम थे, लेकिन अब एकल-प्रजाति (Monoculture) वाले वनों में जल अवशोषण और मृदा बंधन की क्षमता घट गई है, जिससे क्लाउडबर्स्ट या हिमनद विस्फोट जैसी घटनाओं का प्रभाव अधिक तीव्र हो गया है।
वैज्ञानिक अध्ययन (IIT Roorkee, Forest Research Institute – FRI Dehradun) बताते हैं कि चीड़-प्रधान वनों में मिट्टी की नमी 18–25% तक कम पाई गई, जबकि ओक और चौड़ी पत्ती वाले वनों में यह नमी 35–45% तक थी; इसी तरह, ओक के जंगलों में ढलानों का मृदा क्षरण 25 टन/हेक्टेयर/वर्ष पाया गया, जबकि चीड़ के जंगलों में यह 48 टन/हेक्टेयर/वर्ष तक पहुंच गया।
ग्लेशियर पिघलाव और अत्यधिक वर्षा के संयुक्त दबाव से अब पेड़ों के पास ढलानों को स्थिर रखने की वह क्षमता नहीं रही, जो 1970–90 के दशक में देखी जाती थी; समाधान के रूप में, वैज्ञानिक मिश्रित प्रजाति पुनर्वनीकरण (Mixed Species Afforestation), स्थानीय भू-आकृति अनुसार पौधारोपण, गहरी जड़ वाले वृक्षों (जैसे अखरोट, ओक, तुन, देवदार) की वापसी, माइक्रो-वाटरशेड प्रबंधन, जैव-इंजीनियरिंग (जैसे कोयर लॉग्स, लाइव हेजेस), और भूस्खलन-रोधी ड्रेनेज सिस्टम की स्थापना** की सलाह दे रहे हैं।
साथ ही, बड़े निर्माण कार्यों में ढलानों के कटान के बाद जैविक बंधन तकनीक अपनाना और क्लाउडबर्स्ट/ग्लेशियर मॉनिटरिंग सिस्टम को सक्रिय करना अनिवार्य है; यदि आने वाले 10–15 वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में सही प्रजाति चयन, वर्षा जल संचयन, और मृदा संरक्षण उपायों के साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाई जाए।
तो वृक्षों की धरती पकड़ क्षमता को पुनर्स्थापित किया जा सकता है और क्लाउडबर्स्ट व ग्लेशियर विस्फोट जैसी आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकता है—अन्यथा यह चक्र जारी रहेगा और ढलानों से वृक्षों का इस प्रकार गिरना एक सामान्य दृश्य बन जाएगा, जो न केवल पर्यावरण बल्कि मानव बस्तियों के लिए भी गंभीर खतरा है।