विज्ञान, संविधान और अंतरराष्ट्रीय मॉडल की राह
अजय सहाय
भारत के वर्तमान परिदृश्य में हिमालयी क्षेत्र में लगातार हो रही भारी वर्षा, मानसून की अनियमितता, चरम मौसमी घटनाओं और जलवायु परिवर्तन के कारण देश के अनेक राज्य—उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू–कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और केरल—लगातार बाढ़ की त्रासदी का सामना कर रहे हैं, जहाँ प्रतिवर्ष औसतन 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वर्षा जल गिरता है, लेकिन केंद्रीय जल आयोग (CWC) और नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार इसका लगभग 3200 BCM जल व्यर्थ बहकर समुद्र में चला जाता है, जबकि उपयोग में आने वाला सतही जल मात्र 1123 BCM और भूजल 693 BCM ही है ।
2024–25 की वर्षा औसतन सामान्य से 6–8% अधिक रही और इस कारण लगभग 250–300 BCM अतिरिक्त वर्षा जल देश में गिरा, जिसने अनेक राज्यों में बाढ़ की भयावह स्थिति उत्पन्न कर दी ।
आँकड़े बताते हैं कि 1953 से 2020 तक बाढ़ों ने भारत में 1,07,000 से अधिक लोगों की जान ली, लगभग 15 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित हुई, 32,000 से अधिक गाँव स्थायी या अस्थायी रूप से डूबे, और प्रतिवर्ष लगभग ₹6,500–7,000 करोड़ रुपये की औसत आर्थिक हानि हुई, जबकि 2018 की केरल बाढ़ में अकेले ₹30,000 करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ और 2017–18 में असम में ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ से लगभग 150 से अधिक लोगों की मौत और लाखों परिवार विस्थापित हुए ।
यदि राज्य-वार विवरण देखें तो बिहार में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 68% और उत्तर बिहार का लगभग 76% क्षेत्र बाढ़-प्रवण है, जहाँ कोसी, गंडक, बागमती, कमला, महानंदा जैसी नदियाँ हर साल 80–100 लाख लोगों को विस्थापित करती हैं और NDMA की रिपोर्ट के अनुसार बिहार अकेले भारत के कुल बाढ़-प्रभावित क्षेत्र का 16% हिस्सा है ।
असम में ब्रह्मपुत्र और बराक घाटी का लगभग 40% क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ग्रस्त होता है और असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के अनुसार 2019–20 की बाढ़ में लगभग 70 लाख लोग प्रभावित हुए थे; उत्तर प्रदेश में गंगा, घाघरा, शारदा, गंडक, राप्ती और यमुना जैसी नदियों के कारण पूर्वांचल और तराई क्षेत्र हर साल डूबते हैं, 2021 में यूपी में अकेले 19 ज़िले बाढ़ग्रस्त हुए ।
ओडिशा में महानदी, ब्राह्मणी और बैतरणी घाटी की बाढ़ें हजारों गाँवों को प्रभावित करती हैं, 2011 की बाढ़ में ओडिशा में 45 लाख लोग प्रभावित हुए; पश्चिम बंगाल में दामोदर, हुगली, तीस्ता और कोसी की सहायक नदियों से प्रति वर्ष करोड़ों की हानि होती है; केरल में 2018 की ऐतिहासिक बाढ़ ने दिखाया कि उच्च वर्षा, बांध प्रबंधन की कमी और अनियंत्रित निर्माण कैसे आपदा को जन्म देते हैं ।
जम्मू–कश्मीर की 2014 की बाढ़ और 2025 के किस्टवार जिले की आपदा (जहाँ cloudburst और flash flood से 65–67 मौतें और 200 से अधिक लोग लापता हुए) स्पष्ट संकेत देते हैं कि पर्वतीय राज्य कितने संवेदनशील हो चुके हैं; इसी वर्ष (2025) उत्तराखंड के उत्तरकाशी (धाराली) क्षेत्र में cloudburst से 5 मौतें और 50–100 लोग लापता हुए, जबकि असम और बिहार में लगातार मानसूनी बारिश से लाखों लोग प्रभावित हुए ।
इन सब घटनाओं के बावजूद भारत में आज तक कोई ऐसा राष्ट्रीय स्तर का visionary flood management project नहीं दिखता जो नीदरलैंड्स के Delta Works (1953 की बाढ़ के बाद बना और आज 100% समुद्री बाढ़ रोकने में सक्षम है), जापान के Tokyo G-Cans (underground flood diversion tunnel system जो प्रतिघंटा लाखों टन पानी सुरक्षित भूमिगत भेजता है), चीन के Sponge Cities Mission (जिसमें शहरी क्षेत्र वर्षा जल को सोखकर जलभराव और बाढ़ रोकते हैं) या अमेरिका के Mississippi Floodway Systems (जो नदी को नियंत्रित फैलाव के लिए स्थान देता है) की तरह संपूर्ण और टिकाऊ हो ।
भारत में अब तक flood control के नाम पर केवल राहत कार्य, embankments और अस्थायी बांधों पर निर्भरता रही है, लेकिन दीर्घकालीन और राष्ट्रीय परियोजनाओं की कमी रही; सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत के कई राज्य सरकारें बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा को “लाभ कमाने” का साधन मान लेती हैं—हर साल राहत पैकेज और पुनर्निर्माण परियोजनाओं से आर्थिक लाभ उठाया जाता है, और बाढ़ प्रबंधन को कई बार “नदी जोड़ो परियोजनाओं (River Linking Projects)” से जोड़कर प्रदर्शित किया जाता है, जिससे न केवल वास्तविक समाधान से ध्यान हटता है बल्कि नए पारिस्थितिक संकट भी उत्पन्न होते हैं ।
जबकि सच्चाई यह है कि बाढ़ प्राकृतिक आपदा है, इसे नियंत्रण और प्रबंधन की दृष्टि से देखना चाहिए न कि लाभ अर्जन के अवसर की तरह।; संविधान की दृष्टि से भी जल “राज्य सूची” का विषय है (अनुच्छेद 246), जबकि बाढ़ एक अंतर्राज्यीय समस्या है, इसीलिए राष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी नीति का अभाव रहा, केवल अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण) और अनुच्छेद 51A(g) (नागरिकों का कर्तव्य) जैसे प्रावधान मौजूद हैं, परंतु अब तक इन्हें जल और बाढ़ सुरक्षा के अधिकार में परिवर्तित नहीं किया गया ।
परिणामस्वरूप भारत आज़ादी के 78 साल बाद भी “बाढ़ मुक्त भारत” का लक्ष्य हासिल नहीं कर सका है; अब समाधान के लिए आवश्यक है कि केवल सरकार नहीं बल्कि जनता की भागीदारी भी हो—जनभागीदारी (community participation) के बिना कोई भी बाढ़ प्रबंधन योजना टिकाऊ नहीं होगी; गाँव स्तर पर पानी पंचायतें, जलग्रहण समितियाँ, महिला और युवाओं की भागीदारी तथा स्कूल बच्चों की जागरूकता बाढ़ प्रबंधन को जनांदोलन बना सकती है ।
स्कूल के बच्चे भविष्य के “जल प्रहरी” हैं, इसलिए NCERT की पुस्तकों में बाढ़, जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन पर अलग अध्याय होना चाहिए और बच्चों को छोटे-छोटे प्रयोगों, नाटक, जल परीक्षण और विज्ञान परियोजनाओं के माध्यम से बताया जाना चाहिए कि कैसे वर्षा जल को संग्रह कर बाढ़ को रोका जा सकता है ।
इतना ही नहीं, समय आ गया है कि NCERT और राज्य शिक्षा बोर्ड मिलकर “प्राकृतिक आपदा और जलवायु परिवर्तन” पर एक अलग विषय (subject) शुरू करें जिसमें flood, drought, cyclone, landslide, glacier burst जैसी आपदाओं का वैज्ञानिक अध्ययन हो, ताकि नई पीढ़ी इस समस्या को केवल किताबों में नहीं बल्कि वास्तविक जीवन में भी समझे और उससे निपटने की क्षमता विकसित करे ।
इसी तरह कॉलेज स्तर पर “Disaster Science and Climate Resilience” विषय को शामिल करना होगा ताकि भविष्य की नीति-निर्माण पीढ़ी के पास वैज्ञानिक और सामाजिक दोनों दृष्टिकोण हों; वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भारत को अब वर्षा जल को बाढ़ नहीं बल्कि संसाधन मानकर बड़े पैमाने पर भंडारण करना होगा—यदि हर साल व्यर्थ जाने वाले 3200 BCM जल का केवल 20–25% भी संग्रहण किया जाए तो भारत स्थायी रूप से बाढ़ से सुरक्षित और जल आत्मनिर्भर दोनों बन सकता है ।
इसके लिए आवश्यक है कि भारत संविधान में “राष्ट्रीय जल आयोग” या “राष्ट्रीय बाढ़ प्राधिकरण” को संवैधानिक दर्जा देकर flood plain zoning कानून लागू करे, सभी राज्यों में recharge trenches, percolation tanks, check dams, wetlands restoration, नदी पुनर्जीवन और बड़े storage reservoirs का नेटवर्क बनाए, तथा अंतरराष्ट्रीय मॉडल्स जैसे Delta Works, G-Cans और Sponge Cities से प्रेरणा लेकर एक Indian Flood Management Mission 2047 प्रारंभ करे, तभी “जल आत्मनिर्भर भारत 2047” और “बाढ़ मुक्त भारत” का सपना साकार हो सकेगा, अन्यथा हर मानसून के साथ भारत आने वाले दशकों में भी वही त्रासदी झेलता रहेगा और 78 वर्षों की तरह भारत फिर पीछे ही रह जाएगा।